मोदी और मिस्त्री के बाद वडोदरा में कौन था नंबर तीन?

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गुजरात की वडोदरा लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी के नरेंद्र मोदी ने सबसे ज़्यादा वोटों से जीत दर्ज की.

उन्हें अपने निकटतम प्रतिद्वंदी कांग्रेस के मधुसूदन मिस्त्री से क़रीब 5,70,000 वोट ज़्यादा मिले.

पर दोनों बड़ी पार्टियों के पीछे, उस सीट पर खड़े किए गए उम्मीदवारों में से तीसरे नंबर के पायदान पर आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी या जनता दल (युनाइटेड) नहीं हैं.

18,053 वोट के साथ नोटा यानी ‘नन ऑफ़ दि अबव’ का बटन तीसरे नंबर पर है. यानी वो विकल्प जिसके ज़रिए मतदाता ये ज़ाहिर कर सकते हैं कि वो अपने क्षेत्र से खड़े किसी भी पार्टी के उम्मीदवार से संतुष्ट नहीं हैं.

कुल वोटों की नज़र से ये आंकड़ा कम लगता है, पर कुल वोटों के प्रतिशत के तौर पर ये अहम हो जाता है.

पूरे देश में 1.1 प्रतिशत वोट नोटा को पड़े. वडोदरा में इससे ज़्यादा 1.5 प्रतिशत वोट नोटा को पड़े.

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राजनीतिक विश्लेषक और चुनावी आंकड़ों पर पैनी नज़र रखने वाले संजय कुमार के मुताबिक ये नरेंद्र मोदी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “इस पर कोई निष्कर्ष तो नहीं निकाल सकते, पर नरेंद्र मोदी ने देश के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर चुनाव लड़ा था, इसलिए उनके लोकसभा क्षेत्र से ऐसी तस्वीर उभरना बहुत सांकेतिक है और उन्हें इस पर विचार करना होगा.”

पिछले साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के बाद नोटा का विकल्प इलेक्ट्रॉनिक मशीनों में शामिल किया गया. ये पहला लोकसभा चुनाव था जिसमें मतदाताओं ने इसका उपयोग किया.

गुजरात में नोटा के लिए पड़े अधिक वोट

चुनाव आयोग के मुताबिक वोट प्रतिशत के आधार पर सभी प्रदेशों में से मेघालय में नोटा के लिए सबसे ज़्यादा 2.8 प्रतिशत वोट पड़े.

1.8 प्रतिशत के साथ दूसरे नंबर पर गुजरात और छत्तीसगढ़ रहे.

एकदम अलग साक्षरता स्तर और विकास दर वाले इन राज्यों की तुलना करना और वहां नोटा के प्रति लोगों के रुझान को समझना बेहद मुश्किल है. ख़ास तौर पर जब ये विकल्प पहली बार ईवीएम में इस्तेमाल किया गया हो.

पर इससे पहले पिछले साल हुए पांच विधानसभा चुनावों में भी नोटा का विकल्प इस्तेमाल हुआ था. संजय कुमार बताते हैं कि उन्होंने उनमें से चार राज्यों, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली में नोटा के इस्तेमाल का अध्ययन किया है.

इसमें दो अहम बातें उभर कर आईं. कुमार बताते हैं, “नोटा का ज़्यादा इस्तेमाल उन विधानसभा सीटों पर हुआ था जहां या तो साक्षरता दर कम थी या वो इलाके ग्रामीण थे, जहां शहरीकरण हुआ था और लोग ज़्यादा पढ़े-लिखे थे वहां उन्होंने नोटा का बटन कम ही दबाया.”

लेकिन ये आंकलन लोकसभा चुनाव के आंकड़ों पर लागू नहीं होता, मसलन गुजरात जहां साक्षरता भी ज़्यादा है और शहरीकरण भी, वहां नोटा का अधिक इस्तेमाल कैसे समझा जाए?

नोटा का फ़ायदा

वडोदरा की रहने वाली त्रुप्ति शाह बताती हैं कि उनके जैसे कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने मतदान से पहले एक महीने तक नोटा की जानकारी के प्रचार-प्रसार का काम किया.

उन्होंने पाया कि ज़्यादातर लोगों को इस विकल्प की जानकारी तक नहीं थी, “हमें कई लोग मिले जो इस जानकारी से उत्साहित थे और हमारे पर्चे लेकर और जगह बांटने तक को राज़ी हो गए, और कई ऐसे भी थे जो ये जानना चाहते थे कि ये बटन दबाने से आख़िर क्या हासिल होगा?”

फ़िलहाल तो नोटा केवल एक सांकेतिक हथियार है. यानी अगर किसी लोकसभा या विधानसभा सीट पर सबसे ज़्यादा वोट नोटा के हक़ में पड़ें, तो भी जीत उस उम्मीदवार की होगी जिसे सबसे ज़्यादा वोट मिले हैं.

ऐसी स्थिति में चुनाव रद्द नहीं होगा, ना ही वहां दोबारा मतदान जैसा कोई नियम बनाया गया है. ऐसे में कई मतदाता नोटा के बटन दबाने को अपना मत बेकार करने जैसा मान रहे हैं.

पर ये भी तथ्य है कि इस लोकसभा चुनाव में डाले गए 55 करोड़ से अधिक मतों में से 60 लाख से ज़्यादा लोगों ने नोटा का बटन चुना है और आने वाले समय में इसके पीछे की वजह और सांकेतिक चलन समझने की पड़ताल की जाएगी.

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