नए हालात में कितनी दूर तक जा पाएगी आप?

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"कंसीस्टेंसी इज द वर्चु ऑफ़ एन ऐस", पटना विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी के अध्यापक आर के सिन्हा अकसर कहा करते थे. जीवन के किसी और क्षेत्र से ज़्यादा यह बात राजनीति पर लागू होती है.

अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर ‘इन्कांसिस्टेंसी’ के आरोप पिछले दिनों के फैसलों के चलते जब लगाए जा रहे हैं तो यह वाक्य याद कर लिया जाना चाहिए. ताज्जुब है कि किसी और दल पर यह आरोप नहीं लगता.

एक मित्र ने ध्यान दिलाया कि जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी का पूरा इतिहास ही कुछ कहने और कुछ और करने का रहा है, जिससे वे अपनी जनता को निरन्तर भरमाए रख सकें और प्रतिद्वंद्वियों को भी अनिश्चय में डाले रख सकें.

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ड्रामा और जनतांत्रिक राजनीति

आम आदमी पार्टी और उसके नेता को ‘ड्रामेबाज’ कहकर उनकी भर्त्सना की जा रही है, लेकिन तुरंत ख़त्म हुए चुनाव में इस ड्रामेबाजी और लफ्फाजी के सहारे ही एक व्यक्ति ने देश की सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया, इसे नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.

ड्रामा और जनतांत्रिक राजनीति का घनिष्ठ सम्बन्ध है.

आम आदमी पार्टी के साथ दिक्कत यह है कि उसका छोटा-सा जीवनकाल उसके पल-पल परिवर्तित निर्णयों से कुछ ज़्यादा ही भर गया है.

नए राजनीतिक माहौल में जनता इसे पसंद करेगी या नहीं, इसे लेकर अब उसे उतना निश्चिंत नहीं रहना चाहिए जितना वह छः महीने पहले थी.

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अरविंद केजरीवाल के सिद्धांततः जमानत न लेकर जेल जाने पर तिहाड़ जेल के सामने जनता का हुजूम उमड़ नहीं पड़ा है और वे चौबीस घंटे की दृश्यात्मक राजनीतिक कार्रवाई का मौक़ा उसे नहीं बना सके.

टेलीविज़न चैनलों की ओबी वैन्स अब वहाँ जमी नहीं हैं. वे सारे अखबारों के मुखपृष्ठ पर भी नहीं हैं. दिसंबर-जनवरी के मुकाबले दिल्ली और देश का मौसम काफ़ी कुछ बदल चुका है.

क्या अरविंद और उनका दल यह भाँपने से चूक गया है?

राजनीतिक चिंतन

कार्रवाई और चिंतन, राजनीति में दोनों ही चाहिए. कोई राजनीतिक दल, जो हरकत में न दिखाई दे, जनता के चित्त से उतर जाता है. वामपंथी दलों का हश्र इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है. कांग्रेस पार्टी की निष्क्रियता उसकी पराजय का एक बड़ा कारण है.

स्थिर पड़े हुए राजनीति के जल में आम आदमी पार्टी ने हलचल पैदा कर दी और जनता ने इसका स्वागत किया.

‘कुछ तो टूटेगा’, रघुवीर सहाय की यह काव्यात्मक आशा जनता की भी थी, जो इस पार्टी के राजनीतिक परिदृश्य पर आने से जगी. उसने जनता के राजनीतिक कार्रवाई में भागीदारी के सर्जनात्मक तरीके खोजे.

दूसरे, उसके सर्वोच्च नेता ने हर मौके पर साहस दिखाया. आरामतलब नेताओं को देखते-देखते ऊब चुके लोगों ने इसका स्वागत किया और उसे हाथों हाथ लिया.

उन्होंने राजनीति को पार्टी दफ्तरों के बन्द षड्यंत्रकारी कमरों से बाहर लाकर गली मोहल्ले की आम फ़हम कार्रवाई बना दिया.

आम आदमी पार्टी में नौजवान चेहरों की बहुतायत ने भी ताज़गी और नएपन का अहसास कराया. जनता के उन तबकों में इसका सबसे ज़्यादा स्वागत हुआ, जिनके लिए पिछली सरकार ने सबसे अधिक कल्याणकारी योजनाएँ बनाई थीं.

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बनारस में मुसलमानों ने अरविंद को उनके मुखर हिंदूपन के बावजूद हाथों हाथ लिया. देश के दूसरे हिस्सों में भी मुसलमानों में इसे लेकर उत्सुकता दिखाई पड़ी.

दिल्ली और दूसरे शहरों में समाज के सबसे निचले तबकों में भी इसके प्रति स्वागत भाव बना हुआ है.

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संसद में भी चार सदस्यों के साथ पहला क़दम कोई बुरी शुरुआत नहीं है. दिल्ली में भी वह हर जगह दूसरे स्थान पर रही है. इसका अर्थ है कि राजनीतिक प्रतियोगिता से वह बाहर नहीं हो गई है.

बदले हालात

क्या आम आदमी पार्टी में इन जनाकांक्षाओं को संभालने की कुव्वत और समझ है? यह सवाल उससे सहानुभूति रखने वालों के दिमाग में सबसे ऊपर है.

क्या वह बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का अर्थ और गंभीरता समझ पा रही है?

अब उसके सामने कांग्रेस पार्टी की तरह एक पस्त हिम्मत और साख गवां चुका शासक दल नहीं है.

यह एक नई ऊर्जा से भरा हुआ, केंद्रीय सत्ता पर पूरी ताक़त से काबिज़ एक आक्रामक दल है और उसका एक ऐसा नेता है जिसे परिभाषित करना अभी कई लोगों के लिए टेढ़ी खीर है.

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कांग्रेस की अनाक्रामकता और ‘भद्रता’ के चलते उसे उखाड़ देना मुमकिन था.

दूसरे, कांग्रेस सरकार की रक्षा के लिए उसका कोई जनाधार न था, यानी वह एक जनविहीन, मतदाताओं की पार्टी है.

भारतीय जनता पार्टी की सरकार की रक्षा करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रतिबद्ध संगठन है, जिसकी दिलचस्पी इस सरकार के पाँव जमाने में है और वह हमलावर मुद्रा में भी है.

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कांग्रेस ध्वंस के यज्ञ में संघ ने अरविन्द का साथ दिया था. आम आदमी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने निजी बातचीत में इस बात पर चिंता प्रकट की थी कि इसके सदस्यों में एक चौथाई संघ समर्थक हैं.

जब तक कांग्रेस पार्टी आम आदमी पार्टी का मुख्य निशाना थी, उसका साथ देने में उनकी दिलचस्पी थी. नरेंद्र मोदी और भाजपा के साथ प्रतिद्वंद्विता में संघ का पक्ष स्पष्ट है.

अरविंद केजरीवाल की पिछली सफलता का एक कारण यह भी था कि उनका सामना करने के लिए कोई राजनीतिक संगठन था ही नहीं. अब हालात बदल चुके हैं.

भ्रष्टाचार की जगह स्थिरता, अब सबकी जुबान पर है. नई सरकार के नेता को भ्रष्ट ठहराना अभी बहुत मुश्किल होगा.

मीडिया पर पिछली सरकार के मुकाबले अब कहीं अधिक शासकीय नियंत्रण है. मीडिया का एक बड़ा हिस्सा स्वेच्छापूर्वक नरेंद्र मोदी की वकालत कर रहा है. इस तरह अरविंद केजरीवाल का एक बड़ा सहयोगी उनका साथ छोड़ चुका है.

संभावनाएँ

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इस समय आम आदमी पार्टी के लिए चुनौती तेजी से बदल रहे राजनीतिक परिदृश्य को ठीक तरीके से समझने और उसमें अपनी भूमिका तय करने की है.

सवाल यह है कि क्या ऐसा करने के लिए उसके पास पर्याप्त बौद्धिक क्षमता है?

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अब इसका ख़तरा बढ़ गया कि अरविंद केजरीवाल को हुड़दंगियों का एक गैरजिम्मेदार नेता घोषित कर दिया जाए. अति-सक्रियता के साथ उसे बौद्धिक स्थिरता और दृढ़ता का सन्देश भी देना ही होगा.

लेकिन फिर प्रश्न है कि ऐसा करने के लिए उसके पास लोग कहाँ हैं?

दलीय लोकतंत्र के मामले में अब भी वह पुराने राजनीतिक दलों की संस्कृति का ही अनुकरण करती दीख रही है. एक छोटे से गुट का उस पर कब्ज़ा है. उसके सर्वोच्च नेता सड़कछाप तुरंता राजनीतिक सोच से आगे नहीं बढ़ पाए हैं.

अरविंद केजरीवाल ने अपनी गिरफ़्तारी से एक बार फिर नैतिकता और व्यक्तिगत साहस और त्याग के आजमाए मुहावरे को ज़िंदा करने की कोशिश की है. जनता की क्या अब भी इस मुहावरे में रुचि रह गई है?

आम आदमी पार्टी अब भी संभावनाशील राजनीति शक्ति है. उसका भविष्य उसकी कल्पनाशीलता और जीवट पर टिका हुआ है.

उसके फैसलों की असामान्यता और अप्रत्याशितता ही अब तक उसे बाकियों से अलग करते आई है. इन दोनों को बिना छोड़े एक गंभीर राजनीतिक विकल्प का भरोसा बनने की चुनौती अब उसके सामने है.

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