मोदी काल में असहमति की आवाज़ें दब कर रह जाएंगी?

अक्षरधाम मंदिर पर हमले में दोषमुक्त हुए लोग इमेज कॉपीरइट PTI

ये भी एक इत्तेफ़ाक़ है कि 16 मई को एक तरफ़ चुनाव के नतीजों में नरेंद्र मोदी की पार्टी जीत पर जीत दर्ज करा रही थी तो दूसरी तरफ़ सुप्रीम कोर्ट ने अक्षरधाम 'आतंकवादी केस' में गिरफ़्तार मुस्लिम युवकों को बेक़सूर पाया और उन्हें रिहा करने का हुक्म दिया.

अदालत ने उन्हें ये कहकर छोड़ा कि इन लड़कों के खिलाफ़ मनगढ़ंत मुक़दमे दर्ज़ किए गए हैं.

अदालत ने गुजरात के गृह मंत्री को भी इसके लिए आड़े हाथों लिया था. उस समय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और गृह मंत्री का विभाग भी उन्हीं के ज़िम्मे था.

लेकिन इसे मोदी की ज़बरदस्त जीत का असर कहिए या फिर मीडिया की 'लापरवाही' ये ख़बर दब कर रह गई.

हमारा क़सूर क्या था?

इन मुस्लिम लड़कों ने कई साल जेलों की सलाखों के पीछे ये सवाल करते हुए गुज़ारे कि 'हमारा क़सूर क्या था?'

उनकी रिहाई के बाद मोदी से किसी ने ये सवाल नहीं किया जिससे इस अंदेशे को बढ़ावा मिला कि क्या अब असहमति की आवाज़ें दब कर रह जाएंगी?

16वीं लोकसभा के चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी विवादास्पद और समाज को विभाजित करने वाले नेता कहे गए.

('नई सरकार हिंदुत्व की नहीं मोदीत्व की होगी')

लेकिन अब वो भारत के नए प्रधानमंत्री हैं जिसका मतलब ये हुआ कि वो उनके भी प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया और उनके भी जिन्होंने हमेशा उनका कड़ा विरोध किया.

मोदी का विरोध करने वालों की लिस्ट काफी लम्बी है जिनमे में समाज सेवक तीस्ता सीतलवाड़ और शबनम हाशमी के नाम सबसे पहले लोगों की ज़बान पर आते हैं.

तो क्या अब उन्हें इस बात का भय है कि मोदी के प्रधानमंत्री काल में उनकी आवाज़ें दबा दी जाएंगी?

क्या मोदी का विरोध करने वालों को मुश्किल का सामना करना है? क्या उदार आवाज़ें अब सुनाई नहीं देगी? इस तरह के सवाल अभी से ही उठने लगे हैं

'बढ़ जाएगा दमन'

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मानव अधिकार कार्यकर्ता गौतम नौलखा कहते हैं उदारवादी ताक़तों के लिए एक चुनौती की घड़ी है, "यह मान लेना कि अब वो सत्ता में आ गए हैं तो अब जल्द क्रैक डाउन शुरू हो जाएगा. एक तरह से यह हो भी सकता है लेकिन ये हमारे लिए भी एक चुनौती है कि हम किस तरह ईमानदारी से काम कर सकते हैं. उनकी जो भी कोशिश होगी हमें ख़ामोश करने की हम उसका सामना करेंगे ये हमने पहले भी कहा है"

सामाजिक कार्यकर्ता शबनम हाशमी हमेशा मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार के खिलाफ आवाज़ें उठाती आई हैं. अब क्या ऐसी आवाज़ें उठेंगी?

वो कहती हैं, "आवाज़ें उठती रहेंगी जैसे पहले उठती थीं. असहमति और विरोध रहेंगे लेकिन इसे दबाने की कोशिशें अब बहुत ज़्यादा बढ़ जाएंगी और अब दमन अधिक बढ़ जाएगा. लेकिन आवाज़ें तो हिटलर के खिलाफ़ भी उठी थीं. उसके जो भी नतीजे हों आवाज़ें तो उठती रहेंगी."

('मुसलमान न कभी डरा है, न कभी डरेगा')

मुंबई में रहने वाली तीस्ता सीतलवाड़ मूलत: गुजराती हैं और मोदी का विरोध करने वालों में सबसे दबंग कही जाती हैं.

गुजरात के दंगों को लेकर उन्हों ने मोदी सरकार को कई बार आड़े हाथों लिया है. अदालत में भी गई हैं और 2002 के गुजरात दंगों के पीड़ितों को क़ानूनी मदद भी दी है.

वो कहती हैं कि हिंदुत्व परिवार की ताक़तों ने अलगाववाद का विरोध अब से ही शुरू कर दिया है.

'वो मनमानी भी कर सकते हैं'

वो कहती हैं, "अगर अब देखें की किस तरह आरएसएस और हिंदुत्ववादी संगठनो ने ईमेल और इंटरनेट द्वारा अपना आक्रोश और व्यक्त करने की कोशिश शुरू कर दी है चाहे गोपाल गांधी की चिट्ठी का विरोध हो. इससे यही लगता है कि उनका ये रवैया बदलने वाला नहीं है लेकिन भारत के संविधान की सुरक्षा के लिए हम आवाज़ें उठाते रहेंगे."

गौतम नौलखा कहते हैं कि लड़ाई केवल मोदी के ख़िलाफ़ नहीं है यूपीए सरकार भी दूध की धूली नहीं थी. हाँ अब ये बढ़ेगा.

वो कहते हैं, "जिस तरह के कड़े क़ानून यूपीए के दौर में बनाये गए और जिस तरह से चीज़ों को कवर अप करने की कोशिश की गई. जिस तरह से मुसलमानो और अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ एकतरफ़ा कार्रवाई की गई, ये पहले से ही रही है. ज़ाहिर है अब भाजपा के बहुमत से सत्ता में आने से उन्हें छूट है वो मनमानी भी कर सकते हैं"

(क्या होगा, जब चुनावी वादे पूरे नहीं होंगे)

लेकिन नरेंद्र मोदी के करीबी साथी माने जाने वाले एक मुस्लिम व्यापारी ज़फर सरेशवाला इस भय को बेबुनियाद बताते हैं. वो कहते हैं मोदी के विरोधी गुजरात प्रशासन में भी थे और वो बने रहे. जिन प्रशासकों को दिक्कतें हुईं वो दुसरे कारणों से हुई.

सरेशवाला का कहना था, ''मोदी हिंदुत्व विचारधारा वाले ज़रूर समझे जाते जाते हैं लेकिन वो संविधान की प्रक्रिया में जो फिट बैठे उसे ही स्वीकार करेंगे. जो भी संविधान को मानकर चले उससे मोदी को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए.''

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