अनुच्छेद 370: आम लोगों में भी तीखी बहस

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क्या जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर दिया जाना चाहिए? क्या भारत सरकार के इस रुख़ में कोई बदलाव आ सकता है कि कश्मीर उसका अभिन्न अंग है?

भाजपा हमेशा इस मुद्दे को लेकर मुखर रही है और इसे अपने घोषणापत्र तक में शामिल करती रही है.

चुनाव के दौरान अनुच्छेद 370 को लेकर पहले नरेंद्र मोदी के 'नरम' होने की बात सामने आई और फिर '370 पर बहस' को लेकर राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह के बयान से बवाल मच गया है.

बीबीसी हिंदी ने अपने फ़ेसबुक पेज पर लोगों से अनुच्छेद 370 पर राय मांगी थी. इस मुद्दे पर बड़े पैमाने पर लोगों ने अपनी राय साझा की. इनमें से कुछ चुनिंदा लोगों की राय को हम यहां दे रहे हैं.

स्वनिर्णय का अधिकार

प्रवंजन पांडे ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा है, ''मैं मानता हूँ कि अनुच्छेद 370 जैसे विवादित अनुच्छेद के कारण ही भारत को एक पूर्ण गणतंत्र नहीं कहा जा सकता है. ऐसी स्थिति में क्षेत्रीय लोगों के साथ एक सर्वसामुदायिक बातचीत हो, जिससे कोई ठोस और निश्चित परिणाम आए तो बात बने.

वहीं रामावतार शर्मा का मानना है कि अनुच्छेद 370 हमारे संविधान का खुला अतिक्रमण है. इसके हटने से ही कश्मीर का भारत में विलय होगा क्योंकि ये अनुच्छेद हमारे और कश्मीरियों के बीच दीवार है.

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लेकिन अयूब ए खान की राय अलग है. वे 1948 में कश्मीर के मसले पर भारत पाकिस्तान के बीच हुई लड़ाई के बाद कश्मीर में ज़मीन की खरीद से जुड़े क़ानून के हवाले से इस मसले को देखने की कोशिश कर रहे हैं.

धारा 370 पर नरेंद्र मोदी के 'नरम' होने के मायने?

वह बताते हैं कि जबतक विवाद समाप्त न हो जाए कोई भारतीय भारत प्रशासित कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकता और उसी तरह से कोई पाकिस्तानी पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में ज़मीन नहीं खरीद सकता है. ये शर्त पाकिस्तान ने ही संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत 1948 में रखी थी.

वह कहते हैं, ''क्योंकि पाकिस्तान को उस वक़्त ये डर था कि भारत सरकार हिंदुओं को कश्मीर में ले आकर मुसलमानों को अल्पसंख्यक बना सकती है और उसके बाद कश्मीर को स्वनिर्णय का अधिकार दे सकती है. इसलिए उस वक़्त ये शर्त रखी गई कि कश्मीर में कोई बाहरी व्यक्ति ज़मीन नहीं खरीद सकता है.''

उन्होंने लिखा है, ''इसी वज़ह से 65 सालों तक भारत ने कभी भी कश्मीर में स्वनिर्णय का अधिकार नहीं दिया, क्योंकि सरकार को मालूम है कि इसका परिणाम क्या आएगा.''

एम सनोबर राज इस मसले को महत्वपूर्ण नहीं मानते हैं. वह कहते हैं कि अमरीका में भी यही स्थिति है. वहाँ हर राज्य में अलग शासन और संविधान है, लेकिन सभी अमरीकी हैं.

स्वायत्ता का मसला

कृष्णा आनंद दारा का कहना है, "अनुच्छेद 370 हटना चाहिए. मोदी जी प्लीज़ 370 हटाओ. इस बार पूरे देश में 282+ हैं, अगली बार 542+ होगा आपका."

अलोक कुमार इस मसले को भावनात्मक रूप से लेते हुए फरमाते हैं कि जब हिंदू और मुसलमान मिलकर भारत को अपना देश मानते हैं तो फिर भारत के संविधान को पूर्ण रूप से स्वीकार क्यों नहीं करते.

वो कहते हैं, "कश्मीर भारत का ही हिस्सा है तो फिर उसके लिए अलग से क़ानून क्यों है? आप नहीं चाहते कि वहाँ पर भी भारत का संविधान पूर्ण रूप से लागू हो."

कारगिल जैसे हालात नहीं: बिक्रम सिंह

कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने वालों में उग्रसेन सिंह भी हैं और इसलिए वह कहते हैं, "अगर कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो फिर उसे विशेष दर्जा देनेँ की क्या आवश्यकता है. अनुच्छेद 370 को हटा देना ही उचित है."

इस मसले को कट्टर सोच से जोड़ कर देखते हुए फ़खरूल इस्लाम अंसारी ने कहा, "इस देश को कट्टर सोच के लोग कभी नहीं चला पाएँगे और ऐसी सोच देश को विखंडित कर देगी. हमारा देश केवल उदारवादी सोच से चलेगा. इसलिए मोदी कृप्या सावधान रहें!"

कश्मीर की स्वायत्ता का मामला भी इस विवाद का एक पहलू है, जिसके संदर्भ में मोहम्मद अथर रिज़वी कहते हैं, "कश्मीर को विशेष राज्य का नहीं अलग देश का दर्ज़ा देना चाहिए."

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