इरोम ने मोदी को सम्राट अशोक की याद दिलाई

इरोम शर्मिला

मणिपुर में 14 साल से सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून (आफ़्स्पा) हटाए जाने की मांग के साथ भूख हड़ताल कर रहीं इरोम शर्मिला ने अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी है.

उन्होंने प्रधानमंत्री से दरख़्वास्त की है कि वो ये क़ानून मणिपुर से हटा दें और एक ऐसे नेता बनें जो अहिंसा में विश्वास करता है.

उन्होंने अपनी चिट्ठी में कलिंग के सम्राट अशोक के भयानक तबाही, हत्याओं और विलाप देखने के बाद अहिंसा का रास्ता चुनने का हवाला दिया है और उसे गुजरात दंगों से जोड़ा है.

इरोम ने लिखा है, “अशोक की ही तरह आप भी अपने देश पर अहिंसा के हथियार से राज करें, ताकि लोगों से प्यार और मोहब्ब्त मिले, और गोधरा के बाद हुई वारदात के बाद बने मोदी-विरोधी गुटों में जो डर पैदा हुआ वो कम हो जाए.”

अपनी चिट्ठी में इरोम ने कहा है कि पांच साल पहले तक वो नरेंद्र मोदी को एक हिंसात्मक नेता के तौर पर ही जानती थीं, पर उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद अब वो उनसे शांति की उम्मीद रखती हैं.

मणिपुर में 25 से ज़्यादा अलगाववादी गुट सक्रिय हैं. अलगाववाद से निपटने के लिए राज्य में कई दशकों से सेना तैनात है, जिसे सशस्त्र बल विशेषाधिकार क़ानून के इस्तेमाल की छूट है.

इसके तहत सुरक्षा बलों के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती. मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इस क़ानून की आड़ में कई मासूम फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारे गए हैं.

इरोम शर्मिला की चिट्ठी

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आदरणीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी जी,

भारत के संविधान के तहत जीने के अधिकार की मांग करती एक युवा महिला की ओर से भारत के प्रधानमंत्री को हार्दिक बधाई!

सबसे पहले मैं आपसे माफ़ी मांगना चाहूंगी अगर भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर आपको संबोधित करते हुए मुझसे शिष्टता में कोई कमी हुई हो. मैं, इरोम शर्मिला, 1958 के क़ानून आफ़्स्पा को देश के उन सभी इलाकों जहां वो लागू है, से हटाने की मांग करने वाली इकलौती भूख़ हड़ताली हूं.

मैं अपने विनम्र आग्रह की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहती हूं, कि इस क़ानून के ज़रिए भारत की संसद ने क़रीब चार करोड़ लोगों के साथ जो अन्याय किया है, उससे उन लोगों को आज़ाद कर दिया जाए.

भारत में अगर कोई इलाका अशांत घोषित कर दिया जाए तो संविधान के तहत वहां सैन्य बलों को पूरी सुरक्षा दी जा सकती है. जिसके तहत उनकी नज़र में अगर किसी के अलगाववादी होने का महज़ संदेह भी हो तो भी उन्हें उसकी हत्या, उत्पीड़न और बलात्कार का अधिकार होता है, एक हवलदार को भी.

ऐसे क़ानून को लागू कर भारत की संसद हमारे यानी देश के उत्तर-पूर्व के लोगों के साथ, बाक़ी प्रदेशों में रहने वाले लोगों से अलग बर्ताव क्यों कर रही है?

क्यों इतनी सारी महिलाएं सैन्य बलों के यौन भोग की सामग्री बनें?

आफ़्स्पा, 1958, के तहत मिले हत्या के लाइसेंस के तहत भारत सरकार ने पिछले कुछ दशकों में हज़ारों लोगों की हत्या की है और कई को जबरन ग़ायब किया है.

इसके फलस्वरूप पीछे छूट गए हैं हज़ारों ऐसे परिवार जिनकी ज़िम्मेदारी अब महिलाओं पर हैं, वो विधवाएं और मां-बाप अपने क़रीबियों के लिए विलाप कर रहे हैं!

भारतीय सेना के मुखिया आफ़्स्पा हटाए जाने के सख़्त ख़िलाफ़ रहे हैं, क्योंकि इस क़ानून के तहत मिले अधिकारों के बिना वो अपने काम को लेकर डरते हैं और असुरक्षित महसूस करते हैं.

ये बेगुनाह लोगों के ख़िलाफ़ किए उनके बर्बर कर्मों का नतीजा है. इनकी नज़र में वो लोग कमतर, जंगली, बेवकूफ़ हैं और भारतीय सेना की अमानवीयता से क्रोधित हो वो चोरी-छुपे, अचानक, पलटकर हमला कर सकते हैं.

अलगाववाद को नियंत्रण में रखने की इसी विचारधारा के साथ, सैन्य प्रमुख भारत के उत्तर-पूर्व राज्यों और जम्मू-कश्मीर प्रदेश में आफ़्स्पा लागू किए रखने की नीति अपनाए हुए हैं, जिससे लंबे दौर में ज़्यादा से ज़्यादा अलगावावदी गुट पैदा हुए हैं.

मेरी समझ में भारत के उत्तर-पूर्वी इलाकों से पृथकतावादी और अलगाववादी आंदोलनों का समाधान, भारत की मुख्यधारा के लोगों और राजनीति में ताकतवर पदों पर आसीन लोगों द्वारा, मंगोलियाई जैसे दिखनेवाले लोगों के प्रति भेदभाव और सौतेला व्यवहार रोकना होगा.

कृपया, हमें मानव होने का मूल अधिकार दें, ताकि हम आत्म-सम्मान और गरिमा के साथ रह सकें.

अशांत इलाके का दर्जा देकर, सरकार ने, हमारे पर्यटन उद्योग का शोषण किया है, क्योंकि इसके तहत विदेश से यहां आने वाले सैलानियों पर पाबंदियां हैं.

पर्यटन, हमारे हाथ से बनाए जानेवाले पारंपरिक सामान के बदले बड़ी आमदनी दे सकता है और साथ ही दुनिया के विकसित देशों के साथ मेल-मिलाप के ज़रिए हम जानकारी और समझ भी बढ़ा सकते हैं.

कृपया मेरे विरोध करने के तरीके के बोध से मुझे किसी अलगाववादी पार्टी का समर्थक न मानें. बल्कि, कृपया मुझे ऐसा विवेकशील इंसान समझें जो पक्षी की तरह कोई स्थायी घर, भोजन, धर्म या नागरिकता नहीं चाहता, ताकि जब भी, जहां भी मेरी ज़रूरत पड़े, मैं पहुंच सकूं.

जब तक मेरा शरीर और आत्मा एक हैं, मैं दुनिया घूमना चाहती हूं. इस संसारी धरती से मैं कुछ और नहीं चाहती. बस इस बात में आनंद लेना चाहती हूं कि दुनिया से जाने के बाद, मेरे एक अक्लमंद और सामाजिक जानवर होने की अहमियत समझी जाएगी.

ऐसा हो तो, आने वाली नस्लें जिन्हें मेरे बारे में इतिहास से पता चलेगा, वो मेरे जीवनकाल के दौरान किए अच्छे कर्मों के बारे में ही जानेगी. इतिहास, जो ज़रूर, बुरे को भी अच्छे के तौर पर प्रस्तुत करेगा.

मेरा आग्रह है कि इस देश पर आपका नेतृत्व अहिंसा के अभ्यास से हो, और अन्य इलाकों समेत उत्तर पूर्व के चार करोड़ लोगों के इलाकों से आफ़्स्पा हटाकर, आप देश में लोकतंत्र की जड़ों को मज़बूत करें.

अलगाववाद को ख़त्म करने के लिए हर साल जो करोड़ों रुपए निर्धारित किए जाते हैं, वो बहुत लाभकारी ढंग से उन किसानों के लिए इस्तेमाल हो सकते हैं जो करोड़ों भारतीयों का पेट भरने के लिए ख़ेतों में काम करते हैं.

इसके लिए हमारे प्रदेशों के कोनों-कोनों में बने सैन्य नियुक्ति सेंटर और बैरकों को हटाकर उन्हें फिर से धान के उपजाऊ ख़ेतों में तब्दील करना होगा, जहां किसान शांतिप्रिय और संतुष्ट जीवन जी सकें.

अब आप सरकार के मुखिया ही नहीं बल्कि पूरे देश के द्वारा चुने गए लोकप्रिय नेता हैं. और आपके हाथों में फ़ैसले लेने की सबसे बड़ी ताकत है.

जैसे कलिंग के सम्राट अशोक ने ऐतिहासिक युद्ध की वजह से हुई भयानक तबाही, हत्याओं और विलाप देखने के बाद अहिंसा का रास्ता चुना, मेरा आपसे आग्रह है कि आप भी अपने देश पर अहिंसा के हथियार से राज करें, ताकि बदले में लोगों से प्यार और मोहब्बत मिले, और 2002 में गोधरा के बाद हुई वारदातों के बाद बने मोदी-विरोधी गुटों में जो डर पैदा हुआ है वो कम हो जाए, और वो लोग आपके नज़दीकी दोस्तों में तब्दील हो जाएं और एक शांतिप्रिय और जोशीला समाज बन सके.

मेरे निजी स्तर पर, हाल में हुए संसदीय चुनाव में आपकी ऐतिहासिक जीत और आपका भारत का प्रधानमंत्री बनना मुझे एक सपने में दिखाई दिया था. क़रीब पांच साल पहले साल 2009 में जब मैंने आपको मुझसे थोड़ी ही दूरी पर मुस्कुराते हुए खड़ा देखा था.

मैंने आज तक आपको उस स्थान पर देखने का इंतज़ार किया है. मेरे लिए भी ये एक सपना साकार होने जैसा है.

उन दिनों में मैं आपको एक हिंसक नेता के तौर पर ही जानती थी, उसके अलावा आपके बारे में कोई जानकारी नहीं थी. पर, हाल में अख़बारों के ज़रिए पता चला कि 16वें लोकसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी ने आपका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए घोषित किया है.

तब मुझे अपना पुराना सपना याद आया, जब मैंने आपको देखा था और फिर उसके बारे में यहां अपने प्रियजनों को बताया भी था.

तो, हम आशावान थे और आपकी जीत की कामना करते रहे. अब ऐसा लगता है कि मेरा सपना एक भविष्यवाणी समान था जो सरकार के सर्वोत्तम पद पर आपके आसीन होने से सच हो गया.

मैं अब, संसद में आपके प्रयासों के ज़रिए आफ़्स्पा (1958) हटाए जाने के साथ-साथ अपनी आज़ादी मिलने के दिन गिन रही हूं.

तो, आप ज़रूर वो सर्वशक्तिमान नेता बनें जो इस क़ानून को हटाने के फल स्वरूप मेरे 14 साल के अनशन को तोड़ दे.

आपको उन सभी बेग़ुनाह लोगों की रूह से दुआ लगेगी जो अब इस दुनिया में नहीं हैं और मेरे और मेरे दोस्तों जैसे लाखों युवा भी, जो देश के क़ानून की संरक्षा में एक गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहते हैं.

या फिर हमें ताकत का ग़लत इस्तेमाल करनेवाली इस पागल दुनिया से निर्वाण लेने दें, और हमारी रूह को उस शरीर से आज़ाद कर दें जो देश के संविधान के तहत मिलनेवाले जीवन के अधिकार से वंचित है.

फ़ैसला आपके क़ाबिल नेतृत्व में आपके हाथों में है.

ध्यान देने के लिए शुक्रिया.

बहुत आदर के साथ

इरोम शर्मिला चानू

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