हैदराबादः किसके लिए 'राहत' और किसकी 'टीस'?

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आंध्र प्रदेश और इसकी कोख से जन्मे तेलंगाना के बीच संबंध कैसे होंगे? इसकी एक झलक आज ही तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव या केसीआर के शपथ ग्रहण के अवसर पर दिखी.

शपथ ग्रहण समारोह में तेलुगू देशम के नेता चंद्रबाबू नायडू निमंत्रण के बावजूद मौजूद नहीं थे. राव ने कहा कि उन्हें बुलाया तो गया था लेकिन वो क्यूँ नहीं आए, ये वही बता सकते हैं.

सूत्रों के अनुसार चंद्रबाबू नायडू 8 जून को आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने वाले हैं.

नायडू ने पहले ही कह दिया है कि तेलंगाना को नहीं आंध्र प्रदेश को विशेष आर्थिक पैकेज की ज़रुरत है. राव इस कारण नायडू से नाराज़ हैं.

आईटी का गढ़

विशेषज्ञ मानते हैं कि दोनों नेताओं के बीच कुश्ती होने के पूरे आसार हैं और इसका अखाड़ा होगा अविभाजित आंध्र प्रदेश का गौरव हैदराबाद.

तेज़ी से तरक्की करने वाला शहर हैदराबाद सूचना तकनीक का गढ़ माना जाता है. यहां विश्व की बड़ी-बड़ी कंपनियों के दफ्तर हैं. इस शहर से पूरे आंध्र प्रदेश के 40 प्रतिशत से अधिक लोगो की आय होती थी.

हैदराबाद का हवाई अड्डा भारत के बेहरतरीन हवाई अड्डों मे से एक है. साथ ही, ये दवाई कंपनियों के उत्पाद का भी एक बड़ा केंद्र है.

अब यही हैदराबाद हमेशा के लिए तेलंगाना की राजधानी बन गया है जबकि आंध्र प्रदेश की राजधानी यह केवल अगले दस साल के लिए ही होगा.

गुस्सा और बेबसी

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आंध्र वाले नहीं चाहते थे कि हैदराबाद तेलंगाना को मिले. चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान इस शहर को भारत का एक बेहतरनी शहर बनाने में सफल रहे थे.

ज़ाहिर है आंध्र का गौरव तेलंगाना की झोली में जा गिरा है जिससे आंध्र के लोगों में अफ़सोस, जलन, गुस्सा और बेबसी जैसी भावनाओं के मिले-जुले अहसास हैं.

सोमवार को तेलंगाना का जन्म हुआ और उस दिन ही तेलंगाना खेमे में हमें ये सुनने को मिला कि चंद्रबाबू नायडू तेलंगाना में भी अपनी पार्टी को मज़बूत करके इस पर राज करना चाहते हैं.

इसे अफवाह ही कहा जा सकता है लेकिन हाल के विधान सभा के नतीजों पर गौर करें तो तेलंगाना वालों में असुरक्षा की भावना का पनपना स्वाभाविक ही है.

बुरी ख़बर

तेलंगाना विधान सभा में तेलुगू देशम पार्टी तीसरे नंबर पर है. ग्रेटर हैदराबाद क्षेत्र में अब भी आंध्र वालों की संख्या तेलंगाना वालों से अधिक है.

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ऐसा नहीं है कि तेलंगाना के दूसरे नव जिलों में सभी तेलंगाना के हक में हैं. ज़िलोने में भी आंध्र के लोग रहते हैं जो तेलंगाना के विभाजन के खि़लाफ़ हैं

लेकिन सारा खेल हैदराबाद में खेला जाएगा. तेलंगाना के आंदोलन के कारण हैदराबाद का समाज तीन भागों में विभाजित नज़र आता है.

एक तेलंगाना के पक्ष में, एक इसके विरोध में और तीसरा वो जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता.

आंदोलन के दौरान तेलंगाना वालों का एक प्रसिद्ध नारा था: “तेलंगाना वालों जागो आंध्र वालों भागो”. इसका असर हैदराबाद में रहने वालों उन लोगों पर है जो आंध्र के नागरिक हैं.

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परकाला प्रभाकर हैदराबाद के जाने-माने बुद्धिजीवी हैं और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ भी. उन्होंने एक महीने पहले बीबीसी को बताया था कि ये नारा पिछले दस सालों में आंध्र वालों के खिलाफ नफरत फैलाने में सफल रहा है और अब हैदराबाद के आर्थिक भविष्य पर इसका बुरा असर हो सकता है.

उन्होंने हाल में बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में कहा, "जिन लोगों ने रायलसीमा और कोस्टल आंध्र (मौजूदा आंध्र प्रदेश) से हैदराबाद शहर में पूँजी और उद्योग लगाया उन लोगों में बात का भय है कि हम इधर सुरक्षित नहीं होंगे इसलिए हमें चले जाना चाहिए. इस वजह से कुछ लोग जा सकते हैं”

ये तेलंगाना राज्य के लिए बुरी खबर होगी. हैदराबाद में अधिकांश पूँजी और पैसा आंध्र वालों के तरफ़ से लगा है.

परोसे कोई, खाए कोई

पिछले 40 साल में शहर में अधिकतर पूँजी और उद्योग हैदराबाद में ही लगाया गया. ऐसा करने में रायलसीमा और तटीय आंध्र वालों का हाथ था जिन्हें अब तेलंगाना वाले बाहर करना चाहते हैं.

परकाला प्रभाकर कहते हैं, "अगर हैदराबाद से पूँजी बाहर हो गयी तो तेलंगाना के लिए काफी कठिनाई पैदा हो सकती है.

वो कहते हैं, “40 प्रतिशत कमाई इसी शहर से आ रही है लेकिन बिज़नेस इधर का नहीं है. इधर रजिस्टर्ड ऑफिस हैं. अगर आपने ये दफ्तर विजयवाड़ा या विशाखापत्त्नम् में शिफ्ट कर दिया तो नए राज्य के लिए ये खतरा होगा.”

हैदराबाद हर तरह से आंध्र प्रदेश की प्रतिष्ठा थी, शान थी. नायडू ने इसे चमकाया लेकिन अब वो शहर तेलंगाना के हिस्से आया है. ये तो वही हुआ कि परोसे कोई और खाए कोई और. लेकिन तेलंगाना वाले कहते हैं कि हैदराबाद को बसाया और संवारा था निज़ाम ने, नायडू ने तो केवल इसकी मरम्मत की थी.

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