ऑपरेशन ब्लू स्टारः प्रत्यक्षदर्शियों की जुबानी

स्वर्ण मंदिर, पंजाब इमेज कॉपीरइट AP

तीस साल पहले जब भारतीय सेना ने स्वर्ण मंदिर परिसर में कार्रवाई शुरु की तो परिसर के अंदर क्या हुआ? प्रत्यक्षदर्शियों ने बीबीसी को मंदिर परिसर और उसके आसपास के इलाक़े का हाल बताया है. यह रिपोर्ट बीबीसी हिंदी डॉट कॉम पर चार जून 2004 को पहले प्रकाशित हो चुकी है.

'तोप के गोले बरसे'

ज्ञानी जोगिंदर सिंह वेदांती जो इस समय अकाल तख़्त के जत्थेदार हैं, पूरी कार्रवाई के दौरान स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद थे.

उनका कहना है, "परिसर चारों तरफ़ से हथियारों से लैस सैनिकों से घिरी हुई थी. भयानक दृश्य था. बम और तोप के गोले चारों ओर बरस रहे थे. किसी ने कभी सोचा भी न था कि ऐसा समय भी आ जाएगा."

वे कहते हैं कि जब पाँच जून की शाम को अकाल तख़्त को निशाना बनाते हुए परिसर में टैंक घुसे तो श्रद्धालुओं, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी कर्मचारियों और चरमपंथियों के साथ एक जैसा व्यवहार हुआ, क्योंकि सैनिकों के लिए तो सभी दुश्मन थे.

ज्ञानी वेदांती का कहना है, "बहुत सारे निर्दोष व्यक्तियों को भी मार दिया गया. बीस साल के बाद भी वो जख़्म अभी ताज़ा हैं, इसलिए भी कि हमारी अपनी सरकार ने हमारे साथ ऐसा किया."

'भिंडरांवाले के शव की पहचान की'

इमेज कॉपीरइट Getty

अपार सिंह बाजवा उस समय पंजाब पुलिस में डीएसपी थे और अमृतसर में कार्यरत थे.

वे कहते हैं कि पहले पुलिस अधिकारियों को तो घर जाने को कह दिया गया, लेकिन छह जून को उन्हें वापस बुलाया गया.

वे कहते हैं कि उन्होंने जरनैल सिंह भिंडरावाले, भारतीय सेना के पूर्व मेजर जनरल शहबेग सिंह और सिख सटूडेंट्स फ़ैडरेशन प्रमुख अमरीक सिंह के शव देखे.

वे कहते हैं, "मुझे उन लोगों के शवों की पहचान करने को कहा गया. फिर मुझे सिख रिवाज के अनुसार उनका अंतिम संस्कार करने को कहा गया जो मैंने किया.

पुलिस उपाधीक्षक अपार सिंह का कहना है कि मारे गए लोगों में से अधिकतर आम श्रद्धालु थे.

वे कहते हैं, "भिंडरावाले के समर्थकों के अलावा मैंने परिसर के अंदर 800 शवों की गिनती की.

'पाँच साल कैद, मुकदमा कोई नहीं'

गुर्मेज सिंह का कहना है कि वे सब्ज़ियाँ उगाते थे और अमृतसर में बेचने जाते थे.

वे बताते हैं कि जब तीन जून को गुरु अर्जुन देव के गुरुपर्व के दिन वे अपने कुछ दोस्तों के साथ स्वर्ण मंदिर पहुँचे तो कर्फ़्यू लगा दिया गया.

वे कहते हैं, "ये अहसास होते ही कि कुछ गड़बड़ हो सकती है, जब हम लोग एक पिछले रास्ते से बाहर निकलने लगे तो सेना ने हमें वापस परिसर में जाने को मजबूर कर दिया."

उनका कहना है कि उन्होंने अगले तीन दिन और रात तो जैसे किसी युद्ध के मैदान पर व्यतीत किए. वे कहते हैं, "मुझे गोली लगी. मेरे कई साथी तो गोलियाँ लगने से मारे गए. मुझे कई अन्य लोगों के साथ गिरफ़्तार किया गया और यातनाएँ झेलनी पड़ीं."

उन्हें पाँच साल जोधपुर जेल में बिना किसी मुकदमा चलाए क़ैद रखने के बाद रिहा कर दिया गया.

'तीन दिन भयभीत रहे'

इमेज कॉपीरइट AFP

तरलोचन सिंह स्वर्ण मंदिर परिसर के ठीक बाहर मेकैनिक की दुकान करते थे.

उनका कहना है कि उन्हें किसी बड़ी कार्रवाई होने का शक तब हुआ जब अर्धसैनिक बलों ने मई के अंत में उनके घरों के ऊपर मशीनगन चलाने के लिए जगह बनाई.

तीन से छह जून तक मशीनगन और तोपों की आवाज़ ऐसी थी की कोई पागल हो जाए. ये तीन दिन हम पूरी तरह भयभीत रहे.

पुराने बाज़ारों में आग लग गई या लगा दी गई ताकि कोई चरमपंथी भाग न सके. छह जून की सुबह तक भिंडरावाले और उनके साथी मारे जा चुके थे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार