क्या बांध ही हैं उत्तराखंड के विनाश की जड़

  • 15 जून 2014
उत्तराखंड

पिछले साल उत्तराखंड में आई बाढ़ और आपदा के बाद से विकास बनाम सरंक्षण की बहस तेज़ हो गई है. पर्यावरणविद, विकासवादी और पहाड़ पर रहने वाले सभी इसमें ज़ोर शोर से भाग ले रहे हैं.

बाहर से इस बहस को देखने वालों को ऐसा लगता है कि आज बात इस मोड़ पर आ गई है कि विकासवादी पर्यावरण के महत्व को दरकिनार करके "सबको कार, सबको मोबाइल" का नारा लगा रहे हैं और दूसरी ओर पर्यावरणवादी वापस गुफ़ाओं में लौट जाने की ज़िद करते दिखाई दे रहे हैं.

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एक तटस्थ व्यक्ति को समझ नहीं आ रहा कि मुद्दा क्या है और बहस में इतना तीखापन क्यों है?

बात असल में ये है कि एक इंसान के नाते हम सबकी कुछ ज़रूरतें हैं, जिन्हें पूरा किया जाना है.

उत्तराखंड की एक करोड़ जनता को भी वही सुख-साधन चाहिए जो दिल्ली में रहने वालों को मुहैय्या हैं. ऐसे में किसी भी सरकार के सामने चुनौती यह है कि कैसे इन सुविधाओं को इस तरह से लोगों तक पहुँचाया जाए कि गरीबी भी मिट जाए और प्राकृतिक संसाधनों का भी कम से कम इस्तेमाल हो.

'विकास जो प्रकृति से जोड़े'

दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रमुख, प्रोफ़ेसर महाराज कृष्ण पंडित का कहना है कि दोनों ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं, बशर्ते लोग चीज़ों को सही नज़रिए से देखें.

प्रोफ़ेसर पंडित का कहना है, "आज पर्यावरण बनाम विकास की बहस वे लोग कर रहे हैं जिनको वैज्ञानिक समझ तक नहीं है. बांधों पर हो रही बहस को ही लीजिए सबको बिजली की ज़रूरत है. तो अगर पनबिजली पैदा नहीं होगी तो कोई क्या करेगा? इसका जवाब सोचे बगैर 'अधजल गगरी छलकत जाए' वाली तर्ज़ पर सभी लोग अपने अपने स्वर अलाप रहे हैं."

बिजली की ज़रूरत और पहाड़ों का बचाव ऐसा पेचीदा मुद्दा है, जिसका कोई आसान हल नहीं है. आज भारत में 40 करोड़ लोगों के पास बिजली नहीं है और जिनके पास है वे घंटों पावर कट से जूझ रहे हैं.

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लेकिन पर्यावरण संरक्षक फिर भी पनबिजली के ख़िलाफ़ हैं और बांधों को ही पहाड़ों के विनाश का कारण मानते हैं. पिछले साल उत्तराखंड में आई बाढ़ के बाद तो बहुत सारे बांधों के बनने पर रोक लग गई है. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि बांधों को सारी परेशानी की जड़ मानना और उसका हौवा खड़ा करना ग़लत है.

प्रो. पंडित पूछते हैं, "केदारनाथ में कौन सा बाँध था? बाढ़ तो वहां आई थी न? मुद्दा यह है कि पर्यटकों का अनियंत्रित आना, घरों का बेतरतीब बनना और बाढ़ आने पर उतनी संख्या में लोगों का फंसना त्रासदी का कारण बना. ऐसे मुद्दों को छोड़ कर सारा ध्यान बांधों पर लगा दिया गया है, जो ठीक नहीं है. एक भी बांध न बनने देने की ज़िद भी उतनी ही ग़लत है जितनी बेहिसाब बांध बनाने की."

बांधों की बहस से अगर थोड़ा दूर हटें तो सवाल उठता है कि विकास कैसा हो? सभी इस बात पर एक मत हैं कि ऐसा विकास होना चाहिए जिसमें पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे, लेकिन यह तो एक चाह है, इसे किया कैसे जाए, यह एक पहेली है.

नव और अक्षय ऊर्जा मंत्रालय के निदेशक और उत्तराखंड निवासी भुवनेश कुमार भट्ट कहते हैं, "विकास जो लोगों को प्रकृति से जोड़े रखे, वही लम्बे समय तक चल पाएगा और विकास और पर्यावरण में संतुलन की हमारी चाह को पूरा कर सकेगा."

'संतुलन का आधार?'

इस सोच के विरोधी कह सकते हैं कि इससे पहाड़ के लोग विकास से दूर हो जाएंगे. पर ऐसा नहीं है. चाहे आल्पस की पहाड़ियां हों या दक्षिण अफ़्रीका के जंगल, यहाँ सरकारों ने स्थानीय लोगों को खेती और बड़े कारखाने छोड़ कर पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रेरित किया है. इन लोगों को इस काम का पैसा दिया जाता है और जो पर्यटक इन इलाकों में आते हैं उनसे होने वाली आमदनी में भी इन लोगों का हिस्सा होता है.

इसके आलावा विकास में भागीदारी भी एक बड़ी शर्त है. जब तक किसी को अपने आस-पास होते विकास में फ़ायदा नहीं दिखाई देगा वो उसमें शामिल नहीं होगा. उदाहरण ये दिया जाता है कि जबसे पहाड़ों में गैस की सुविधा आई है और स्थानीय लोगों को पेड़ काटने और लकड़ी लेने से मना किया गया है, उन्होंने जंगलों की रखवाली बंद कर दी है.

अब सवाल यह है कि क्या उनकी भागीदारी को वापस लाने के लिए उन्हें फिर से लकड़ी काटने और चूल्हा जलाने के लिए मज़बूर किया जाए?

वैज्ञानिक ऐसा नहीं मानते. उनका कहना है कि तकनीक के इस्तेमाल से भी यह भागीदारी नए सिरे से शुरू की जा सकती है. उत्तराखंड में आज 60 छोटे पन-बिजलीघर हैं. इसके अलावा 20 हज़ार परंपरागत पवनचक्कियां हैं, जिनसे बिजली पैदा हो सकती है.

अगर इन्हें बिजलीघर में बदल दिया जाए तो सभी गाँव वाले इन पानी की धाराओं को बचाने की कोशिश करेंगे, क्योंकि उस पर उनकी बिजली निर्भर होगी.

भुवनेश भट्ट कहते हैं,"लोग गांवों के आस पास की छोटी नदी को बचाएंगे और चूंकि यह नदी जंगल में संरक्षित पानी की मदद से बचेगी तो ऐसे में एक बार फिर लोग जंगल से जुड़ेंगे, बिना गैस की बलि दिए या पेड़ों को काटे."

इंसान और प्रकृति के बीच संतुलन होना चाहिए इससे किसी का विरोध नहीं है, लेकिन इस संतुलन का आधार क्या होगा, बहस इस बात पर है.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट 'अवर कॉमन फ़्यूचर' के मुताबिक सतत विकास तभी मुमकिन है जब हम प्रकृति से अपनी ज़रूरत भर के ही संसाधन लें ताकि भविष्य की पीढ़ियां भी अपनी ज़रूरत पूरी कर सकें.

शायद ये कसौटी हमारे समाज और पर्यावरण दोनों को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभा सकती है.

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