कर्नाटक के भटकल कस्बे की व्यथा

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हम अक़सर कहते हैं कि नाम में क्या रखा है लेकिन कर्नाटक में भटकल एक ऐसी जगह है जहां के लोगों के लिए ये नाम ही परेशानी का सबब बन गया है.

नाम में क्या रखा है? सच पूछिए तो बहुत कुछ.

इसे समझने के लिए आपको भटकल जाना होगा जो कर्नाटक में अरब सागर और पश्चिमी घाट के मुहाने पर स्थित है.

ये छोटा सा कस्बा उस समय अचानक लोगों की नज़रों में आ गया जब यहां के तीन लोगों के नाम वांछित चरमपंथियों की सूची में शुमार हुए.

भटकल यानी पहचान का आतंक

ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उन्होंने अपने नाम के आगे भटकल जोड़ रखा था, बल्कि सुरक्षा बलों ने उन्हें ये नया नाम देना सही समझा.

इस तरह रियाज़ शाहबंदरी रियाज़ भटकल बन गए और उनके भाई इक़बाल शाहबंदरी का नाम इक़बाल भटकल हो गया. उनके चचेरे भाई मोहम्मद अहमद ज़रार सिद्दीबापा का यासीन भटकल हो गया.

इस तरह नामकरण के चलते स्थानीय लोग नाराज़ हुए. जो लोग यहां पहले काम कर चुके थे और यहां के लोगों की ईमानदार, दोस्ताना और शांतिपूर्ण प्रकृति से परिचित थे, वे खिन्न हुए.

सामाजिक पहचान

इस नाम को चरमपंथ से जोड़ने का असर अब शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के अलावा सामाजिक पहचान पर भी पड़ने लगा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि वे एक ख़ास सामाजिक पहचान का शिकार हुए हैं.

पिछले चार-पांच वर्षों के दौरान यहां के अंजुमन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी एंड मैनेजमेंट में प्रवेश लेने वालों की संख्या घटी है, जिसे अंजुमन इंजीनियरिंग कॉलेज के नाम से भी जाना जाता है.

भारत में मोस्ट वांटेड यासीन भटकल गिरफ़्तार

अंजुमन इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नॉलॉजी एंड मैनेजमेंट के प्रधानाचार्य प्रोफ़ेसर उदय प्रसन्ना ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मैं कह सकता हूं कि भटकल की बदनामी होने के बाद से छात्रों के प्रवेश में 10 से 20 प्रतिशत तक की कमी आई है. पहले हमें उत्तर भारत के छात्र भी मिलते थे, लेकिन अब नहीं. कर्मचारियों की संख्या भी 20 से 25 प्रतिशत तक घटी है."

प्रोफ़ेसर प्रसन्ना एक और मुश्किल समस्या का सामना कर रहे हैं. वह कहते हैं, "नियमों के मुताबिक़ जब तक हमारी फैकल्टी की संख्या पूरी नहीं हो जाती है, हम छात्रों की संख्या नहीं बढ़ा सकते हैं. छात्र इसलिए नहीं आते हैं क्योंकि इस जगह का नाम भटकल है."

आवाजाही में कमी

इस कॉलेज में ये स्थिति ऐसे समय में है जबकि पूरे राज्य में निजी पेशेवर कॉलेजों ने सरकार से छात्रों की प्रवेश संख्या बढ़ाने के लिए कहा है.

प्रोफ़ेसर प्रसन्ना कहते हैं, "हमारे छात्रों ने 2007 से गोल्ड मेडल पाया है. स्थानीय तबक़े और कर्नाटक में लोग जानते हैं कि भटकल वैसी जगह नहीं है, जैसा कि इस इलाक़े के बाहर के लोगों की नज़रों में इसे बना दिया गया है."

पेशे से डॉक्टर और मजलिस-ए-इस्लाह-वा-तंज़ीम के पदाधिकारी रह चुके डॉक्टर हनीफ़ शोबाब ने बताया, "यहां अस्पतालों में कर्मचारी नहीं मिलते हैं. नर्सें यहां आना नहीं चाहती हैं."

पिछले तीन वर्षों से यहां के सरकारी अस्पतालों में आधा दर्जन डॉक्टरों और 33 नर्सों के पद खाली पड़े हैं.

जनता दल (सेक्यूलर) के नेता और पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष इनायतुल्ला शाहबंदरी बताते हैं, "लेकिन, अगर यहां किसी डॉक्टर की तैनाती हो जाती है और वो एक साल तक यहां रहता है तो वो यहां रह जाता है. ऐसे भी मामले हैं कि लोग यहां से सेवानिवृत्त हुए और यहीं रह रहे हैं क्योंकि उन्हें ये जगह शांतिप्रिय लगती है."

सांप्रदायिक सदभाव

डॉक्टर शोबाब और इनायतुल्ला इस बात पर एक राय रखते हैं कि 1993 में सांप्रदायिक दंगों के बाद भटकल में क़रीब 11 महीने तक कर्फ़्यू लगे रहने और 1996 में स्थानीय विधायक डॉक्टर यू चितरंजन की हत्या के बाद अब हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दूरी काफ़ी कम हुई है.

रोचक बात ये है कि इन वर्षों के दौरान सामाजिक तनाव के बावजूद हिंदुओं और मुसलमानों ने "रथ उत्सव" और "थीर हाब्बा" जैसे परंपरागत त्यौहार मनाना बंद नहीं किया. ये त्यौहार क़रीब दो शताब्दियों से मनाए जा रहे हैं.

हनुमंत मंदिर के प्रमुख हर साल राम नवमी के मौक़े पर चिरकिन के मुसलमान परिवारों को मिठाई देने और उन्हें "रथ उत्सव" में शामिल होने का न्यौता देने जाते हैं.

हनुमंत मंदिर समिति के प्रमुख सुरेंद्र शॉनबाग बताते हैं, "हमारे बुज़ुर्ग बताते थे कि ब्रिटिश अधिकारियों ने रथ निकाले पर रोक लगा दी, क्योंकि वे इसे सही नहीं मानते थे. हिंदुओं के पास ज़मानत देने के लिए धन नहीं था. चिरकिन परिवार के सदस्यों ने हस्तक्षेप किया और ब्रिटिश अधिकारियों से कहा कि वे गारंटी देते हैं. उन्होंने कहा कि ये सिर्फ हिंदुओं का त्यौहार नहीं है. ये गांव का त्यौहार है और इसे मनाया जाएगा."

भटकल की व्यथा

शोबाब और इनायतुल्लाह की तरह ही शॉनबाग भी व्यथित हैं. वो कहते हैं, "इस तालुके में किसी व्यक्ति के नाम के आगे कस्बे का नाम जोड़ने की कोई प्रथा नहीं है. ये वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी ने उनके नाम के आगे भटकल जोड़ दिया, फिर चाहे वे आतंकवादी हों या कुछ और."

इनायतुल्ला ने कहा, "उनके नामों के आगे भटकल जोड़ने की समस्या यहां उतनी नहीं है. जब हम दिल्ली, मुंबई या कहीं और जाते हैं तो जैसे ही हम बताते हैं कि हम भटकल से हैं, लोगों की निगाहें तुरंत बदल जाती हैं."

डॉक्टर शोबाब कहते हैं, "जब हम सरकारी विभागों में जाते हैं, हमारे साथ भेदभाव होता है. यहां तक कि पासपोर्ट के लिए आवेदन करने के दौरान हुई एक छोटी सी मानवीय ग़लती को भी जानबूझकर किया हुआ माना जाता है. हमें संदेह से देखा जाता है. हम ये बताते हुए अपमानित महसूस करते हैं कि हम भटकल से संबंधित हैं."

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