बिहार: दिमाग़ी बुखार की मार और सरकार बेज़ार

बिहार में दिमाग़ी बुखार से पीड़ित बच्चे इमेज कॉपीरइट BBC Manish Shandilya

दृश्य एक- मुज़फ़्फ़रपुर ज़िले के मुशहरी प्रखंड मुख्यालय स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र. यहां कमरे के एक हिस्से को कामचलाऊ तौर पर मस्तिष्क ज्वर (एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस) वार्ड के रूप में तैयार किया गया है.

यहाँ रहुआ राजाराम गांव की अमिता कुमारी अपने आठ महीने के बच्चे का इलाज करा रही हैं. स्वास्थ्य केंद्र के कर्मचारियों के अनुसार बाक़ी कमरों के मुक़ाबले एईएस वार्ड की ख़ासियत यह है कि इसमें एक अतिरिक्त हाई स्पीड फैन लगा है.

दृश्य दो- मुज़फ़्फ़रपुर शहर स्थित सदर अस्पताल में छह बिस्तरों वाला मस्तिष्क ज्वर वार्ड खाली पड़ा है. एक नर्स हालांकि ड्यूटी पर मौजूद हैं.

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इलाज के लिए भर्ती होना तो दूर अब तक एईएस पीड़ित किसी बच्चे को लेकर उसके परिजन जांच के लिए भी यहां नहीं आए हैं.

ज़िले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर ज्ञान भूषण कहते हैं कि यह चिंता का विषय है कि इलाज की पूरी व्यवस्था के बावजूद एईएस पीड़ित बच्चे यहां इलाज के लिए नहीं आ रहे हैं.

ख़ुद डॉक्टर भूषण के अनुसार ऐसा शायद अस्पताल के प्रति विश्वास की कमी के कारण हो रहा है.

खाली अस्पताल

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Image caption बिहार के मुज़फ़्फ़रनगर के ज़िला अस्पताल में एईएस का खाली पड़ा वार्ड.

दृश्य तीन- मुज़फ़्फ़रपुर स्थित प्रमुख सरकारी चिकित्सा संस्थान श्रीकृष्ण मेमोरियल चिकित्सा अस्पताल की बहुमंजिला इमारत की दूसरे मंजिल पर एईएस पीड़ित बच्चों के लिए दो गहन चिकित्सा केंद्र यानी पीआईसीयू बने हैं.

इस साल एक बार फिर गर्मी बढ़ते ही पिछले तीन हफ़्तों के दौरान इतनी ज़्यादा संख्या में मुज़फ़्फ़रपुर और इसके आस-पास के ज़िलों के बच्चे इलाज के लिए यहां पहुंच चुके हैं कि अक़सर एक बिस्तर पर दो बच्चों का इलाज किया जाता है.

चिकित्सा के इन तीन अलग-अलग सरकारी केंद्रों की यह स्थिति एक ऐसे क्षेत्र में सरकारी स्वास्थ्य ढांचे की लचर स्थिति को बयान करती है जिस क्षेत्र में पिछले लगभग तीन दशकों में सैकड़ों बच्चों की मौत मस्तिष्क ज्वर से हो चुकी है.

जाति के जाल में फंसी बिहार की राजनीति

सरकार ने ख़ुद स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए मानक तय कर रखे हैं. इन्हें भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानक के नाम से जाना जाता है. इसके अनुसार हर पांच हज़ार की आबादी पर एक स्वास्थ्य उपकेंद्र की सुविधा मुहैया कराई जानी है.

2011 की जनगणना के मुताबिक़ बिहार की आबादी दस करोड़ से अधिक हो गई है. ऐसे में मानक के अनुसार बिहार में कम से कम बीस हज़ार स्वास्थ्य उपकेंद्र होने चाहिए.

लेकिन बिहार सरकार के आंकड़ों के अनुसार इनकी संख्या नौ हज़ार के आस-पास है. यानी बिहार में मानक के हिसाब से आधे से भी कम स्वास्थ्य उपकेंद्र हैं.

स्वास्थ्य केंद्र की कमी का ख़ामियाज़ा

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Image caption बिहार के एक अस्पताल में दिमाग़ी बुखार से पीड़ित एक बच्चा और उसकी माँ.

इसका ख़ामियाज़ा हर दिन सूबे के लागों को उठाना पड़ रहा है. जन स्वास्थ्य अभियान के बिहार संयोजक और योजना आयोग द्वारा गठित राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के कार्यसमूह के सदस्य रहे डॉक्टर शकील बताते हैं कि हर बीमारी में एक ‘गोल्डन पीरियड’ आता है यानी ऐसा समय जिसके बीच अगर मरीज को जरूरी चिकित्सकीय सहायता मिल जाए तो वह बेहतर इलाज के लिए उचित केंद्र तक पहुंच सकता है.

लेकिन डॉक्टर शकील के अनुसार चूंकि पर्याप्त स्वास्थ्य उपकेंद्र नहीं हैं तो ऐसे में साधनयुक्त अस्पतालों तक पहुंचने में लगा वक़्त बच्चों के लिए घातक साबित हो रहा है.

ऐसा नहीं है कि कमी सिर्फ स्वास्थ्य उपकेंद्रों के मामले में है. सूबे में न तो पर्याप्त संख्या में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं और जो हैं वे भी पूरी तरह आधारभूत ढांचे, सुविधा और मानव संसाधन से लैस नहीं हैं. साथ ही सूबे में लगभग एक हज़ार रेफरल अस्पतालों की ज़रूरत के मुक़ाबले लगभग सौ रेफरल अस्पताल ही हैं.

विशेष राज्य का दर्जा मांगने वाले बिहार की हक़ीक़त

ऐसे में सूबे के श्रीकृष्ण मेमोरियल अस्पताल जैसे चिकित्सा महाविद्यालयों पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है. साथ ही राज्य में ऐसे महाविद्यालय भी गिनती के ही हैं.

दूसरी ओर राज्य में कई सालों से स्थाई चिकित्सकों की बहाली नहीं हुई है. हाल के कुछ सालों में अनुबंध पर चिकित्सकों के रखे जाने की शुरुआत हुई है.

लेकिन चिंताजनक बात यह है कि सरकार जितने पदों के लिए विज्ञापन निकालती है, उसके मुक़ाबले आधे से भी कम चिकित्सक ही आवेदन देते हैं.

जागरूकता अभियान

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स्वास्थ्य सुविधाओं की ऐसी ज़मीनी स्थिति के बीच फ़िलहाल राज्य प्रशासन का पूरा ध्यान मुज़फ़्फ़रपुर क्षेत्र में बीमारी के संबंध में लोगों को जागरूक करने पर है ताकि बीमारी ज़्यादा फैले नहीं और पीड़ित बच्चों को जल्द-से-जल्द मुज़फ़्फ़रपुर लाकर उनका उचित इलाज किया जा सके.

राज्य प्रशासन ने निर्देश दिया है कि मस्तिष्क ज्वर के मरीज़ों को तुरंत प्रारंभिक उपचार देकर नजदीक के अस्पताल में पहुंचाया जाए.

जीविका एवं अन्य स्वयंसेवी सहायता समूहों के माध्यम से भी लोगों को जागरूक करने में मदद की जा रही है. पर्चे के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में लाउडस्पीकर से लोगों को रोग के संबंध में जागरूक किया जा रहा है.

लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल है कि मुज़फ़्फ़रपुर क्षेत्र की ख़ास स्थिति को देखते हुए इस इलाक़े में स्वास्थ्य सुविधाओं को कब तक चुस्त-दुरुस्त किया जाएगा?

इस सवाल के जवाब में बिहार के स्वास्थ्य मंत्री रामधनी सिंह का कहना है कि उनकी पहली प्राथमिकता है कि वर्तमान में जो स्वास्थ्य उपकेंद्र है उन्हें इन प्रभावित इलाक़ों में प्राथमिकता के आधार पर सुविधा संपन्न बनाया जाए.

मानकों के हिसाब

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रामधनी सिंह ने यह भी कहा कि मानकों से हिसाब से ज़्यादा से ज़्यादा स्वास्थ्य उपकेंद्र खोलने और स्थाई चिकित्सकों की बहाली की दिशा में भी उनका मंत्रालय क़दम उठाएगा.

स्वास्थ्य मंत्री के अनुसार इसके लिए धन की कमी आड़े नहीं आने दी जाएगी. आर्थिक संसाधनों के सवाल पर उन्होंने यह भी कहा कि इसके लिए केंद्रीय सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी मदद का भरोसा दिया है.

वैसे डॉक्टर शकील कहते हैं कि जब तक ये वादे पूरे नहीं हो जाते तब तक यकीन करना मुश्किल है क्योंकि अब तक स्वास्थ्य सुविधाओं की बेहतरी सरकार की प्राथमिकता में शामिल नहीं रही है और इसके लिए सरकारों ने राजनीतिक इच्छाशक्ति भी नहीं दिखाई है.

डॉक्टर शकील जिस ओर ध्यान दिलाते हैं उसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि सूबे को लगभग एक साल बाद कोई स्वास्थ्य मंत्री मिला है. जनता दल (यू) के एनडीए गठबंधन से अलग होने के बाद और पिछले महीने नई सरकार के गठन तक इस विभाग का प्रभार पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास ही रहा था.

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