उत्तराखंड: 'याद करके अंदर ही अंदर रोते हैं'

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उत्तराखंड में एक साल बाद वही मंज़र सहसा सबकी आंखों के सामने घूम जाता है. देश दुनिया में पत्र-पत्रिकाओं, वेब और टीवी के ज़रिए जिन्होंने भी वे दृश्य देखे, कांप गए. भरभराकर गिरती इमारतें, होटल, मकान और स्कूल.

ज़मीन को निगलता हुआ पानी, एक जल प्रलय. मानो किसी ऐक्शन फ़िल्म का कोई दृश्य रहा हो.

एक साल पहले उत्तराखंड की केदार घाटी, बद्रीनाथ घाटी और गंगोत्री घाटी ने ऐसी तबाही देखी जो आज़ाद भारत की सबसे बड़ी प्राकृतिक त्रासदियों में एक मानी गई.

उत्तराखंड में आई भयंकर बाढ़ और भूस्खलन से जान-माल का भारी नुकसान हुआ था.

करीब आठ हज़ार लोग मारे गए, हज़ारों बेघर हुए, सैकड़ों मकान, दुकानें, होटल नष्ट हो गए. लोगों के खेत, घर और पशु बह गए.

केदारघाटी के जंगलों में तो अब भी मानव कंकाल मिल रहे हैं. खोजी दल को 13 जून को 17 मानव कंकाल केदारनाथ मार्ग पर जंगलचट्टी और चीड़बासा मंदिर के आस-पास की पहाड़ियों से मिले हैं.

रोज़गार की कमी

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यात्रियों की कमी का असर स्थानीय रोज़गार पर भी पड़ा है. जैसे घोड़े खच्चर वाले, दुकान ढाबा चलाने वाले लोग निराश हैं. देखते ही देखते खुशहाल इलाके श्मशान में बदल गए.

50 साल की कमलेश बिष्ट के भाई सुरेंद्र सिंह बिष्ट का परिवार केदारनाथ गया था. कमलेश बताती हैं कि पत्नी और दो बच्चों के साथ सात लोगों का दल था. एक भी नहीं बचा. उस घटना को याद करते हुए कमलेश की आंखें भींग जाती हैं.

वे कहते हैं, “वे लोग दर्शन करके रामबाड़ा में रात में रुक गए. रात को ही सैलाब आया और उसके बाद पता नहीं चल पाया. 16 तारीख की शाम को आखिरी बात हुई थी बस. बहुत खोजबीन की, सारे रिश्तेदार गए थे खोजने लेकिन किसी का कोई पता नहीं चला.”

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एक साल बीत जाने के बाद उनके दिल पर क्या गुज़र रही है, इस पर कमलेश कलपते हुए कहती हैं, “याद आती है बहुत याद आती है. क्या करें. याद करके अंदर ही अंदर रोते रहते हैं. सारा परिवार ही उजड़ गया.”

अपना भाई और परिवार गंवा चुके देवेंद्र सिंह बिष्ट क्षुब्ध होकर कहते हैं, “बचाव का काम देर से शुरू हो पाया. अगर जल्दी होता तो जानें बचाई जा सकती थीं.”

आज भी बाक़ी हैं निशान

केदार घाटी में सबसे ज़्यादा तबाही हुई. केदारनाथ मंदिर को तो नुकसान पहुंचा ही, उसके दोनों तरफ मंदाकिनी की धाराएं फट पड़ीं. और अब इधर-उधर कई खरोंचें जैसी दिखती हैं.

पानी ने केदार की ज़मीन पर इतनी खरोंचें भर दी हैं कि देखकर लगता है कि कुदरत का कहर कैसा रहा होगा. जो दुकानें, होटल और लॉज वहां मंदिर के आस-पास बड़े पैमाने पर बनाए गए थे, वे सब के सब ध्वस्त थे और ये अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता था कि पर्यटन के नाम पर मुनाफ़े की संस्कृति किस हद तक जा सकती है.

देर से हरकत में आई सरकार की मदद के लिए सेना आगे आई. केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री मार्गों पर फंसे हज़ारों लाखों लोगों को निकालने के लिए राज्य सरकार की मशीनरी कम पड़ गई. ज़़ाहिर है सेना की मदद की भारी दरकार थी.

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सेना और वायुसेना के जवानों, हेलीकॉप्टरों और अर्द्धसैनिक बलों ने मिलकर तीन सप्ताह से भी ज़्यादा वक़्त तक प्रभावित इलाक़ों में ड्यूटी की और देश दुनिया से आए हजारों यात्रियों को दुष्कर हालात में सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया.

लेकिन तबाही सिर्फ गढ़वाल के इन इलाकों में ही नहीं आई, कुमाऊं का पिथौरागढ़ ज़िला भी अतिवृष्टि का शिकार बना. लोगों के घर खेती, दुकान-मानो पूरी ज़िंदगी ही उजड़ गई. एक झटके में लोग सड़कों पर आ गए.

आपदा प्रबंधन की पोल

इस घटना ने न सिर्फ़ राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन की पोल खोल कर रख दी, पहाड़ों में धर्म और पर्यटन के नाम पर चल रही ख़ुराफ़ातों का भी भंडाफोड़ किया.

इतना ही नहीं, विकास के नाम पर पर्यावरण पर हमलों के बारे में भी आंख कान खुल गए. हालांकि ये ऐसी बात नहीं थीं कि पहली बार पता चल रही हो. लेकिन कोई इस पर कान नहीं देता था. जैसा चल रहा है चलने दो का एक यथास्थितिवादी भाव पसरा हुआ था.

एक साल बाद पुनर्निर्माण और मरम्मत के काम कछुआ गति से चल रहे हैं, ले देकर सरकार ने केदारनाथ का रास्ता जाने लायक बना दिया है लेकिन अगली बारिश तक ये रास्ते और पगडंडियां कितनी सुरक्षित रह पाएंगी, कहा नहीं जा सकता.

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मुख्यमंत्री हरीश रावत का कहना है, “सोनप्रयाग से लेकर लिनचोली तक अच्छा रास्ता बन गया है. मैं इसके लिए पीडब्लूडी आदि सबको बधाई देता हूं. हम इस रास्ते को और डेवलप करेंगे. ताकि न्यूनतम चढ़ाई रहे. लिनचोली को हम बाज़ार स्थल और कैंप स्थल के रूप में विकसित कर रहे हैं जहां इस समय हेलीकॉप्टर उतर रहे हैं. लिनचोली से केदार स्थल तक के रास्ते में रोपवे लगाने की हमारी योजना है, वहां से मैदान शुरू होता है केदार का. हम शिद्दत के साथ रणनीति के साथ इस पूरी योजना को अंजाम दे रहे हैं.”

हरीश रावत का दावा है कि केदारनाथ के समूचे यात्रा मार्ग की तस्वीर बदल दी जाएगी. “यात्रियों के आवास के लिए पहले गरुड़चट्टी थी, उस तरह की एक नई जगह बनाई जाएगी और नई केदारपुरी भी बसाई जाएगी, उसके लिए नई जगह की तलाश की जा रही है.”

विपक्ष के आरोप

सरकार की कोशिशों को प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ढकोसला करार देती है.

उत्तराखंड से भाजपा के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी का आरोप है, “जहां लाखों करोड़ लोग जाते थे वहां 200-300 लोग ही जा पा रहे हैं. रास्ते ठीक ही नहीं हो पा रहे हैं. यात्रा जिस तरह से चल रही है, मज़ाक बना हुआ है. प्रबंधन पूरी तरह गड़बड़ है. स्थानीय लोगों को भी कोई सहायता नहीं है. केंद्र से मिले पैसे का क्या इस्तेमाल हुआ, इसकी भी जांच की जानी चाहिए. ”

पिछली बार सरकार के पास यात्रियों की संख्या और उनका कोई रिकॉर्ड नहीं था. इस बार यात्रियों का रजिस्ट्रेशन कराया जा रहा है. वाहनों का बायोमीट्रिक रजिस्ट्रेशन भी इस बार से शुरू किया गया है.

हालांकि ये काम कितनी मुस्तैदी और तकनीकी कुशलता से हो पा रहा है, ये कहना मुश्किल है. क्योंकि कई यात्री निजी वाहनों से भी आवाजाही कर रहे हैं.

हर वाहन चार धाम यात्रा पर ही है, ये पता लगाना भी मुश्किल है. दूसरी ओर आपदा के ख़ौफ से वाहन चालक अपनी गाड़ियों के लिए ग्रीन परमिट लेने से भी कतरा रहे हैं. बीते साल देहरादून ज़िले से 1200 से ज़्यादा ग्रीन परमिट वाहनों के लिए जारी किये गए थे.

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इस बार अब तक 180 ग्रीन कार्ड ही बन पाए हैं. चारधाम यात्रा के लिए वाहन चालकों की दिलचस्पी में कमी का कारण डर ही बताया जा रहा है.

ख़तरों से खाली नहीं यात्रा

इस बीच बद्रीनाथ धाम का रास्ता भी ख़तरों से खाली नहीं है. जोशीमठ से बद्रीनाथ के रास्तों पर कम से कम चार ऐसी जगहें हैं जहां भूस्खलन का ख़तरा बना हुआ है.

ज़्यादातर तीर्थयात्री बद्रीनाथ में ठहरने से हिचक रहे हैं. मुख्य सचिव सुभाष कुमार का कहना है, “सड़क चालू हालत में है. बरसात में भूस्खलन होता ही है. लेकिन ख़तरे जैसी कोई बात नहीं है.”

प्राकृतिक विपदा की तबाही से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल मौसम की चुनौती का है.

पिछले साल मौसम विभाग ने समय रहते चेतावनी जारी कर दी थी लेकिन आपदा प्रबंधन मुस्तैद नहीं हो पाया और यात्रियों को सही जगहों पर नहीं रोका जा सका. क्या इस बार कुछ स्थिति बदली है?

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मौसम के लिहाज़ से क्या एहतियाती कदम उठाए गए हैं? इस बारे में मौसम विभाग के निदेशक आनंद शर्मा का कहना है, “स्थिति में तो ज़्यादा बदलाव नहीं हुआ है. रडार जो लगने थे, अभी लगे नहीं है. रडार की जमीन के लिए सरकार को लिखा था तो उन्होंने हमें जमीनें दिखा दी हैं. हमने मसूरी, सुरकंडा और नैनीताल में सर्वे किया है. शुरुआती सर्वे हो गया है लेकिन रडार लगने में तो अभी समय लगेगा. इस सीज़न में तो नहीं लगेंगे अगले सीज़न में इसकी शुरुआत शायद हो जाए.”

आनंद शर्मा का कहना है कि मौसम विभाग के साथ तालमेल के सवाल पर सरकार बेशक हरकत में आई है.

उनका कहना है, “जिस समन्वय की कमी की बात हमने उठाई थी उसे लेकर अब सरकारी अधिकारियों के साथ कार्यशाला हम लोग कर रहे हैं. कोशिश की जा रही है कि मौसम से जुड़ी चेतावनी और आकलन की तकनीकी को वे भी भलीभांति समझ लें. मौसम विभाग की आपदा प्रबंधन के तमाम अधिकारियों के साथ कार्यशाला इस बीच होती रही हैं.”

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