महज़ चुनावी वादा था 'हर घर में शौचालय'?

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सुबह के समय दिल्ली के कीर्ति नगर रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का टिकट लेने वालों वालों की क़तार लंबी होती जा रही थी.

स्टेशन की पटरी के दूसरी तरफ़ भी भीड़ बढ़ती जा रही थी. वहां लोग एक-दूसरे से थोड़ी दूरी बनाकर बैठे थे. ये लोग उन 48 प्रतिशत भारतीयों में से हैं, जिनके पास शौचालय की सुविधा नहीं है.

स्टेशन के पास स्थित पेड़ों और झाड़ियों में शौच कर रहे ये लोग स्टेशन के निकट ही झुग्गियों में रहते हैं.

सांसद के टोले में भी शौचालय नहीं

डायरिया और हेपेटाइटस जैसी बीमारियों के ख़तरे के बावजूद बहुत सारे लोग हर सुबह खुले में शौच करते हैं.

महिलाओं के लिए स्थिति और भी ज़्यादा ख़तरनाक होती है. महिलाएं जब भी बाहर शौच के लिए जाती हैं, तो उन पर यौन हमले का डर रहता है.

हाल ही में उत्तर प्रदेश में दो किशोरियों की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई. दोनों के शव पेड़ पर झूलते मिले थे. ये लड़कियां अपने घर से शौच करने के लिए बाहर गईं थीं और कभी वापस नहीं लौटीं. देश के लाखों लोगों की तरह इन लड़कियों के घर में शौचालय की सुविधा नहीं थी.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार भारत में तक़रीबन 50 करोड़ लोग अभी भी खुले में शौच करते हैं.

नेताओं के नारे

भारत की दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपने घोषणापत्रों में देश के सभी नागरिकों के लिए शौचालय की व्यवस्था करने का वादा किया था, ताकि खुले में शौच करने की मजबूरी ख़त्म की जा सके.

भारत के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के दौरान वादा किया था, "टॉयलेट पहले, मंदिर बाद में"

वहीं कांग्रेस नेता और पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा था, "अच्छी सफ़ाई बरतना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पूजा करना."

जिन्होंने शौचालय न होने पर छोड़ दिया ससुराल

भारत सरकार शौचालय निर्माण के लिए नक़द सहायता देती है. सरकार ने हाइजीन और सफ़ाई से जुड़े कई सार्वजनिक कार्यक्रम भी चलाए हैं.

हरियाणा सरकार ने 2005 में "टॉयलेट नहीं, दुल्हन नहीं" नारा दिया था और लड़कियों से अपील की थी कि वो ऐसे दूल्हों को ठुकरा दें जिनके घर में शौचालय न हो.

मशहूर अमरीकी उद्योगपति बिल गेट्स के द गेट्स फाउंडेशन ने भी भारत में शौचालय निर्माण के लिए आर्थिक मदद दी है ताकि ऐसे शौचालय बनाए जा सकें जिनमें बिजली, पानी, सीवर हो और अपशिष्ट के निस्तारण की भी समुचित व्यवस्था हो.

गेट्स फाउंडेशन की तरफ़ से दिल्ली में हुए एक मेले में एक ऐसे शौचालय का मॉडल प्रदर्शित किया गया, जिसकी छत में सौर ऊर्जा का निर्माण करने वाले पैनल लगे थे. इस पैनल से मिलने वाली बिजली से शौचालय में लगा रिएक्टर अपशिष्ट को खाद में बदल देता है. एक दूसरे मॉडल में एक स्वचालित रोगाणुनाशक संयत्र और भाप को पानी में बदल देने वाला जेनरेटर लगा था.

खुले में शौच की आदत

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ग़रीबी और शौचालयों के अभाव के अलावा भारत में खुले में शौच के लिए कई बार सामाजिक रूप से स्वीकार्य यहां की मान्यताओं को भी ज़िम्मेदार बताया जाता है.

स्वच्छ शौचालय के लिए पैंट उतारकर प्रदर्शन

यूनीसेफ के डब्ल्यूएएसएच (वाटर, सेनिटेशन और हाइजीन) कार्यक्रम के प्रमुख सुए कोएट्स कहती हैं, "केवल शौचालय बना देने से समस्या का हल नहीं होगा, क्योंकि खुले में शौच करना एक आदत है जो आप चलना सीखने की उम्र में ही सीख जाते हैं. जब आप ऐसे माहौल में बड़े होते हैं, जहां हर कोई यही करता हो तो आपके पास सुविधा हो तो भी आप फिर से खुले में शौच करना शुरू कर देते हैं."

वे कहती हैं, "खुले में शौच तभी बंद हो सकता है जब भारत का हर गांव, हर घर, भारतीय समाज का प्रत्येक अंग शौचालय का प्रतिबद्धता के साथ प्रयोग करे."

सेंटर फॉर एन्वायरमेंट प्लानिंग एंड टेक्नोलॉजी में प्रोफ़ेसर मीरा मेहता कहती हैं कि इस दिशा में बनाई गई नीतियां का वांछित प्रभाव शायद इसलिए नहीं पड़ता, क्योंकि उनमें 'एकाग्रता का अभाव' था.

वह कहती हैं, "सही नीति और राजनीतिक तौर पर ध्यान देने से भारत अगले 10 साल में खुले में शौच की समस्या से मुक्त हो सकता है."

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