उत्तराखंड: 'वही हो रहा है जो होता आया है'

उत्तराखंड, सड़क मार्ग का निर्माण

कहते हैं की जो इतिहास से नहीं सीखते वो उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं.

उत्तराखंड में त्रासदियों के इतिहास पर नज़र डालें तो लगेगा जैसे वर्तमान समाज का एक छोटा वर्ग अपने काम से और बड़ा वर्ग अपनी चुप्पी से विनाश की लीला को बार बार दोहराने के लिए मज़बूर है.

उत्तराखंड आपदा: विनााश की कहानी

पिछले साल आई बाढ़ के बाद आज स्थिति ये है कि नदी के किनारे बसे शहर उन्हीं खतरों का सामना कर रहे हैं जिनसे वे साल भर पहले दो-चार हुए थे.

पिछले साल बाढ़ में जान माल की इतनी हानि का कारण यह था की केदारनाथ में हज़ारों यात्री फँस गए थे. इसके अलावा नदी के रास्ते में बने हुए घर बहे थे और सड़कें टूट गई थीं.

टिहरी के जड़धारी गाँव निवासी और इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से सम्मानित, विजय जड़धारी, कहते हैं, "साल भर बाद आज भी सड़कें वैसे ही बन रही हैं, उनकी मरम्मत का काम भी ठीक उसी तरह चल रहा है जैसे पहले चलता था. केदार घाटी में तो निर्माण कार्य में कमी आई है लेकिन बाकि जगह वही हो रहा है जो होता आया है. ऐसे में मुझे नहीं लगता की ये राज्य एक और त्रासदी के लिए तैयार है."

कमज़ोर पहाड़ियाँ, भूकंप का ख़तरा

उत्तराखंड में हिमालय की पहाड़ियां कमज़ोर हैं और लगातार ऊपर उठ रही हैं इस कारण पूरा इलाका भूकंप का ख़तरा झेल रहा है.

साथ ही तेज़ बारिश के कारण भूस्खलन और नदियों में अचानक बाढ़ का ख़तरा भी बना रहता है. ये प्राकृतिक आपदाएं हैं और पहाड़ पर रहने वाले इसके लिए हमेशा तैयार रहते हैं.

लेकिन पिछले 50 साल में इन आपदाओं की इंसानी कीमत काफी बढ़ गई है और इसकी ज़िम्मेदारी लोग अलग-अलग कारणों पर थोपते हैं.

कुछ लोगों का मानना है की विकास की मूल सोच में ही ख़राबी है. देहरादून के पर्यावरणविद और इंजीनियर, पवन गुप्ता कहते हैं, "उत्तराखंड का निर्माण इस सोच के साथ हुआ था की हमारी संस्कृति और भूगोल अलग है तो हमें विकास का नया मॉडल चाहिए. लेकिन आज नए राज्य का भी वही मॉडल है जो सारे देश में चल रहा है और वो यहाँ की सेहत के लिए ठीक नहीं है. इसीलिए आज भी उत्तराखंड बाढ़ का सामना नहीं कर सकता. "

वे कहते हैं, "उत्तराखंड की सडकों को ही लें, पिछले साल की बाढ़ के बाद पहाड़ों की तलहटी में हुए कटाव के कारण सड़कें धंसने लगी, आज भी वो प्रक्रिया जारी है. ऐसे में पक्की सड़क बनाना ख़तरे का काम है क्योंकि उसके भी धंसने का ख़तरा रहता है. लेकिन इस ख़तरे को नज़रअंदाज़ करके ऐसा निर्माण चल रहा है क्योंकि सभी को एक बार फिर से बड़ी संख्या में पर्यटकों के आने का इंतज़ार है."

त्रासदी के कारण और निवारण

नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिजास्टर मैनेजमेंट ने पिछले साल की आपदा के बाद राज्य में करीब 1000 लोगों से बात की और दो वर्कशॉप भी किए, इसके बाद उन्होंने एक रिपोर्ट तैयार की जिसमें त्रासदी के कारणों और निवारणों की बात कही गई.

इंस्टिट्यूट के कार्यकारी निदेशक डॉ सतेंद्र का कहते हैं, "हमने पाया की भविष्य में त्रासदी के असर को काम करने के लिए कई बातें होनी चाहिए, लेकिन मुख्य रूप से टूरिस्ट की संख्या पर नियंत्रण, बांध और सड़क बनाने की प्रक्रिया पर कड़ी नज़र और पूर्व सूचना का बेहतर तंत्र तो बेहद ज़रूरी है."

ये बात तो सबको पता है की ज़रूरी क्या है लेकिन सवाल उठता है कि क्या इस पर अमल हो रहा है?

साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डेम्स, रिवर्स एंड पीपल के हिमांशु ठक्कर की बात माने तो ऐसा नहीं है.

उनके मुताबिक, "सन 2013 में आई बाढ़ ने एक चेतावनी दी थी. लेकिन सरकार ने सुध नहीं ली आजतक ये तय नहीं हो पाया की नदी का रास्ता कहाँ से गुज़रता है ताकि ये नियम बन सके की उस इलाके में घर नहीं बनेंगे. ये ही हाल बांधों के बारे में है तो मुझे नहीं, लगता की सरकार ने कोई सीख ली है."

त्रासदी की याद

इमेज कॉपीरइट Mansi Thapliyal

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने ये कहा था कि बाँध के निर्माण पर रोक लगनी चाहिए और उनका पर्यावरण पर क्या असर हो रहा है इसकी पूरी तरह जांच होनी चाहिए, लेकिन इस आदेश को दरकिनार कर दो बांधों पर काम शुरू कर दिया गया है.

दलील ये दी जा रही है की इसकी स्वीकृति 1980 के दशक में ही मिल गई थी इसलिए नई स्वीकृति की ज़रूरत नहीं है.

इस साल अभी तक मौसम विभाग के मुताबिक़ मानसून कमज़ोर होने की पूरी आशंका है. साथ ही पिछले साल की त्रासदी लोगों के मन में अभी भी ताज़ा है इसलिए केदारनाथ की ओर जाने वाले पर्यटकों की संख्या बहुत कम रह गई है. ऐसे में लोग दूसरे रोज़गार की तलाश कर रहे हैं.

लेकिन मुश्किल ये है की समय बीतने के साथ साथ लोग एक बार फिर त्रासदी को भूल कर पुराने ढर्रे पर चलने लगेंगे और जाने-अनजाने एक नई त्रासदी की स्थितियां खड़ी कर देंगे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार