एक दिल के लिए थम गया चेन्नई का ट्रैफ़िक

आपने सुना होगा कि किसी वीआईपी के लिए ट्रैफ़िक रोका गया हो और एंबुलेंस में अस्पताल जा रहे किसी मरीज़ ने दम तोड़ दिया हो. मगर चेन्नई में इसके उलट हुआ. किसी की जान बचाने के लिए सड़क पर ट्रैफ़िक थम गया ताकि 12 किलोमीटर दूर मौजूद अस्पताल तक दिल को पहुंचाया जा सके, जिसका प्रत्यारोपण होना था.

बात सोमवार शाम की है जब चेन्नई के भीड़भाड़ वाले सेंट्रल इलाक़े के लेकर मलार तक 12 किलोमीटर के रास्ते पर सारा का सारा ट्रैफ़िक रुका पड़ा है.

अभियान था एक ज़िंदगी को बचाने का.

चेन्नई सेंट्रल स्थित सरकारी अस्पताल से एक एंबुलेंस एक डिब्बे में दिल लेकर निकल पड़ी, जिसे एक नौजवान लड़की को लगाया जाना था.

एक-एक मिनट की क़ीमत

इस काम को जल्द से जल्द पूरा करना था. यूं कहा जाए कि एक इंसान के दान किए गए दिल को दूसरे इंसान की जान बचाने के लिए जल्द से जल्द पहुंचाना था. इस काम में एक-एक मिनट क़ीमती था.

अच्छी बात यह है कि दिल समय पर भी पहुंचा और एक ज़िंदगी बच भी गई. एंबुलेंस ने 12 किलोमीटर की दूरी 13 मिनट में तय की, वरना उसे एक घंटा लग सकता था.

Image caption एंबुलेंस ने व्यस्त यातायात के समय भी 13 मिनटों में 12 किलोमीटर की दूरी तय की. (फ़ाइल फ़ोटो)

मुंबई की रहने वाली आरमाइटी मिनोचर होमजी, जिनकी ज़िंदगी और मौत से जूझती बेटी को जीवनदान मिला, इस पूरी प्रक्रिया को अद्भुत मानती हैं.

वे कहती हैं, "मैंने अपनी ज़िंदगी में पहली बार ऐसा देखा है. चेन्नई सेंट्रल के अस्पताल से मलार के फ़ोर्टिस अस्पताल तक एंबुलेंस 13 मिनट में पहुंची. वो पूरा रास्ता भीड़भाड़ वाला होता है क्योंकि वह रोड है ऑफिस से घर जाने के लिए. मैं यह सोच रही थी कि कैसे हो पाएगा? लेकिन 13 मिनट में मैंने मलार के फ़ोर्टिस अस्पताल में, एंबुलेंस को दिल लेकर पहुंचते देखा."

वे कहती हैं, "ये सब कुछ संभव हो पाया एंबुलेंस के चालक, चेन्नई की ट्रैफ़िक पुलिस और सरकार की वजह से. मैं तमिलनाडु सरकार और चेन्नई के लोगों की बहुत आभारी हूं."

नज़ारा कुछ ऐसा था कि सरकारी अस्पताल से निकलने से पहले ही सड़क पर पूरे ट्रैफ़िक को रोक दिया गया था और एंबुलेंस 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से अपने गंतव्य के लिए बढ़ती रही.

होठों पर प्रार्थना

यह दिल था एक 27 साल के नौजवान का, जो हादसे का शिकार हो गया था और उसे सिर में गंभीर चोटें लगीं थीं.

चोट इतनी ज़्यादा थी कि उसे बचाया नहीं जा सका और तब तय हुआ कि उसके दिल को फ़ोर्टिस अस्पताल में भर्ती 21 वर्षीय युवती की जान बचाने के लिए प्रत्यर्पित किया जाए.

मुंबई के रहने वाले युवती के परिवार वालों के होठों पर प्रार्थना थी और नज़रों को एंबुलेंस के सही समय पर पहुंचने का इंतज़ार.

Image caption फ़ोर्टिस अस्पताल के डॉक्टर सुरेश राव के मुताबिक़ दिल को चार घंटे के भीतर प्रत्यारोपित करना पड़ता है.

फ़ोर्टिस अस्पताल के डॉक्टर सुरेश राव, जिन्होंने दिल के प्रत्यारोपण का ऑपरेशन किया है, कहते हैं कि दान करने वाले मरीज़ के शरीर से निकालकर दिल को दूसरे मरीज़ के शरीर में चार घंटों के अंदर ही प्रत्यारोपित करना पड़ता है.

वो कहते हैं, "एक बार जब दिल निकाला जाता है, तो हमें दूसरे मरीज़ के अंदर इसे चार घंटों के अंदर लगाना पड़ता है. हम कोशिश करते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में समय की बर्बादी न हो."

उन्होंने कहा, "ऐसे में हम हमेशा ट्रैफ़िक पुलिस के साथ तालमेल करते हैं और वो सड़कों पर ट्रैफ़िक को रोककर एक ग्रीन कॉरिडोर बना देते हैं. लोग भी जानते हैं कि किसी की जान बचाने के लिए दिल को ले जाया जा रहा है. इसलिए इस प्रक्रिया में सबका सहयोग मिलता है."

ग्रीन कॉरिडोर

चेन्नई पुलिस के अतिरिक्त कमिश्नर करुणा सागर बताते हैं कि मरीज़ों की जान बचाने के लिए इस तरह के ग्रीन कॉरिडोर वह पहले भी बना चुके हैं.

वे कहते हैं कि फ़र्क़ इतना रहा कि इस बार शाम के छह बजकर 47 मिनट पर पुलिस को ऐसा करना पड़ा, जब ट्रैफ़िक चेन्नई के इस 12 किलोमीटर के रास्ते पर अपने पूरे शबाब पर रहता है.

करुणा सागर ने बताया, "हम यह समय-समय पर करते रहते हैं. हमने दिन के हर पहर में इस तरह का काम किया है. मगर पीक आवर में हमने पहली बार ऐसा किया. यह निर्भर करता है कि कब, किसके अंग का प्रत्यारोपण हो रहा है और वह कब उपलब्ध है"

Image caption चेन्नई के अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर करुणा सागर कहते हैं कि यह पहला मौका है जब पीक आवर में यातायात रोका गया.

उन्होंने कहा, "पुलिस का काम सिर्फ क़ानून व्यवस्था और अपराधियों से जूझना नहीं होता. इसके और भी पहलू हैं. और ट्रैफ़िक पुलिस वालों की ज़िम्मेदारी तो और भी ज़्यादा हो जाती है."

दिल्ली पर ताज्जुब

मगर करुणा सागर ने आश्चर्य जताया कि दिल्ली जैसे महानगर में इस तरह की पहल पुलिस द्वारा क्यों नहीं की जाती?

वह कहते हैं, "दिल्ली में क्या होता है जब किसी मरीज़ के किसी अंग को प्रत्यर्पित किया जाता है? यह ताज्जुब की बात है. वहां भी इतने ही पुलिसकर्मी हैं, जितने हमारे पास हैं. वो भी चाहें तो ऐसा कर सकते हैं."

चेन्नई पुलिस की इस पहल की सराहना की जा रही है और उम्मीद की जा रहीं है कि दूसरे महानगरों में भी इस तरह के मामलों में ऐसी ही मुस्तैदी दिखाई जाएगी, ताकि दूर किसी अस्पताल में किसी की ज़िंदगी को वक़्त रहते बचाया जा सके.

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