भारत के लिए इराक़ संकट के मायने

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इराक़ और मध्य-पूर्व की भारत के लिए की तीन बड़ी अहमियत हैं. पहली ये कि भारत इराक़ से भारी मात्रा में तेल का आयात करता है.

हम इराक़ से लगभग 20 अरब डॉलर का तेल मंगाते हैं यानी हमारी ऊर्जा सुरक्षा में इराक़ की बड़ी अहमियत है.

दूसरी बड़ी बात यह है कि अगर इराक़ की स्थिति बेकाबू हो जाती है या इस संघर्ष की गिरफ़्त में पूरा मध्य पूर्व आ जाता है तो हमारी मुश्किलें बढ़ेंगी क्योंकि हमारे कुल तेल का 80 फ़ीसदी उसी इलाक़े से आता है.

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तीसरी बात यह है कि इससे हमारा कारोबार प्रभावित होगा. हम मध्य पूर्व से तेल मंगाते हैं और वहां पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात करते हैं.

वहां हमारी कई परियोजनाएं चल रही हैं. साथ ही उस क्षेत्र में हमारे 60-70 लाख लोग रहते हैं और काफ़ी पैसा स्वदेश भेजते हैं.

कारोबार

अगर आप इन सब चीजों को जोड़ लें तो आपको पता चलेगा कि भारत और मध्यपूर्व का क़रीब 230 अरब डॉलर यानी लगभग 138 खरब रुपए का कारोबार है.

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ऐसे में अगर इराक़ में स्थिति ख़राब होती है तो यह पूरा कारोबार प्रभावित होगा जो भारत के लिए चिंता का विषय होगा.

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इराक़ में अशांति होती है तो देश में तेल की क़ीमतें बढ़ जाती हैं.

सऊदी अरब के बाद इराक़ सबसे अहम तेल उत्पादक देश है. वहाँ 35 लाख बैरल तेल का उत्पादन होता है, जिसमें से दो-ढाई लाख बैरल तेल भारत आता है.

दुनिया पर असर

अगर इराक़ का उत्पादन प्रभावित होता है तो इसका असर भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

इराक़ में संयुक्त राष्ट्र ज़्यादा कुछ नहीं कर पाएगा क्योंकि वहां की जनता का पश्चिमी देशों पर से विश्वास उठ चुका है.

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मेरा मानना है कि बड़े तेल आयातक देशों जैसे भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप को मिलकर इराक़ में शांति व्यवस्था कायम करने की पहल करनी चाहिए.

सबसे पहली कोशिश यह होनी चाहिए कि इस गृहयुद्ध को फैलने से रोका जाए ताकि यह देश के तेल उत्पादक दक्षिणी हिस्से तक न पहुँच पाए. यह सभी के हित में रहेगा.

(बीबीसी संवाददाता अशोक कुमार से बातचीत पर आधारित)

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