'राज्यपालों को यूँ हटने के लिए कहना दुर्भाग्यपूर्ण'

  • 19 जून 2014
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संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी यूपीए के कार्यकाल में नियुक्त किए गए राज्यपालों को हटाए जाने के विवाद के बीच महाराष्ट्र के राज्यपाल के शंकर नारायणन ने कहा है कि संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति को मौखिक रूप से हटने के लिए कहा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है.

उन्होंने स्पष्ट किया है कि वह तब तक अपना पद नहीं छोड़ेंगे जब तक उन्हें इसके लिए लिखित रूप से नहीं कहा जाता. मुंबई से बीबीसी के साथ ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि वह मानते हैं कि सरकार को ये हक़ है कि वह अपने पसंद के राज्यपालों की नियुक्ति करे. "मगर यह सब कुछ गरिमापूर्ण तरीके से होना चाहिए."

शंकर नारायणन का कहना था कि उन्हें केंद्रीय गृह सचिव अनिल गोस्वामी ने फ़ोन किया था और कहा था कि वह अपना पद छोड़ दें.

उन्होंने बताया, "मैंने गृह सचिव से ऐसी उम्मीद नहीं की थी. यह सच है कि लोकतांत्रिक देश में कोई भी पद हमेशा के लिए नहीं होता. लेकिन यह सब कुछ उचित माध्यम से होना चाहिए. जिन्हें इसका अधिकार हो, यह उनकी तरफ से आना चाहिए. वरना ये एक अच्छे रूप में नहीं देखा जा सकता है."

लेकिन झारखंड के राज्यपाल सैय्यद अली के एडीसी तुषार मेनन ने बताया कि झारखंड के राजभवन में अभी तक इस तरह का ना तो कोई मौखिक और ना ही कोई लिखित संदेश मिला है.

संकेत

केंद्र में भाजपा की नई सरकार ने यह संकेत दिए हैं कि वो पिछली सरकार में नियुक्त किए गए कई राज्यपालों को हटाना चाहती है और कुछ राज्यपालों से केंद्रीय गृह सचिव ने फोन पर बात कर पद छोड़ने की सलाह भी दी.

लेकिन यह भी कहा जा रहा था कि सिर्फ उन राज्यपालों को हटाए जाने की बात कही जा रही है जिनके लंबे कार्यकाल बचे हुए हैं जबकि जिन राज्यपालों के कार्यकाल अगले चार छह महीनों में ख़त्म होने वाले हैं, उन्हें नहीं हटाया जाएगा.

जिन राज्यपालों पर गाज गिरने के संकेत हैं, उनमें महाराष्ट्र के राज्यपाल के शंकर नारायणन, केरल की शीला दीक्षित, पश्चिम बंगाल के एमके नारायणन और गुजरात की कमला बेनीवाल शामिल हैं.

उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशीने मंगलवार को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया जबकि छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त ने बुधवार को राष्ट्रपति से मिलकर अपना इस्तीफ़ा दे दिया.

वो भारतीय प्रशासनिक सेवा के 1969 बैच के अधिकारी रहे हैं जो अहम पदों पर रह चुके हैं. उनका कार्यकाल जनवरी 2015 को ख़त्म हो रहा था. उसी तरह कर्नाटक के राज्यपाल एचआर भारद्वाज का कार्यकाल 28 जून को ख़त्म हो रहा है.

विवाद

राज्यपालों की नियुक्ति और उनके हटाने की बात पर पहले भी विवाद रहे हैं. वर्ष 2004 में भी जब यूपीए सत्ता में आई थी तब भी गुजरात, गोवा, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के राज्यपालों को हटाया गया था. उस वक़्त कैलाशपति मिश्रा गुजरात, विष्णुकांत शास्त्री उत्तर प्रदेश, और बाबू परमानंद हरियाणा के राज्यपाल थे.

हलांकि इस विवाद पर मिलीजुली प्रतिक्रिया आ रही है. कुछ सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला रहे हैं जिसमें कहा गया है कि राज्यपालों को हटाया नहीं सकता है.

वहीं झारखंड के पूर्व राज्यपाल वेद मारवाह कहते हैं कि सरकार को इस मामले में पूरा अधिकार है.

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वो कहते हैं, "राज्यपालों को खुद ही इस्तीफा दे देना चाहिए. असली समस्या नियुक्तियों में ही है. अब अगर आप राजनीतिक लोगों को राज्यपाल बनाएंगे, जो राजभवन को राजनीतिक अखाड़ा बनाएंगे तो ये समस्या बार-बार आएगी. सरकारिया आयोग की बड़ी साफ़ सिफारिश है कि किस तरह के लोगों को राज्यपाल बनाया जाए. लेकिन दुर्भाग्य है कि कोई भी नहीं मानता."

मारवाह ने उम्मीद जताई कि नई सरकार सरकारिया आयोगकी सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए नए राज्यपालों की नियुक्ति करेगी.

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