सत्ता की रेवड़ियाँ बाँटने के नियम क्यों नहीं बनते?

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नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपने मंत्रियों को निर्देश दिया है कि वे अपने साथ ऐसे मंत्रालयी कर्मचारियों को ‘किसी भी रूप में’ न रखें जो यूपीए सरकार के मंत्रियों के साथ काम कर चुके हैं. यह निर्देश अपने ढंग का अनोखा है और नौकरशाही के राजनीतिकरण को रेखांकित करता है.

नई सरकार बनने के साथ नियुक्तियां और इस्तीफे चर्चा का विषय बन रहे हैं.

शुरुआत प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्र की नियुक्ति से हुई थी, जिसके लिए सरकार ने एनडीए सरकार के बनाए एक नियम को बदलने के लिए अध्यादेश का सहारा लिया था.

राज्यपालों, अटॉर्नी और एडवोकेट जनरलों, महिला आयोग और अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग या योजना आयोग के अध्यक्षों तक मामला समझ में आता है.

हम मानकर चल रहे हैं कि ऐसे पदों पर नियुक्तियाँ राजनीतिक आधार पर होती हैं लेकिन इस निर्देश का मतलब क्या है? क्या यह नौकरशाही की राजनीतिक प्रतिबद्धता का संकेत नहीं है?

नियुक्तियों का दौर शुरू हुआ है तो अभी यह चलेगा. मंत्रिमंडल में बड़ा बदलाव होगा. फिर दूसरे पदों पर. यह क्रम नीचे तक जाएगा. ऊँचा अधिकारी नीचे की नियुक्तियाँ करेगा. पर कुछ सवाल खड़े होंगे, जैसे इस बार राज्यपालों के मामले पर हो रहे हैं.

इनाम-इकराम का चलन

सत्ता परिवर्तन के साथ विजेता दल का अपने समर्थकों को उपकृत करना अब दुनिया भर की मान्य परंपरा है लेकिन भारत में यह बड़े अटपटे ढंग से विकसित हो रही है. इस बार भी सरकार के शपथ लेते ही नियुक्तियाँ शुरू हो गईं.

प्रधानमंत्री के निर्देश पर भाजपा की एक महिला सांसद को अपने पिता को अपने चुनाव क्षेत्र में अपना प्रतिनिधि नियुक्त करने का फ़ैसला वापस लेना पड़ा.

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वह फ़ैसला तो वापस हो गया लेकिन राजदूतों, राज्यपालों, आयोगों, निगमों, परिषदों, समितियों और अकादमियों के अध्यक्ष, सहकारी और ग्रामीण बैंकों के चेयरमैन वगैरह के राजनीतिक दरवाज़े से भीतर आने का चलन ख़त्म होने वाला नहीं है. चूंकि नियुक्ति राजनीतिक रास्ते से होती है, इसलिए सत्ता परिवर्तन के समय थोक के भाव इस्तीफ़े या बर्खास्तगियाँ भी लाज़मी हैं.

दिक्कत तब होती है जब राजनीति और ग़ैर-राजनीति का भेद मिटता है. सुप्रीम कोर्ट की इच्छा है कि बड़े स्तर पर पुलिस सुधार हो लेकिन कांस्टेबल तक की नियुक्ति में राजनीति प्रवेश कर गई है.

डॉक्टरों, इंजीनियरों, जूनियर इंजीनियरों से लेकर टीचरों तक की नियुक्ति, तबादले, तरक्की तक राजनेताओं के हवाले हो रही है. राज्यों में लालबत्ती संस्कृति ने प्रशासनिक पदों पर भी राजनीतिक नियुक्ति के रास्ते खोल दिए है.

इसे राजनीति के ग्रास रूट तक जाने की प्रक्रिया का हिस्सा तो नहीं माना जा सकता. अमरीका में राजनीतिक भर्तियों को ‘स्पॉइल्स सिस्टम’ और योग्यता के आधार पर भर्ती को ‘मेरिट सिस्टम’ कहते हैं. हमारा मेरिट सिस्टम स्पॉइल क्यों हो रहा है?

आदर्श राजनीति संभव नहीं?

पिछले लोकसभा चुनाव में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने वोट नहीं डाला.

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उनके प्रेस सचिव के अनुसार, "राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में अपनी तटस्थता दिखाने के लिए उन्होंने अपना वोट नहीं दिया."

राष्ट्रपति के इस कदम पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं हुईं लेकिन यह एक परंपरा की शुरूआत थी. वैसे ही जैसे ब्रिटिश संसद में स्पीकर का पद, जो पूरी तरह राजनीति से बाहर है.

हमारे देश में स्पीकर का पद राजनीति से परे नहीं है लेकिन ब्रिटेन में हाउस ऑफ कॉमन्स का जो सदस्य स्पीकर चुना जाता है वह पहले अपने राजनीतिक दल से त्यागपत्र देता है.

स्पीकर चुने जाने के बाद वह अगले चुनाव के बाद भी स्पीकर पद पर बना रहता है. वह जिस क्षेत्र से चुना जाता है वहाँ से उसके ख़िलाफ़ किसी दल का प्रत्याशी चुनाव नहीं लड़ता. यह परंपराओं को बनाने की बात है.

आचार संहिता क्यों नहीं?

पुराने राजदरबारों से लेकर आधुनिक लोकतंत्र तक राज्याश्रय एक स्वीकृत परंपरा है. खास तौर से कलाकारों, रंगकर्मियों, लेखकों, साहित्यकारों, पत्रकारों और विचारकों आदि को सम्मान देने की एक पद्धति यह भी है.

हमारे यहाँ राज्यसभा में सदस्यों के मनोनयन की परंपरा है. राजनीतिक नियुक्तियों पर भी आपत्ति नहीं है लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि किस पद से किन हालात में हट जाना होगा.

माना जाता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा राजनीतिक नियुक्तियाँ अमेरिका में होती हैं. अमेरिका में 19वीं सदी में राजनीतिक विजय के बाद बख्शीश के तौर पर सरकारी पद देने की परंपरा शुरू हुई थी. लेकिन समय के साथ वहाँ की परंपराएं विकसित हुईं.

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पेंडलटन एक्ट (1883) और हैच एक्ट (1939) जैसे कानूनी व्यवस्थाएं भी वहाँ की गईं. वहाँ के जज राजनीतिक आधार पर नियुक्त होते हैं, लेकिन वे काम न्यायिक मूल्यों के आधार पर करते हैं. उनके यहाँ सरकारी नैतिकता का एक अलग विभाग है.

सत्ता परिवर्तन के बाद जिन पदों से इस्तीफ़े देने होते हैं वे हो जाते हैं और जिन पदों पर सत्ता परिवर्तन के बावजूद कार्यकाल पूरा होने तक बने रहना है वे बने रहते हैं. पार्टी के लिए धन संग्रह करने वाले राजदूत वहाँ भी बनते हैं लेकिन सत्ता परिवर्तन होते ही वे इस्तीफ़ा देते हैं.

कौन सा पद राजनीतिक, कौन सा अराजनीतिक?

कौन सा पद राजनीतिक है और कौन सा अराजनीतिक इसका फ़ैसला कैसे होगा? इस बार नई सरकार के आते ही अटॉर्नी जनरल गुलाम वाहनवती और सॉलीसिटर जनरल मोहन पारासरन ने इस्तीफ़े सौंप दिए. मुकुल रोहतगी की नियुक्ति अटॉर्नी जनरल के रूप में हो गई.

हालांकि अटॉर्नी जनरल और सॉलीसीटर जनरल संवैधानिक पद हैं. ऐसे पदों से लोगों को हटाया नहीं जाता. परंपरा है कि नई सरकार आने के बाद पुरानी सरकार के विधि अधिकारी अपने पद से ख़ुद इस्तीफा दे देते हैं.

इसके विपरीत राज्यपालों के मामले में परंपरा की शुरूआत बर्खास्तगी से हुई थी. सन 1977 में पहला मौका था जब केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ और थोक के भाव राज्यपाल हटाए गए.

वह एक कटु अनुभव था, जो परंपरा बन गया. हमारा लोकतंत्र अपेक्षाकृत नया है और परंपराओं को पनपने के लिए भी समय चाहिए.

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नियम तो बन सकते हैं

बर्खास्तगी से ज़्यादा महत्वपूर्ण है नियुक्ति. नियुक्ति की परंपरा भी होनी चाहिए. पिछले दिनों केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) पीजे थॉमस की नियुक्ति का मामला अदालत तक गया. चयन के लिए जो तीन सदस्यीय समिति थी उसकी बैठक में नेता विपक्ष सुषमा स्वराज ने थॉमस की नियुक्ति पर विरोध दर्ज कराया था. चूंकि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने उसकी अनदेखी की इसलिए नियुक्ति हो गई.

लोकपाल विधेयक पर चर्चा के दौरान सर्च कमेटी और नियुक्ति करने वाली टीम को लेकर मतभेद लगातार बना रहा. यूपीए की पिछली सरकार लोकपाल की नियुक्ति में अतिशय तेज़ी दिखा रही थी लेकिन सरकार को उस वक़्त फ़ज़ीहत झेलनी पड़ी, जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश केटी थॉमस और न्यायविद फली एस नरीमन ने सर्च कमेटी की सदस्यता ठुकरा दी.

विवादास्पद नियुक्तियाँ गलत परंपराएं स्थापित करती हैं. इन दिनों राज्यपालों की नियुक्ति को लेकर चर्चा हो रही है, जिसका मूल आधार सुप्रीम कोर्ट का एक फ़ैसला है. अदालत के अनुसार राज्यपाल केंद्र सरकार का एजेंट नहीं है और न किसी राजनीतिक टीम का सदस्य है लेकिन यदि नियुक्ति का आधार राजनीतिक होगा तो वह पद राजनीतिक होने से कैसे बचेगा?

इसके पहले सरकारिया आयोग की सलाह थी कि राज्यपाल का चयन राजनीति में सक्रिय व्यक्तियों में से नहीं होना चाहिए. कम से कम केंद्र में सत्तारूढ़ दल का व्यक्ति तो कदापि नहीं. आयोग की सलाह थी कि राज्यपालों का चयन केंद्र सरकार नहीं, बल्कि एक 'स्वतंत्र न्यायिक संस्था' करे. यह फैसला अंततः राजनीति को ही करना होगा.

जजों की नियुक्ति

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यह अलग से चर्चा का विषय हो सकता है. अगले सप्ताह 25 जून को इमरजेंसी के 39 साल पूरे हो जाएंगे. जनवरी 1977 में तत्कालीन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में एचआर खन्ना की वरिष्ठता की अनदेखी की तब एक ग़लत परंपरा की शुरुआत हुई थी.

सरकार के उस कदम से आहत जस्टिस खन्ना ने उसी दिन इस्तीफ़ा दे दिया. जस्टिस खन्ना को उनके साहस के लिए याद किया जाता है. पाँच सदस्यों की संविधान पीठ में केवल उन्होंने इमरजेंसी को ग़लत बताया था. उसके बाद से जजों की नियुक्ति को लेकर जो बहस चल रही है, वह अभी पूरी नहीं हुई है.

देर-सबेर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की व्याख्या कर नियुक्ति के सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए. कॉलेजियम व्यवस्था का जन्म हुआ और जजों की नियुक्ति का अधिकार पूरी तरह सरकार के हाथ से चला गया. अब कॉलेजियम व्यवस्था भी सवालों के घेरे में हैं.

पिछली यूपीए सरकार ने संविधान (संशोधन) बिल पेश किया था ताकि जजों की नियुक्ति में राजनीतिक कार्यपालिका की भूमिका भी हो. यह विमर्श अभी अधूरा है. न्यायिक नियुक्तियाँ और न्यायिक ज़िम्मेदारी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाई हैं. राजनीति वहाँ भी किसी न किसी रूप में मौजूद है.

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