भारतीय हॉकी: तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में..

  • 28 जून 2014
अजितपाल सिंह विश्वकप चैम्पियन की ट्रॉफ़ी के साथ Image copyright bhartiyahockey.org
Image caption अजितपाल सिंह विश्वकप चैम्पियन की ट्रॉफ़ी के साथ

अगर आप भारतीय खेल जगत के यादगार लम्हों की एक सूची बनाएं तो आपको इस दृश्य को ज़रूर शामिल करना होगा कि मोहम्मद इस्लाहउद्दीन की अगुवाई में पूरी पाकिस्तानी फॉरवर्ड लाइन भारतीय डी में है. सुरजीत सिंह, अब्बास के सेंटर को क्लीयर करने की कोशिश कर रहे हैं...गेंद छिटककर अजीतपाल सिंह की स्टिक पर आती है..और वो बिना अपना संयम खोए ड्रिबल करते हुए गेंद डी के बाहर लाते हैं.

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तभी फ़ाइनल व्हिसिल बजती है..गोलकीपर अशोक दीवान हवा में अपनी स्टिक उछाल देते हैं और कप्तान अजीतपाल सिंह झुककर मर्डेका मैदान की धरती चूम लेते हैं...भारत हॉकी का विश्व चैंपियन है. लेकिन अब यह इतिहास है...39 साल पुराना इतिहास. तब का दिन और आज का दिन..

भारत ने ओलंपिक या विश्व कप जीतना तो दूर, इन प्रतियोगिताओं के सेमीफ़ाइनल तक में जगह नहीं बनाई है. हाल ही में हॉलैंड में हुई विश्व प्रतियोगिता में भारत को नौंवे स्थान पर ही संतोष करना पड़ा.

'विश्वस्तर के खिलाड़ी नहीं'

साल 1968 के ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान और बाद में भारत के कोच बने गुरबख़्श सिंह कहते हैं, ''सबसे पहले मानना पड़ेगा देश, कोचेज़ और हमारी टीम को कि हमारी पोज़ीशन विश्व हॉकी में यही है. यह एक कटु सत्य है कि साल 1980 के ओलंपिक खेलों के बाद भारत ने हॉकी में विश्वस्तर की कोई प्रतियोगिता नहीं जीती है.''

वे कहते हैं, ''जब नए कोच आकर नई-नई उम्मीदें दिलाते हैं तो वो देश और खिलाड़ी दोनों को हॉकी की स्थिति के बारे में ग़लत आभास देते हैं. हमें मानना भी होगा कि हमारे पास विश्वस्तर के खिलाड़ी नहीं हैं.''

'विदेशी कोच हल नहीं'

अभी तक कहा जाता था कि भारतीय कोच, भारतीय टीम को अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रशिक्षण देने के क़ाबिल नहीं हैं. लेकिन पिछले कई साल से गरहार्ड राक, जोस ब्रासा, माइकल नौब्स और अब टेरी वॉल्श भारतीय टीम को प्रशिक्षण दे रहे हैं.

वॉल्श का मासिक वेतन 12,500 डॉलर यानी सात लाख पचास हज़ार रुपए प्रति माह है. लेकिन नतीजे के नाम पर वह भी सिफ़र हैं.

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Image caption जून 2014 में विश्वकप हॉकी प्रतियोगिया में मलेशिया के ख़िलाफ़ भारतीय खिलाड़ी आकाशदीप सिंह

भारत के सर्वश्रेष्ठ लेफ़्ट इन रहे मोहम्मद शाहिद कहते हैं, ''विदेशी कोच भारत में अभी तक कुछ नहीं कर पाए हैं. अगर वो इतने अच्छे होते तो अपने देश की ही टीम को ट्रेनिंग दे रहे होते.''

पूर्व भारतीय कप्तान धनराज पिल्लै का भी मानना है कि वॉल्श की सेवाओं से भारतीय टीम को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ है.

'रक्षण कमज़ोर कड़ी'

हाल में हुए विश्व कप में सबसे ज़्यादा निराश किया है भारतीय रक्षण ने. भारतीय टीम ने कुल मिलाकर 26 पेनल्टी कॉर्नर दिए. वह तो शुक्र है कि भारतीय गोलकीपर श्रीजेश ने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया वरना भारतीय टीम ने कम से कम दर्जनभर गोल और खाए होते.

ब्रिगेडियर एचजेएस चिमनी साल 1975 में विश्व कप जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे हैं.

वह कहते हैं, ''इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारा रक्षण बहुत कमज़ोर था...इसी वजह से आख़िरी मिनटों में भारतीय टीम पर गोल हुए. हम न तो मैन टू मैन मार्किंग कर पाते हैं और न डिफ़ेंस में होने वाले गैप को कवर कर पाते हैं.''

चिमनी कहते हैं, ''हमने देखा है कि डिफ़ेंस में अगर हमारे छह खिलाड़ी हैं और उनके तीन खिलाड़ी हैं, तब भी वह हमारे ऊपर गोल कर जाते हैं. कई बार डिफ़ेंडर स्पेस को मार्क करता है खिलाड़ी को नहीं. इससे होता यह है कि अगर खिलाड़ी के पास गेंद आ जाती है तो वह इसका फ़ायदा उठा लेता है.''

'क्लब साइड में भी जगह नहीं'

पहले भारत के फ़ुल बैक अच्छे रक्षक होने के साथ साथ अच्छे पेनल्टी कॉर्नर विशेषज्ञ भी होते थे. अब हालात बदल गए हैं. अगर आप अच्छे रक्षक हैं तो पेनल्टी कॉर्नर लेने में आपका हाथ तंग है. इस विश्व कप में भारत को कुल 18 पेनल्टी कॉर्नर मिले लेकिन वह उनमें से एक भी सीधा गोल नहीं कर सके.''

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Image caption सरदारा सिंह को फिलहाल भारत का एकमात्र विश्वस्तरीय खिलाड़ी माना जा रहा है.

गुरबख़्श सिंह कहते हैं, ''हमारे समय में और बाद में सुरजीत, किंडो, असलम या उनसे पहले पृथीपाल सिंह, जेंटिल, धर्म सिंह पेनल्टी कॉर्नर स्पेशलिस्ट होने के साथ-साथ अच्छे रक्षक भी थे. उनके टीम में चुनने का मापदंड यह होता था कि वो कितने अच्छे रक्षक थे. वो अपने 25 यार्ड या डी में विपक्षी खिलाड़ी को आने देंगे या नहीं. हम रक्षण कभी भी गोलकीपरों के ऊपर नहीं छोड़ते थे.''

वे कहते हैं, ''आज खेल बदल गया है. ऑफ़ साइड रूल चेंज हो गया है. लेकिन हमारे रक्षकों को सिर्फ़ पेनल्टी कॉर्नर में महारत के आधार पर चुना जाता है. रक्षण में वो बिल्कुल ज़ीरो हैं. मुझे यह कहने में शर्म नहीं हैं कि अगर सिर्फ़ रक्षण की क्षमता के धार पर उन्हें चुनना हो मैं उन्हें अपनी क्लब साइड में भी जगह नहीं दूंगा.''

'एस्ट्रो टर्फ़ है विलेन'

शुरू से ही एस्ट्रो टर्फ़ को भारतीय खिलाड़ियों के ख़राब प्रदर्शन के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता रहा है. लेकिन एस्ट्रो टर्फ़ को अंतरराष्ट्रीय हॉकी में आए 38 साल हो चुके हैं. अब कम से कम यह तो नहीं कहा जा सकता कि एस्ट्रो टर्फ़ उनके लिए नई चीज़ है.

ब्रिगेडियर चिमनी कहते हैं, ''घास और एस्ट्रो टर्फ़ में ज़मीन-आसमान का फ़र्क है. हमारे उभरते हुए खिलाड़ी अपनी शुरुआती हॉकी घास पर खेलते हैं. लेकिन जब वो किसी स्तर पर आ जाते हैं तो उन्हें एस्ट्रो टर्फ़ पर खेलना होता है. इसका मतलब ये हुआ कि हम अपने बेसिक तो घास पर सीख रहे हैं लेकिन ऊंचे स्तर पर हॉकी आर्टिफ़िशियल सतह पर खेल रहे हैं.''

वे कहते हैं, ''एस्ट्रो टर्फ़ पर खेल बहुत तेज़ होता है. घास में अगर कोई फ़ाउल हो गया, गेंद बाहर चली गई तो आपको बीच में आराम करने का मौका मिल जाता है. एस्ट्रो टर्फ़ में ऐसा नहीं होता. अगर 70 मिनट का खेल हो रहा है तो वेस्टेज टाइम बहुत कम होता है.''

एक खिलाड़ी काफ़ी नहीं

भारतीय हॉकी टीम में इस समय विश्व स्तर का सिर्फ़ एक खिलाड़ी है सरदारा सिंह और भारतीय टीम की बेंच स्ट्रेंथ भी बहुत मामूली है.

मोहम्मद शाहिद को भी इस बात का बहुत मलाल है, ''एक सरदारा है जो टीम को लेकर चलता है. एक खिलाड़ी से माफ़ कीजिए आप ओलंपिक, विश्व कप या एशियन गेम्स नहीं जीत सकते हैं. बाहर बैठने वाले खिलाड़यों का स्तर भी उतना ही होना चाहिए जितना कि खेल रहे खिलाड़ियों का.''

महान और अच्छे खिलाड़ी का फ़र्क

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Image caption वर्ष 1936 के ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक विजेता भारतीय हॉकी टीम

भारतीय हॉकी टीम के बेसिक स्किल जैसे ट्रैपिंग यानि गेंद को रोकने, पासिंग और पास रिसीव करने की क्षमता पर भी सवाल उठाए जाते रहे हैं.

गुरबख़्श सिंह कहते हैं, ''एक अच्छे खिलाड़ी और टॉप क्लास खिलाड़ी में यही फ़र्क है कि अच्छा खिलाड़ी गेंद आने के बाद यह सोचता है कि वो गेंद को कहां पास करे लेकिन महान खिलाड़ी को यह पहले से ही मालूम होता है कि उसे गेंद कहां देनी है. सरदारा ऐसा ही करता है. दुनिया के 90 फ़ीसदी बड़े खिलाड़ी ऐसा करते हैं.''

वे कहते हैं, ''देखने के पहले उनको यह मालूम होता है कि उनका कौन सा प्लेयर फ़्री है. जब तक उसके पास गेंद आ रही है, वो एक सेकेंड के सौंवे हिस्से में अपने और विपक्षी खिलाड़ी के मौजूद होने का अंदाज़ा लगा लेते है. हमारे यहां खिलाड़ी बॉल लेकर दाएं देखता है, बाएं देखता है, उसे ड्रिबल करने की कोशिश करता है. जब उसे लगता है कि कुछ नहीं हो रहा है तो वो गेंद पीछे दे देता है.''

कोच की ट्रेनिंग

सवाल उठता है कि भारत के राष्ट्रीय खेल से अब उम्मीदें हैं भी या नहीं? क्या अब भी भारतीय हॉकी को रसातल से उठाया जा सकता है?

ब्रिगेडियर चिमनी कहते हैं, ''भारतीय टीम को विदेशी टीमों के समकक्ष आने में समय लगेगा क्योंकि उनकी और हमारी तैयारी में काफ़ी अंतर है. शॉर्ट-टर्म में हमें 40-50 खिलाड़ियों के कोर समूह को गहन ट्रेनिंग देनी चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय मैचों में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे. दूसरे हमें आठ से दस साल की योजना बनानी होगी और इसके लिए हमें ग्रास-रूट लेवेल पर जाना पड़ेगा.''

वे कहते हैं, ''इसके लिए हमें 10-12 साल के बच्चों को अपने दायरे में लाना होगा. यह देखना होगा कि इनमें से कौन आगे चलकर बड़ा खिलाड़ी बन सकता है. उनको हॉकी अकादमियों में रखना होगा. हमें अपनी निचले स्तर की कोचिंग के स्तर को भी उठाना होगा. अगर हम छोटे बच्चे को ढंग से नहीं सिखाएंगे तो बड़ा होकर उसे बदलने में बहुत वक़्त लगेगा. हमारा कोचिंग पैटर्न ऐसा होना चाहिए कि सभी स्तर के कोचों का स्तर एक ही हो ताकि खिलाड़ी को दूसरे खिलाड़ी के साथ सामंजस्य बैठाने में समय न लगे.''

आप इसे दुख कहिए या पीड़ा, ग़ुस्सा या नाराज़गी, जब भी भारतीय टीम ख़राब खेलती है, तीव्र भावनाएं उभरकर सामने आती हैं. अल्लामा इक़बाल की कुछ पंक्तियां बरबस याद आती हैं-

तेरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में, न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों, तुम्हारी दास्तां भी न होगी दास्तानों में.

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