पश्चिमी देशों की 'नज़र' भारतीय रक्षा ख़र्च पर

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नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता संभालते ही भारत में विदेशी नेताओं का आगमन तेज़ हो गया है.

फ़्रांस के विदेश मंत्री फ़िलहाल दौरे पर हैं और दो हफ़्ते पहले रूस के उप-प्रधानमंत्री दिमित्री रोगोजिन अपनी यात्रा से लौट चुके हैं.

दुनिया के विकसित देश भारत को एक बड़े बाजार के तौर पर देख रहे हैं और इसमें रक्षा सौदे एक अहम मुकाम रखते हैं.

जेन डिफेंस पत्रिका के अनुसार रूस अब भारत में हथियारों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता नहीं रहा है और अमरीका ने इसमें बाज़ी मार ली है.

इस पत्रिका के राहुल बेदी ने कहा, "वर्ष 2022 तक भारत की सेनाएं लगभग 80 अरब डॉलर के नए हथियार खरीदेंगी. ज़ाहिर है दुनिया की नज़रें भारत की खरीद पर रहेंगी".

बताया जा रहा है कि जुलाई में ब्रिटेन के विदेश मंत्री भी भारत के दौरे पर आएँगे.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय सेनाओं के चाक-चौबंद होने पर ख़ासा ज़ोर दिया था.

जानकारों के मुताबिक़ सरकार इस बात पर भी ग़ौर करेगी की रक्षा उपकरणों के उत्पादन में विदेशी निवेश को मौजूदा 26% से बढ़ाया जाए.

इस सुगबुगाहट ने विदेशी रक्षा कंपनियों के हौसले भी बढ़ाए ही होंगे.

राहुल बेदी के अनुसार, "पिछले कुछ वर्षों में रक्षा सौदों में हुए कुछ कथित घोटालों के चलते पिछली सरकार ने फ़ैसला लेना धीमा कर दिया था लेकिन नई सरकार आने के बाद इसमें तेज़ी देखी जा सकती है".

भारतीय सेनाओं ने पिछले कुछ वर्षों से इस बात पर ख़ासा ज़ोर दिया है कि उनके पास मौजूदा हथियारों के नवीनीकरण का समय आ चुका है और नए हथियारों की खरीद में तेज़ी आनी चाहिए.

लेकिन 2013-14 के वार्षिक बजट में रक्षा मामलों पर होने वाला निर्धारण सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.74% था जो पिछले कुछ दशकों में सबसे कम बताया गया है.

हालांकि रक्षा उपकरण उत्पादन मामलों में विदेशी निवेश बढ़ाए जाने की संभावित योजना पर मोदी सरकार को विपक्ष के साथ-साथ घरेलू उत्पादकों के विरोध का भी सामना करना पड़ सकता है.

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