बजट, किसान और 'ग़रीबनवाज़' मोदी

  • 7 जुलाई 2014
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खेती में निवेश भारतीय किसान की सबसे बड़ी समस्या है. चौथी से 12वीं पंचवर्षीय योजना में राष्ट्रीय आय का 1.3 फ़ीसद से भी कम कृषि में निवेश हुआ.

नई सरकार के हाथ कई वजहों से बंधें हैं लेकिन किसानों के लिए वो न्यूनतम समर्थन मूल्य में सुधार, टैक्स सुधार और बाज़ार की प्रणाली का सरलीकरण जैसे क़दम उठा सकती है.

मेरा मानना है कि किसनों की दिक्कतों को कम करने के लिए कृषि रीटेल को देसी और विदेशी निवेश के लिए खोल दिया जाना चाहिए.

किसानों का कुछ भला तभी हो सकता है जब कृषि भूमि को सींचने के लिए 10 साल की एक जल विकास योजना बने.

किसानों के लिए सरकार बजट में क्या कर सकती है इस पर पूरा विश्लेषण आगे पढ़े

भारतीय किसान की सबसे बड़ी समस्या है कि खेती में निवेश नहीं हो रहा है. योजना आयोग के पांच साल के अनुभव और कृषि राज्य मंत्री रहने के बाद मैं ये बात अधिकारपूर्वक कह सकता हूं.

चौथी पंचवर्षीय योजना से लेकर वर्तमान बारहवीं पंचवर्षीय योजना तक खेती में निवेश सकल घरेलू उत्पाद यानी राष्ट्रीय आय का मात्र 1.3 फ़ीसदी या उससे भी कम रहा है.

अर्थव्यवस्था के घटक के तौर पर देखें तो खेती देश की 62 फ़ीसदी जनसंख्या को आजीविका का स्रोत है. देश की कुल आय में 13.7 फीसदी का योगदान देता है और कुल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 12 फ़ीसदी है. 50 से 52 फ़ीसदी श्रम शक्ति को रोज़गार प्रदान करता है. अब ऐसे क्षेत्र में जब 1.3 फ़ीसदी का निवेश होगा, तो उसमें क्या बढ़ोतरी होगी?

ऐसे में जो भी हो रहा है, वो किसानों की अपनी बदौलत हो रहा है. इस 1.3 फ़ीसदी के निवेश में निजी निवेश भी शामिल है. अगर इसमें सरकार के निवेश को देखें तो वह तो 0.3 फ़ीसदी से भी कम की है.

निवेश की समस्या सीधे बजट से संबंधित है. ऐसे में नई सरकार से उम्मीद है. देश के प्रधानमंत्री एक गरीब घर में पैदा हुए हैं, लिहाजा आशा है कि उनकी संवेदनशीलता ग्रामीण समुदाय, किसान या कहें गरीब के प्रति बनी रहेगी.

कोई उम्मीद नहीं

लेकिन सरकार को काफी कम वक्त मिला है, लिहाजा किसी आमूल परिवर्तन होने की उम्मीद नहीं है. पहले से ही बंधे खर्चे देखते हुए सरकार कुछ अलग नहीं कर पाएगी. उदाहरण के लिए खाद्य सुरक्षाके लिए 1.25 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा. इसके अलावा 67 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी है.

12 लाख करोड़ रुपये में दो लाख करोड़ रुपये यहीं खर्च हो गए. इसके अलावा वेतन, फौज, पुलिस, कर्ज़ वापसी और तीन-चार अनुदान राशियों के खर्चे भी हैं.

तो इस बजट में वित्त मंत्री कृषि क्षेत्र में निवेश की बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती. पैसा आवंटन के लिहाज से आशा नहीं रखनी चाहिए. इसके लिए सरकार और वित्त मंत्री को कम से कम एक साल का वक्त जरूर देना चाहिए.

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हालांकि सरकार कुछ संरचनात्मक और कुछ नीतिगत बदलाव कर सकती है.

मसलन अनाज के दामपर नियंत्रण के लिए कदम उठाया जा सकता है. किसी एक चीज़ का दाम पूरे भारत में बढ़ जाता है, तब आसमान सिर पर उठा लिया जाता है. लेकिन इसमें किसान को कितना मिलता है?

पंजाब और हरियाणा में ग्रीन हाउसेज लगाकर दोनों सरकारों के अनुदान के चलते खीरा और टमाटर का काफी उत्पादन हुआ. किसानों को दो-तीन रुपये मिलता है. लेकिन बाज़ार में वह 15 से 20 रुपये बिक रहा है. मंडी से बाहर आते ही वह इतना महंगा कैसे हो गया?

कृषि मंत्रालय की क्या ज़रूरत?

इस विसंगति को दूर किए जाने की ज़रूरत है. यह सरकारी नीति के कारण है. केंद्र सरकार कहती है कि यह राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है. इसका स्पष्टीकरण ज़रूरी है. अगर यह राज्य सरकार का विषय है तो केंद्र में कृषि मंत्रालय को बंद कर देना चाहिए. इस मंत्रालय में सात हज़ार से ज़्यादा कर्मचारी काम करते हैं. इसकी क्या ज़रूरत है?

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दरअसल न्यूनतम समर्थन मूल्य और बाज़ार मूल्य के बीच के अंतर को ख़त्म करने की जरूरत है. किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण भी वैज्ञानिक आधार पर होना चाहिए. कृषि आधारित सभी चीज़ों पर से टैक्स हटाना चाहिए और इनके लिए पूरे भारत को एक बाज़ार माना जाना चाहिए. कृषि रिटेल को खोल देना चाहिए, चाहे वह विदेशी निवेश हो या देशी.

बाज़ार की प्रणाली का सरलीकरण आवश्यक है. मंडी विपन्नण (मार्केटिंग) समिति क़ानून को बदलने की जरूरत है. यह सब संभव तो है लेकिन इसको करने के लिए नीयत का अभाव दिखता है.

सिंचाई में निवेशकरने की जरूरत है. 60 फ़ीसदी खेती वर्षा पर आधारित है.

मैंने प्रस्ताव दिया था कि देश में 10 साल की जल विकास योजना बने, जिस पर पांच लाख करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान था. पचास हज़ार करोड़ सलाना. इसमें आधा केंद्र और बाक़ी राज्य सरकारों का हिस्सा होना चाहिए. इसके ज़रिए देश के 80-85 फ़ीसदी कृषि भूमि को सिंचित भूमि में बदला जा सकता है.

(बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित)

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