भारत-ब्रिटेन रिश्ता: चुनौतियों का पहाड़

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भारत और ब्रिटेन के गिरते व्यापार और तल्ख़ होते रिश्तों के बीच ब्रितानी वित्त मंत्री जॉर्ज ऑसबॉर्न और विदेश मंत्री विलियम हेग भारत दौरे पर हैं.

इस दौरे के ज़रिए दोनों ब्रितानी मंत्री अपने मुल्क के लिए ज़्यादा पैसे और बेहतर ताल्लुक़ात की तलाश में हैं.

साल 2010 में जब डेविड कैमरन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने तो भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया था.

लेकिन हुआ इसका उलटा. साल 2011-12 में दोनों देशों का व्यापार 16 अरब पाउंड यानी लगभग 16.44 खरब रुपए का था जो साल 2012-13 में घटकर 14 अरब पाउंड यानी लगभग 14.39 खरब रुपए का हो गया.

रक्षा संबंधों में भी हाल ऐसे ही हैं, जिनसे संबंधों को आगे बढ़ाने में संकोच हो सकता है.

रक्षा सौदा

भारत ने 20-25 साल पहले ब्रिटेन से वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीदा था और उनमें एक भी हेलिकॉप्टर ठीक नहीं निकला.

चीन जब किसी से रक्षा सौदा करता है तो कहता है पहले हमें टेक्नॉलॉजी दो और हमारे यहां फैक्टरी लगाओ.

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लेकिन ब्रिटेन का अपनी टेक्नॉलॉजी के हस्तांतरण को लेकर उदासीन रवैया है.

चीन, जापान, जर्मनी समेत तमाम देश भारत में अपना इकॉनॉमिक हब बना रहे हैं लेकिन ब्रिटेन नहीं.

रक्षा संबंध तभी आगे बढ़ सकता है जब विवादरहित रक्षा सौदे हों. संबंध ऐसे हों जो सिर्फ तेल की खरीद तक सीमित ना हो.

वीज़ा समस्या

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दोनों देशों के बीच सबसे बड़ी समस्या वीज़ा की है जिस पर ब्रिटेन को ध्यान देना चाहिए.

ब्रिटेन का वीज़ा इतना महंगा है और इतना मुश्किल है कि उसे पाना ऐसा लगता है मानो चांद पर जाना आसान हो जाएगा लेकिन ब्रिटेन जाना उससे भी मुश्किल.

वीज़ा के महंगे होने से पर्यटन और निवेश की संभावनाओं को धक्का लगता है.

यह यात्रा उस वक्त हो रही है जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार ने एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की बागडोर संभाली है.

(बीबीसी संवाददाता वर्तिका की राजीव डोगरा से हुई बातचीत पर आधारित)

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