मोदी सरकार से तस्लीमा को क्या उम्मीद है?

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बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन को साल 1994 में अपना देश छोड़ना पड़ा था. उस समय बांग्लादेशी सरकार और अदालतों पर इस्लामी कट्टरपंथियों का बहुत दबाव था.

वर्ष 1993 में प्रकाशित उनकी किताब 'लज्जा' पर काफ़ी विवाद हुआ था. कट्टरपंथियों ने उन पर इस्लाम विरोधी होने के आरोप लगाते हुए एक फ़तवा भी जारी किया था.

उन्होंने पहले कोलकाता को अपना घर बनाना चाहा लेकिन 2007 में इस्लामी संगठनों के विरोध की वजह से उन्हें शहर छोड़ना पड़ा था.

तस्लीमा को स्वीडन ने नागरिकता दे रखी है. भारत सरकार ने साल 2011 में उन्हें रेज़ीडेंट स्टेटस दिया था.

लेकिन अगर वह बांग्लादेश या पश्चिम बंगाल लौटना चाहें तो उनके लिए सभी रास्ते बंद हैं.

पश्चिम बंगाल के अलावा भी यदि वह भारत में कहीं और जाना चाहें, तो उन्हें सुरक्षा अधिकारियों से अनुमति लेनी होती है.

इसके बावजूद, निर्वासित जीवन बिता रही तस्लीमा अब भी बांग्लादेश वापसी के लिए प्रयासरत हैं.

तस्लीमा कहती हैं, "अपने देश में वापस जाने के लिए मरते दम तक संघर्ष करूंगी. ये अभिव्यक्ति की आज़ादी की लड़ाई है."

मुसलमानों के वोट

वह कहती हैं, "मैंने अपने जीवन के 20 साल निर्वासन में बिताए हैं, शायद आगे भी निर्वासन में ही रहूं. लेकिन मैं नहीं चाहती कि किसी और के साथ भी ऐसा हो."

तस्लीमा समय-समय पर अपना पुराना पासपोर्ट नवीनीकृत करवाने के लिए बांग्लादेश के दूतावास जाती रहती हैं.

तस्लीमा कहती हैं, "मैं दूतावास अकसर जाती रहती हूँ लेकिन वे मेरा पासपोर्ट नवीनीकृत नहीं करते. वहाँ कई लोग मुझे बहुत पसंद करते हैं, मेरा लिखा पढ़ते हैं, लेकिन सरकार के आदेशों के आगे वे असहाय हैं."

बांग्लादेश या पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दल तस्लीमा के ख़िलाफ़ एक साथ क्यों खड़े दिखते हैं इस बारे में भी तस्लीमा के अपने विचार हैं.

वह कहती हैं, "बांग्लादेश में शीर्ष नेताओं के बीच चाहे जितनी भी कड़वाहट हो, मेरी बात हो तो वे साथ खड़े दिखते हैं. पश्चिम बंगाल में भी ऐसा हुआ. उन्हें लगता है कि मुझे निकालने से मुसलमान वोट मिलता है, लेकिन यह सच नहीं है."

'भारत सरकार मदद करे'

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तस्लीमा देश वापसी को लेकर ज़्यादा आशावादी नहीं हैं.

तस्लीमा कहती हैं, "मुझे नहीं लगता है कि अब मुझे कभी बांग्लादेश लौटने दिया जाएगा. मैं जो कहती हूं वो बातें मुसलमान कट्टरपंथियों को पसंद नहीं हैं."

इसके बावजूद, भारी बहुमत के साथ भारत में जो नई सरकार आई है, उससे तस्लीमा को काफ़ी उम्मीदें है. वह चाहती हैं कि भारत सरकार बांग्लादेश लौटने में उनकी मदद करे.

वह कहती हैं, "मैं चाहती हूं कि भारत सरकार बांग्लादेश की सरकार से बात करे. मैंने कांग्रेस सरकार से भी इस बारे में बात की थी."

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