'आत्महत्या नहीं है सम्मान से मरने का हक़'

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सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को इच्छा मृत्यु की वैद्यता की याचिका पर जो नोटिस जारी किया है वास्तव में यह याचिका इच्छा मृत्यु की ना होकर 'लिविंग विल' से संबंधित थी.

इच्छा मृत्यु के मामले दो तरह के होते हैं एक तो पैसिव इच्छा मृत्यु होती है जिसमें कोई व्यक्ति ऐसी स्थिति में हो कि उसे वेंटीलेटर या जीवन रक्षक प्रणाली की मदद से ज़िंदा रखा जा रहा है.

ऐसे मामलों में व्यक्ति अवचेतन की हालत में होता है और अपनी इच्छा व्यक्त नहीं कर पाता है तो मरीज़ के परिजन की इजाज़त से या परिजन के नहीं होने की हालत में डॉक्टर ख़ुद फ़ैसला लेकर जीवन रक्षक प्रणाली हटा सकते हैं.

भारत में निर्णय नहीं

ऐसा अरूणा शानबाग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जीवन रक्षक प्रणाली ऐसी स्थिति में हटाया जा सकता है.

दूसरी होती है एक्टिव इच्छा मृत्यु जिसमें कोई कैंसर या किसी ऐसी बीमारी से ग्रस्त हो कि वो ठीक नहीं हो सकता है और उसे काफ़ी तकलीफ़ है तो वे अपनी मृत्यु की इच्छा व्यक्त कर सकता है.

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तब डॉक्टर ज़हरीला इंजेक्शन देकर उसे मार सकते हैं. लेकिन यह जो मामला था वो तीसरे तरह का था इसे 'लिविंग विल' कहते हैं.

इसमें कोई व्यक्ति पहले से ही अपनी इच्छा व्यक्त कर देता है कि ऐसी हालत आ जाए जब उसे जीवन रक्षक प्रणाली के सहारे रखने की ज़रूरत पड़े तो वह नहीं चाहेगा कि उसे वेंटीलेटर के सहारे रखा जाए.

लिविंग विल पर अमरीका और इंग्लैंड में क़ानून है पर भारत में कोई निर्णय इस पर नहीं है.

सम्मान से मरने का हक़

इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया है. इसकी याचिका ग़ैर-सरकारी संस्था 'कॉमन कॉज़' की ओर से डाली गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले ज्ञान कौर के मामले में आत्महत्या और इच्छा मृत्यु के बीच फ़र्क़ करते हुए कहा था कि आत्महत्या तब होती है जब आप ठीक हों और ख़ुद को मार ले. लेकिन ऐसी स्थिति में जब आपकी मृत्यु निश्चित है और आपको बहुत तकलीफ़ है तो एक सम्मानजनक मृत्यु को अपनाना आत्महत्या नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने ज्ञान कौर के मामले में ही कहा था कि जैसे जीने का हक़ है वैसे ही सम्मान से मरने का हक़ भी माना जा सकता है.

विधि आयोग की दो रिपोर्ट इस पर आ चुकी है फिर भी संसद में इस पर कोई बहस नहीं हो रही है.

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