अब कोई भी खा सकता है 'जेल की रोटियां'

तिहाड़ फ़ुड कोर्ट

'जेल की रोटियां तोड़ने' को किसी अपराध की सज़ा काटने वाली कहावत के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है. लेकिन दिल्ली की तिहाड़ जेल की रोटियां अब आम लोगों के लिए भी उपलब्ध हो गई हैं.

तिहाड़ जेल परिसर के बाहर क़ैदियों द्वारा संचालित एक रेस्तरां खोला गया है- तिहाड़ फ़ूड कोर्ट.

इसमें खाना बनाने से लेकर उसे परोसने तक का काम क़ैदी ही करते हैं. इस काम के लिए उन्हें 'इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ होटल मैनेंजमेंट' से प्रशिक्षण दिलाया गया है.

पढ़ें सलमान रावी की पूरी रिपोर्ट

बाहर बड़ा सा तंदूर जिसमें सेंकी जाती हुई रोटियां और नान. अंदर बावर्चीख़ाने में पक रहे व्यंजनों की ख़ुशबू से सराबोर माहौल. जेल की रोटी खाना इससे पहले इतना आकर्षक नहीं था.

जी हां, यह दिल्ली की तिहाड़ जेल का शाकाहारी रेस्तरां है जो सज़ायाफ़्ता क़ैदियों द्वारा संचालित किया जा रहा है.

जेल की चारदीवारी में गूंजती संगीत की लहरें

छोटी-छोटी रंग बिरंगी चारपाइयों से घिरी मेज़. चाय की चुस्की लेते लोग. बांस से बनी अंदर बिछी कुर्सियां. यह किसी पांच सितारा होटल के 'लाउंज' से कम नहीं लगता.

इस रेस्तरॉं का नाम 'तिहाड़ फ़ूड कोर्ट' रखा गया है. दो हफ़्ते पहले शुरू किए गए इस रेस्तरां की लोकप्रियता बढ़ रही है क्योंकि ये जेल के परिसर से बाहर आम लोगों के लिए है.

इतना ही नहीं, फ़ोन पर 'आर्डर' करने पर यहाँ का खाना अब घर पर भी पहुँच सकता है.

जेल के विधि अधिकारी सुनील कुमार गुप्ता कहते हैं कि इस रेस्तरॉं में काम करने वाले ऐसे क़ैदी हैं, जिनका सज़ा काटने के दौरान आचरण बहुत अच्छा रहा है. कई ऐसे हैं जिनकी सज़ा की अवधि ख़त्म होने जा रही है और उससे पहले उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई तरह के प्रशिक्षण दिए गए.

प्रशिक्षण

जिन क़ैदियों का रुझान खाना पकाने में था उन्हें 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ होटल मैनेजमेंट' से प्रशिक्षण दिलवाया गया.

इन क़ैदियों में से एक हैं बालकिशन, जो पंजाब के फिरोज़पुर के रहने वाले हैं और उन्होंने तिहाड़ जेल में 13 सालों से ज़्यादा काट दिए हैं.

उनकी रिहाई का वक़्त अब क़रीब आ रहा है. कुछ महीनों बाद वह अपने गाँव लौट जाएंगे.

मगर इससे पहले जेल में रहते हुए ही वह बेहतरीन बावर्ची बन गए हैं.

अच्छे आचरण की वजह से दूसरे ऐसे ही क़ैदियों के साथ उन्हें पहले ही जेल के वार्ड से बाहर दूसरे जगह रखा गया है. जेल में रहते हुए भी वह आज़ाद जीवन जी रहे हैं.

बालकिशन कहते हैं, "अब मेरे जाने का वक़्त आ रहा है. छह महीने बाद मेरी रिहाई हो जाएगी और मैं वापस फिरोज़पुर में अपने गांव चला जाऊंगा. मेरा तो अब यहां दिल लगने लगा था और भारी दिल लेकर ही लौटूंगा."

बालकिशन कहते हैं कि गाँव लौटने के बाद वह वहां भी एक रेस्तरां खोलेंगे और उसका नाम भी 'तिहाड़ फ़ूड कोर्ट' ही रखेंगे.

लोकप्रिय होता रेस्तरां

जेल में सज़ा काटते-काटते खाना बनाने में महारत हासिल करने वालों में दोस्त मोहम्मद भी हैं जो उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर के रहने वाले हैं. 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ होटल मैनेजमेंट' से उन्होंने चाइनीज़ व्यंजन बनाने में महारत हासिल की है.

उनकी सज़ा पूरी होने में एक साल और बचा है और वह कहते हैं कि 'तिहाड़ फ़ूड कोर्ट' में एक साल तक उन्हें खाना बनाने का मौक़ा मिलेगा. वह इससे बहुत खुश हैं.

तिहाड़ जेल के अतिरिक्त अधीक्षक अंजनी कुमार ने मुझे वह रजिस्टर भी दिखाया जिसमे रेस्तरां में खाना खाने आए आम लोगों ने अपनी टिप्पणियां लिखी हैं.

रजिस्टर में लोगों ने तिहाड़ के क़ैदियों द्वारा बनाए गए खाने और इसके वातावरण की काफ़ी तारीफ़ की है.

सुरेश कुमार इस रेस्तरां में सबसे कम उम्र के क़ैदी हैं और उन्होंने भी अपनी सज़ा के 13 साल काट दिए हैं. अगले साल इनकी भी रिहाई हो जाएगी.

सुरेश कुमार कहते हैं कि खाना पकाना और उसे लोगों के लिए परोसना एक अलग अनुभव है.

रोटियां बनाने में दक्ष हो चुके सुरेश अब जेल की रोटियां दूसरों को खिलाते हैं और वाहवाही भी लूटते हैं. लोगों को लगता है कि जेल की रोटियां इतनी स्वादिष्ट पहले कभी नहीं रही होंगी.

(बीबीसी हिंदी के क्लिक करें एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार