एफ़डीआई से बीमा क्षेत्र में आएँगे ये 5 बदलाव

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भारत सरकार बीमा क्षेत्र में एफ़डीआई बढ़ाने की कोशिश करती रही, लेकिन उसे संसद में पास नहीं करा पाई.

लेकिन इस पर कैबिनेट की मुहर लगने और कांग्रेस की सशर्त मंज़ूरी के बाद पूरी संभावना है कि इस बार इंश्योरेस सेक्टर को संसद की 'हाँ' भी मिल जाएगी.

क्या फ़र्क पड़ेगा इसका बीमा क्षेत्र पर, आइए जानते हैं कंसलटेंसी फ़र्म प्राइस वॉटर हाउस कूपर के अनुराग सुंदर से.

1. जीडीपी में हिस्सेदारी

साल 2001 से साल 2009 के बीच जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद में बीमा क्षेत्र की हिस्सेदारी 2.7 से 5.2 फ़ीसदी तक पहुंची थी.

लेकिन उसके बाद साल 2012 तक इस क्षेत्र की जीडीपी में हिस्सेदारी कम होने लगी.

इसे सुधारने के लिए एफ़डीआई बढ़ाए जाने की ज़रूरत थी. इससे बीमा क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा और कंपनियों के पास अब ज़्यादा पैसा होगा.

वो नई सेवाओं में निवेश बढ़ा पाएंगे और इससे जीडीपी में इंश्योरेंस सेक्टर की हिस्सेदारी बढ़ेगी.

2. पूंजी निवेश बढ़ेगा

एफ़डीआई बढ़ाने से भारतीय इंश्योरेंस बाज़ार में पांच से सात साल में 15 से 20 अरब अमरीकी डॉलर का विदेशी निवेश आएगा.

नई पूंजी इस क्षेत्र के कई पहलुओं पर असर डालेगी. नए उत्पादों से लेकर मौजूदा नेटवर्क के विस्तार तक में इस निवेश से फ़ायदा होगा.

3. ज़्यादा कंपनियां, ज़्यादा नौकरियां

ज़्यादा विदेशी निवेश होगा तो बीमा कंपनियां ज़्यादा नौकरियां देंगी. वो नए दफ्तर खोल सकेंगे.

इससे नए ब्रोकर आएंगे जो बेहतर तरीके से बाज़ार को इश्योरेंस के बारे में बता पाएंगे.

लंबी दौड़ में ये भारत के लिए काफ़ी फ़ायदेमंद रहेगा.

हालांकि बाज़ार पर इसका असर दिखने में पांच से सात साल का वक्त लगेगा.

4. कंपनियों का मालिकाना हक़

एफ़डीआई 49 प्रतिशत तक सीमित किए जाने का प्रस्ताव है. यानी 51 प्रतिशत भारतीय सहयोगी के पास ही रहेगा.

सरकार ने ये सुनिश्चित किया है कि कंपनियों का मालिकाना हक भारतीयों के पास रहे.

5. घाटे में चल रही हैं कई कंपनियां

भारत में कुल 24 जीवन बीमा कंपनियां हैं, जिसमें से एक सरकारी, भारतीय जीवन बीमा निगम है.

इनमें से सात जीवन बीमा कंपनियों को वित्तीय वर्ष 2013 में घाटा हुआ.

वहीं, जनरल इंश्योरेंस क्षेत्र में कुल 28 कंपनियां है, जिसमें से 17 निजी कंपनियां है.

निजी जनरल इंश्योरेस कंपनियों में से 9 कंपनियों ने वित्तीय वर्ष 2013 में घाटा दिखाया है.

उम्मीद की जा रही है कि नए निवेश से कंपनियां घाटे से उबर पाएंगी.

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