अपने ही मक़सद में रोड़ा बन गया सीसैट?

सीसैट को लेकर छात्रों का विरोध इमेज कॉपीरइट PTI

देश की सबसे प्रतिष्ठित मानी जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाले बहुत से छात्र पाठ्यक्रम में हुए बदलाव से आंदोलित हैं. इनमें से ज़्यादातर छात्र हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं के माध्यम से इस परीक्षा में बैठते हैं.

सिविल सेवा परीक्षा का इस बार जो अंतिम परिणाम आया है, उसमें महज़ 2-3 प्रतिशत छात्र ही ग़ैर-अंग्रेज़ी भाषा के पास हो पाए. छात्रों का कहना है कि नए बदलाव से प्रारंभिक परीक्षा में ही 'उन्हें बाहर कर देने की साज़िश की गई है'.

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दरअसल साल 2011 में सिविल सेवा परीक्षा के दोनों स्तरों यानी प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के प्रारूप में बदलाव किया गया. इसके तहत प्रारंभिक परीक्षा में सभी अभ्यर्थियों को दो पेपर देने हैं, जिनमें एक सामान्य अध्ययन और दूसरा है सीसैट—यानी सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट.

यही दूसरा पेपर यानी सीसैट फ़िलहाल विवाद की जड़ में है.

विवाद

हालांकि जानकारों की राय इस पर बँटी हुई है. दिल्ली स्थित 'राउज आइएएस' कोचिंग के निदेशक वीपी गुप्ता पिछले चार दशक से इस परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों का मार्गदर्शन कर रहे हैं.

वह कहते हैं, "ये पेपर दो जो रखा गया था वो सिर्फ इसलिए रखा गया था ताकि परीक्षा केवल स्मरण शक्ति पर आधारित न हो. इसके ज़रिए ये जानने की कोशिश की गई कि अभ्यर्थी कितनी जल्दी, कितना सही और कितने अच्छे तरीके से निर्णय ले सकता है."

Image caption वीपी गुप्ता सिविल सेवा की तैयारी कर रहे छात्रों का मार्गदर्शन करते हैं

इधर पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉक्टर विकास दिव्यकीर्ति कहते हैं, "जब से सीसैट लागू हुआ है, अधिक योग्य उम्मीदवार प्रारंभिक परीक्षा में ही फेल हो गए और जिन्हें मुख्य परीक्षा देने का अवसर मिला वे मुख्य परीक्षा के हिसाब से ख़ुद को तैयार नहीं कर सके थे. यानी ये ऐसे छात्र थे जो एसएससी और बैंकिंग परीक्षाओं की तैयारी करते हैं."

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छात्रों का ये भी आरोप है कि नीतियां तय करने वालों में ज़्यादातर अंग्रेज़ी दां लोग होते हैं इसलिए वे उसी के अनुरूप पाठ्यक्रम और प्रारूप दोनों तैयार करते हैं.

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