पुणे में कुदरत के क़हर की वजह क्या है?

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महाराष्ट्र के पुणे में बुधवार सुबह जमीन धंसने से 60 लोगों की मौत हुई है और सौ से ज़्यादा लोग अब भी मलबे में दबे हो सकते हैं.

जानकार मलीण गांव में हुए इस हादसे की वजह पर्यावरण की उपेक्षा को मानते हैं.

उनका कहना है कि पहाड़ी इलाक़े को खेती के लिए समतल बनाने और क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य होने से ये हादसा हुआ.

पढ़िए विस्तार से ये रिपोर्ट

पुणे के मलीण गांव में बुधवार को आई प्राकृतिक आपदा में दर्जनों लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ी हैं, लेकिन जानकार इस तरह की आपदा के लिए इंसानी गतिविधियों को ही ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

'कल्पवृक्ष एनवायरमेंटल एक्शन ग्रुप' से जुड़ीं पर्यावरणविद् सैली पलांडे दातार कहती हैं, "इस इलाके में रहने वाले जनजाति समुदाय के लोग परंपरागत तौर पर केवल एक ही फसल उगाते थे. चावल की या फिर बाजरे की. लेकिन हाल के बरसों में यहां गेहूं की खेती का चलन बढ़ा है."

सैली के मुताबिक, गेहूं की खेती के लिए बड़े भूभाग को समतल करने का या फिर सीधा ढलान बनाने का चलन बढ़ा है, जो ख़तरनाक साबित हो रहा है.

बांध की भूमिका पर सवाल

मालीण गांव डिंभे बांध के जल भराव वाले इलाके से बहुत दूर नहीं है. ये बांध एक दशक पहले बना था और विशेषज्ञों की राय में बांध के जल भराव वाले इलाके में जमीन धंसने की आशंका रहती है.

'बांध, नदी और लोग' के दक्षिण एशियाई नेटवर्क की एसोसिएट संयोजक प्रणीता दांडेकर कहती हैं, "इस हादसे में बांध की भूमिका की जांच होनी चाहिए."

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प्रणीता इस हादसे की वजहों के बारे में कहती हैं, "सरकार अपनी नीति के तहत जनजाति समुदाय के बीच छतदार खेती को बढ़ावा दे रही है. पहले आदिवासी लोग इन छतों को संभालने के लिए पत्थरों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब बड़ी मशीनों की सहायता से पहाड़ियों को ही समतल बनाया जा रहा है. रेत की ज़मीन, किसी दृढ़ आधार का अभाव और जलभराव, सब मिलकर आपदा को निमंत्रण देते हैं."

पिछले कुछ साल में इस इलाके में बाढ़ और भूस्खलन के कई हादसे देखने को मिले.

2006 से 2007 के बीच, सिद्धागडवादी और साहारमाच गांव में भूस्खलन हुआ, जिसमें सौ से ज़्यादा मवेशी दब गए.

पिछले साल पुणे की कटराज पहाड़ियों पर अवैध निर्माण के चलते अचानक आई बाढ़ ने कई कारों को बहा दिया. इस घटना में एक बच्चे सहित दो लोगों की मौत हुई थी.

कम ना होंगे हादसे

पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय लोगों के मुताबिक इलाक़े में बड़े पैमाने पर सड़क निर्माण और रियल एस्टेट प्रोजक्टों के चलते ख़तरा बढ़ा है.

महाराष्ट्र राज्य वन्यजीव बोर्ड के सदस्य किशोर रिठे कहते हैं, "2007 से अब तक हज़ारों हेक्टेयर जंगल की कटाई हो चुकी है. अमूमन प्लॉट पर क़ब्ज़ा कर उसे हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए बिल्डरों को बेच दिया जाता है."

पुणे जिला प्रशासन ने 2011 में अतिक्रमण हटाने के लिए ज़ोरशोर से अभियान चलाया था, लेकिन जानकार कहते हैं कि वो वो बिल्डरों पर नकेल कसने में नाकाम रहा.

पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक अगर इलाके में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कोशिशें तेज़ नहीं हुई तो ऐसे हादसों का होना जारी रहेगा.

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