बिहार: घर बचाएँ कि ज़िंदगी !

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बिहार में कोसी नदी में बाढ़ की आशंका से आठ ज़िलों के दो लाख लोगों पर ख़तरा मंडरा रहा है.

बिहार सरकार के मुताबिक़ अब तक 60 हज़ार से ज़्यादा लोगों को प्रभावित क्षेत्र से निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है और 117 राहत शिविर लगाए गए हैं.

लेकिन अब भी कई लोग ऐसे हैं जो अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं है और दुविधा में हैं कि अपना घर और जान कैसे बचाएँ.

बीबीसी ने अपने घर छोड़, जान बचाकर भागने पर मजबूर हुए कुछ लोगों से बात की है.

पूरी रिपोर्ट नीरज सहाय से

उत्तर बिहार में उफनती कोसी की वजह से लोगों का सुरक्षित स्थानों पर आना जारी है. राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरफ) की टीम बारी-बारी से लोगों को किनारे पहुंचाने में जुटी है.

सहरसा ज़िले के नौहट्टा प्रखंड स्थित देवनवन घाट पर बाढ़ पीड़ितों का हुजूम जमा है.

पता नहीं क्या होगा

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सुरक्षित ठौर-ठिकाने की तलाश में रेखा देवी भी सपरिवार नाव से घाट पर आई हैं.

रेखा देवी के परिवार के नौ बच्चे और बहू सभी एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए थे. बच्चे शांत और सहमे हुए थे तो रेखा के चेहरे पर भी शिकन थी.

रेखा देवी बात करने पर अपने भाग्य को कोसने लगती हैं. वो कहती हैं, "पता नहीं कोसी मैया बार-बार हमसे नाराज़ काहे हो जाती हैं."

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गोविंदपुर टोला की रहने वाली रेखा बताती हैं - "कि सुबह से ही पानी तेज़ी से बढ़ रहा है. उनका घर पानी में ढह गया है और मवेशी भी नहीं बचे हैं. पता नहीं आगे क्या होगा. कैसे काम चलेगा."

रेखा देवी फिलहाल अपने किसी रिश्तेदार के यहां शरण लेंगी.

अपनों का आसरा

कुछ इसी तरह, एनडीआरएफ की नाव से ही शाहपुर चाही निवासी मिथिलेश दास अपनी बच्ची के साथ घाट पर उतरे. मिथिलेश के साथ उनकी बकरी भी है.

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25 साल के मिथिलेश मजदूरी करते हैं और उनका आठ से दस घर का टोला है. घर में पानी घुस गया था, इसलिए किसी अनहोनी की आशंका में तटबंध पर चले आए. मिथिलेश का पूरा परिवार टोला छोड़ चुका है.

मिसरी राम भी कोसी के कहर की आशंका में सुरक्षित आशियाने की तलाश में हैं.

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मिसरी राम लाइफ जैकेट में असहज महसूस कर रहे हैं. उनके घाट पर पहुंचते ही कुछ लोग उन्हें चिढ़ाते हुए हंसते हैं. मिसरी कहते हैं, "साहब ने जैकेट पहना दिया. पूरा सीना कस गया है. पानी के बीच मन घबरा रहा था."

एनडीआरफ की नौवीं बटालियन के कमांडेंट मनीष रंजन बताते हैं कि पिछले 24 घंटे से बचाव कार्य जारी है, अब तक लगभग 75 .लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया गया है.

लेकिन, कुछ ग्रामीण ऐसे भी हैं जो टोला छोड़ कर आना नहीं चाह रहे हैं. हम उन्हें समझाने का प्रयास कर रहे हैं.

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