'ख़ुद को बतौर भीम याद नहीं रखना चाहता'

  • 5 अगस्त 2014
प्रवीण कुमार

भीम का दर्द भी उतना ही बड़ा है जितना बड़ा उनका शरीर, ऊपर से तक़लीफ़ ये कि शायद ही कोई उन्हें उनके असली नाम से जानता है.

बीआर चोपड़ा के टीवी सीरियल 'महाभारत' के भीम और भारत के 'हैमर थ्रो' खिलाड़ी रहे प्रवीण कुमार को कुछ वक़्त तो शोहरत मिली लेकिन भीम के क़िरदार ने उन्हें हमेशा के लिए दबोच लिया.

67 साल के हो चले प्रवीण याद करते हुए बताते हैं, "लोग लाइन लगाकर पैर छूते थे लेकिन मेरे लिए तो बस वो एक किरदार था, जो मुझसे भी बड़ा बन गया."

टीवी सीरियल में निभाई ये भूमिका उनके लिए गले का ढोल बन गई, जिसे न तो उतार सकते हैं और न ही बजा सकते हैं, "मेरा एक्टिंग करियर टाइप्ड हो गया था और मुझे दूसरे तरह के रोल नहीं मिले जिसका मुझे अफ़सोस है. हां धार्मिक समारोहों और रामलीलाओं से बुलावा आता है."

पसंद नहीं हैं नई महाभारत

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टीवी पर इन दिनों चलने वाली नई 'महाभारत' उन्हें पसंद नहीं आती, शायद ये धारावाहिक उनके पुराने ज़ख्मों को कुरेदता है.

वो कहते हैं, "ये कोई महाभारत है? ये तो ट्रिक फ़ोटोग्राफ़ी और सेट का ख़ेल है. न संवाद में जान है न अभिनय में."

प्रवीण के लिए ये तय कर पाना मुश्किल है कि 26 साल पहले उन्हें भीम की भूमिका मिली तो वह एक सुखद संयोग था या दुखद.

प्रवीण ने बताया कि वो एशियन खेलों में हिस्सा लेने के लिए हैमर थ्रो की प्रैक्टिस कर रहे थे और तब उनकी मुलाक़ात एक कास्टिंग डायरेक्टर से हुई, साल भर बाद उन्हें मुंबई से बुलावा आया और मुंबई में कुछ छोटे मोटे रोल करने के बाद प्रवीण की ज़िंदगी का सबसे अहम मोड़ आया.

वो याद करते हैं, "महाभारत की पूरी कास्ट फ़ाइनल हो गई थी लेकिन भीम के लिए चोपड़ा साहब परेशान थे. मुझे देखते ही बोले, चलो भई शूटिंग की तैयारी करो भीम मिल गया है."

दुख दर्द

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दिल्ली के अशोक विहार इलाक़े में एक आम से घर में रहने वाले प्रवीण कुमार से जब मैं मिलने पहुंचा तो वो तैयार हो रहे थे, उन्होनें लाचारी भरी मुस्कुराहट के साथ कहा, "आजकल कोई आता नहीं है न तो इसलिए तैयार नहीं होता. मैं बस आपका ही इंतज़ार कर रहा था."

इंटरव्यू के दौरान ही उन्हें बैठने में तक़लीफ़ होने लगी तो उनके सहयोगियों ने इंटरव्यू को ख़त्म करने की सलाह दी, कैमरा बंद होने पर दुशासन का वध करने वाले गदाधारी भीम को छड़ी के सहारे लंगड़ाकर चलते हुए देखना दुख़द था.

उनके दो सहयोगी जो उनका ख़्याल रखते हैं, उनके अलावा घर में उनकी पत्नी और बहू रहती हैं, बेटा बिज़नेस के सिलसिले में बाहर रहता है ऐसे में प्रवीण अपने कमरे में आमतौर पर अकेले ही रहते हैं.

सिरहाने रखी दवाओं को लेने के कुछ पल बाद आराम महसूस करने पर वो बोले, "अभी सर्जरी हुई है न इसलिए. आप ये तस्वीर मत छापना. अच्छा नहीं लगता."

'राजनीति खिलाड़ी के बस की नहीं'

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जब खेल और अदाकारी से ज़िंदगी संवरती नहीं दिखी तो प्रवीण ने राजनीति में भी हाथ आज़माया लेकिन सियासत के दाँव कुश्ती से ज़्यादा पेचीदा साबित हुए.

2013 में दिल्ली के विधानसभा चुनावों में पहले आम आदमी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और फिर हार के बाद भारतीय जनता पार्टी से हाथ मिला लिया.

लेकिन इन दिनों वो ख़ुद को राजनीति से बाहर मानते हैं, "राजनीति झूठे और मक्कार लोगों का काम है साहब, हम खिलाड़ी लोग तो सीधी भाषा जानते हैं. हमसे न लोगों का दुख़ देखा जाता है न झूठी हमदर्दी बांटी जाती है."

दल बदलने के सवाल पर वो बोले, "लोग अपना बना कर, पैर छूकर, फिर एक तरफ़ कर देते हैं. दोनों ही दलों ने मुझे सियासी फ़ायदो के लिए इस्तोमाल किया जिसे मैं समझ नहीं सका."

जब मैंने उनसे पूछा कि वो खुद को कैसे याद रखना चाहेंगे, वो भरे गले से बोले, "खिलाड़ी. ये नेता-अभिनेता के चक्कर में आटे दाल के भाव मालूम चल गए हैं. पंजाब सरकार से अगर कोई मिले तो उसे मेरी सुध लेने को कहना. पेंशन भी नहीं जारी की है."

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