न्याय से क्यों दूर है महिला जज और वकील?

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Image caption न्यापालिका में यौन शोषण की ताज़ा शिकायत में भारत के मुख्य न्यायाधीश आर.एस. लोढ़ा ने उचित कार्रवाई का भरोसा दिलाया है.

जिनकी अदालत में बलात्कार, यौन हिंसा और घरेलू हिंसा जैसे मामले पेश होते हैं और जो इन मामलों की पैरवी करते हैं, यानी जज और वकील. उन्हीं में से कोई अपने साथ काम करनेवाली महिला का यौन शोषण करे तो उनके ख़िलाफ़ शिकायत करना बेहद मुश्किल है.

ये अनुभव है न्यायपालिका में काम कर रहीं कई महिलाओं का, चाहे वो जज हों, वकील या इंटर्न. काम की जगह पर यौन शोषण के मामले में वो ख़ुद को अन्य महिलाओं से बदतर स्थिति में पाती हैं.

पिछले महीनों में पूर्व जजों और कार्यरत जज के ख़िलाफ़ यौन शोषण की कुछ शिकायतें सामने आईं हैं, पर वरिष्ठ वकीलों के मुताबिक ये अपवाद हैं और ज़्यादातर महिलाएं शिकायत करने से झिझकती हैं.

सोमवार को मध्य प्रदेश की एक ज़िला एवं सत्र जज ने हाई कोर्ट के एक जज के ख़िलाफ़ यौन शोषण के आरोप सार्वजनिक किए और बताया कि ‘अपनी अस्मिता औऱ ख़ुद्दारी को बचाने के लिए मजबूरी में उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा.’

इस मामले में आरोपी जज ने यौन शोषण की शिकायत को झूठी बताया है.

आगे पढ़े वो पांच वजहें जिनके चलते अन्य काम की जगहों के मुकाबले न्यायपालिका में काम कर रही महिलाओं के लिए यौन शोषण की शिकायत करना बेहद मुश्किल है?

1. जजों को सुरक्षा

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भारत में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत जजों और पूर्व जजों के ख़िलाफ़, ‘अभियोग चलाने’ के अलावा शिकायत करने का और कोई तरीका नहीं है.

न्यायपालिका की स्वायत्ता को सुरक्षित रखने के लिए अभियोग की प्रक्रिया बेहद जटिल है.

यौन शोषण के मामलों में भी ये लागू होता है. यानी ‘काम की जगह पर यौन शोषण की रोकथाम’ क़ानून होने के बावजूद, किसी जज के ख़िलाफ़ इसका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

सिर्फ़ ज़िला और सत्र के जजों के ख़िलाफ़ यौन शोषण की शिकायत की जा सकती है. वकीलों के ख़िलाफ़ भी ये शिकायत की जा सकती है.

2. ‘काम की जगह’ सिर्फ न्यायालय

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साल 2013 में ‘काम की जगह पर यौन शोषण की रोकथाम’ के लिए पारित क़ानून के तहत काम की जगह को सिर्फ़ दफ़्तर तक सीमित नहीं रखा गया.

इसमें दफ़्तर के बाहर ऐसी हर जगह को काम की जगह माना गया है जहां महिला अपने काम की वजह से आरोपी से मिली हों.

लेकिन यौन शोषण की शिकायतों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में बनाई गई समिति केवल ‘न्यायालय’ के परिसर को ही काम की जगह मानती है.

अगर किसी महिला वकील, इंटर्न या जज का यौन शोषण न्यायालय के परिसर के बाहर, वकील के चेम्बर, जज के घर या किसी और जगह पर हो तो उसे ‘काम की जगह पर यौन शोषण’ नहीं माना जाएगा.

3. जज ‘मालिक’ नहीं

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क़ानून के तहत, हर काम की जगह पर यौन शोषण की रोकथाम, उसके मालिक, नियोक्ता या एम्प्लॉयर की है. जिन्हें काम की जगह पर ऐसी शिकायतों की सुनवाई के लिए समिति बनानी होगी.

न्यायपालिका के संदर्भ में हमेशा मालिक और कर्मचारी का सीधा रिश्ता देखने को नहीं मिलता है.

उदाहरण के तौर पर व़कील, किसी जज द्वारा नियुक्त नहीं किए जाते. ऐसे में उनकी शिकायतों के लिए समिति बनाने की ज़िम्मेदारी किसकी होगी, ये निश्चित नहीं है.

भारत के कई उच्च न्यायालयों में अब भी यौन शोषण की शिकायतों की सुनवाई के लिए समितियां नहीं बनाई गई हैं.

4. समिति में बाहरी सदस्य

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क़ानून के मुताबिक दस से ज़्यादा कर्मचारियों वाले हर कार्यस्थल पर यौन शोषण की शिकायतों की सुनवाई के लिए एक ‘इंटर्नल कम्प्लेन्ट्स कमेटी’ बनाना अनिवार्य है.

शिकायत करनेवाली महिला और अभियुक्त को कार्यस्थल में काम करनेवाले लोगों के पूर्वाग्रहों से सुरक्षित रखने के लिए, इस समिति में एक बाहरी सदस्य होना चाहिए.

पर पिछले साल महिला इंटर्न द्वारा की गई शिकायत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो समिति बनाई, उसमें कोई बाहरी सदस्य नहीं रखा गया.

इसके ख़िलाफ़ इंटर्न ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की है.

5. अभियोग का मुश्किल रास्ता

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किसी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज पर ‘अभद्र व्यवहार’ के आरोप लगें, तो अभियोग के ज़रिए उनकी जांच करने और हटाने का प्रावधान है.

इसके लिए लोकसभा में सौ सांसदों या राज्य सभा में 50 सांसदों को अभियोग के नोटिस पर हस्ताक्षर करने होते हैं.

जिसके बाद लोक सभा के स्पीकर या राज्य सभा के चेयरपर्सन तीन सदस्यीय समिति का गठन करते हैं.

अगर समिति की रिपोर्ट जज को कसूरवार पाए तो उसके आधार पर संसद में प्रस्ताव लाया जाता है.

प्रस्ताव पारित होने के बाद ही जज को ‘अभद्र व्यवहार’ का दोषी माना जाता है.

इसके बाद जज को हटाने का प्रस्ताव किया जाता है. इसे दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है.

राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद ही जज को अपने पद से हटाया जा सकता है.

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