भारत-पाक में राखी का रिश्ता

  • 11 अगस्त 2014
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मुझे कम से कम गूगल जैसे सर्च इंजन से ऐसी बेवकूफ़ी की उम्मीद नहीं थी. मैंने टाइप किया राखी तो गूगल ने ऊपर से नीचे तक राखी सावंत खोलकर रख दिया.

दो मिनट तक सोचता रहा कि गूगल ने ये हरकत क्यों की? क्या ये काम करते-करते थक गया है. पेट भर खाना नहीं मिला, वक़्त पर पगार नहीं मिली, तेज़ बुखार में तप रहा है आख़िर बात क्या है ?

फिर मुझे अहसास हुआ कि इसमें गूगल से ज़्यादा मेरी बुद्धि का कसूर है. मुझे राखी के बजाय राखी पूर्णिमा या रक्षाबंधन लिखना चाहिए था.

क्योंकि गूगल तो वो मासूम देहाती है जो आपके दिल की नहीं उंगलियों की भाषा समझता है.

रक्षाबंधन कितना सार्थक ?

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तो जनाब आप सबको, माफ़ कीजिएगा सबको नहीं बल्कि सिर्फ़ उन लोगों को बधाई जिन्होंने राखी बांधी और बंधक से पैसा वसूल किया हो या फिर आस-पास के लोगों का मुंह मीठा किया हो.

सबको इसलिए नहीं क्योंकि कई पुरुष और महिलाओं की सोच है कि भई औरत ख़ुद इतनी ताकतवर है कि उसे अपनी हिफ़ाज़त के लिए भाई की क्या ज़रूरत? ये तो तबकी रस्म है जब औरत मजबूर और बंधक हुआ करती थी, इत्यादि, इत्यादि, इत्यादि.

पर मैं ऐसे रंग-बिरंगे माहौल में बुद्धिजीवी बनने या मुंह दर मुंह मुचाहटा करने के मूड में नहीं हूं, मुझे तो भई बस रंग अच्छे लगते हैं. भले ही वो राखी के बंधन के बहाने ही क्यों ना हो.

वैसे भी जीवन सिर्फ़ नाप-तौल का नाम तो नहीं. जीवन के बहुत कम रंग हमारे हाथों में बाक़ी बचे हैं. इसलिए जो भी हैं उन्हें ही समेट रखो तो बड़ी बात है.

ऐसे समाज में महिलाओं को ज़्यादा सुरक्षित होना चाहिए जहां करोड़ों महिलाएं, लड़कियां, कन्याएं अपने करोड़ों मर्दों को साल दर साल राखी बांधती है. और फिर ये करोड़ों मर्द अपनी बहनों की हिफ़ाज़त की सौगंध उठाते हैं. अगर ऐसा है तो बड़ी अच्छी बात है. अगर ऐसा नहीं है तो फिर सोचने की बात है.

राखी और भारत-पाकिस्तान

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मेरे दोस्त और ड्रामा टीचर सुनील शंकर का कहना है कि जिस तरह से आपके यहां जब कोई मुश्किल सफर पर जाता है तो उसकी सलामती के लिए ईमान ज़ामिन बांधा जाता है उसी तरह से हम हिंदुओं में सिर्फ़ भाई बहन के रिश्ते के लिए नहीं बल्कि आप मान-सम्मान जताने, प्यार जताने या दुआ देने के लिए भी किसी बड़े छोटे को राखी बांध सकते हैं या फिर बंधवा सकते हैं.

और फिर सुनील की तीन साल की बच्ची ने मुझे राखी बांध दी.

सुनील की बात सुनकर ख़्याल आया कि भारत और पाकिस्तान एक दूसरे को और अपने पड़ोसियों को राखी क्यों नहीं बांध सकते और ये काम सार्क के प्लेटफ़ॉर्म से हो तो और भी अच्छा है.

और इससे भी पहले अपने-अपने मुसलमानों, सिखों, हिंदुओ, पारसियों को रक्षाबंधन का क़ैदी बना लें.

आख़िर तो यूरोपीय संघ के देश भी रक्षाबंधन के रिवाज़ में पड़े बगैर एक दूसरे का राखी बांध चुके हैं.

राक्षस, राख, राखी इन तीनों में से क्या पसंद फ़रमाइयेगा. इसका जवाब अपने दिल और बुद्धि को आमने-सामने बैठाकर ही मिल सकता है, मेरी तरह गूगल से पूछने मत बैठ जाइएगा प्लीज.

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