बिहार के एक शहर में गोरे साहब का स्मारक

  • 17 अगस्त 2014
जॉर्ज ऑरवेल

बिहार के मोतिहारी ज़िले में औपनिवेशक दौर की बनी एक जीर्ण-शीर्ण इमारत की मरम्मत का काम किया जा रहा है.

इसी इमारत में अंग्रेज़ी साहित्य की 'एनिमल फ़ॉर्म' और 'नाइंटीन एटी फ़ोर' जैसी महान रचनाओं के लेखक जॉर्ज ऑरवेल का जन्म हुआ था.

अब इस इमारत को म्यूज़ियम की शक्ल देने की योजना पर काम चल रहा है.

यहां यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन से लाई गई वास्तविक पांडुलिपियां, तस्वीरें और ऑडियो रिकॉर्डिंग रखी जाएंगी.

लेकिन मूलतः हिंदीभाषी बिहार के मोतिहारी ज़िले में प्रस्तावित इस म्यूज़ियम को कौन देखने आएगा?

बीबीसी उर्दू के सुहैल हलीम जॉर्ज ऑरवेल की जन्मभूमि से उनकी तलाश करके लौटे हैं.

मोतिहारी और जॉर्ज ऑरवेल

म्यूज़ियम हो या न हो, जॉर्ज ऑरवेल को उनकी पैदाइश के शहर में तलाश करना आसान नहीं है. मैं ऐसी कोई उम्मीद भी नहीं कर रहा था.

बिहार को भारत के ग़रीब राज्यों में गिना जाता है और पूर्वी चंपारण ज़िले के मोतिहारी शहर को इसके सबसे पिछड़े इलाक़ों में शुमार किया जाता है.

यहीं 111 साल पहले एरिक आर्थर ब्लेयर या जॉर्ज ऑरवेल पैदा हुए थे.

मोतिहारी पहली नज़र में वक़्त के किसी मोड़ पर ठहरा हुआ सा लगता है. नेपाल से लगी भारत की सरहद के पास बसा ये छोटा सा शहर अपनी तरह से अनोखा है.

लगता है कि लाल छत वाली कमज़ोर इमारतें लंबे अरसे से मरम्मती की बाट जोह रही हैं.

अफ़ीम का गोदाम

जॉर्ज ऑरवेल ने अपनी ज़िंदगी का पहला साल ही यहां गुज़ारा और वे फिर यहां कभी वापस नहीं आए.

ऑरवेल के बंगले के पास ही उस गोदाम के खंडहर हैं जिसका इस्तेमाल अफ़ीम रखने के लिए किया जाता था. तब ये इलाक़ा अफ़ीम की खेती के लिए जाना जाता था.

ऑरवेल के पिता ब्रितानी सरकार के अफ़ीम महकमे के लिए काम करते थे. यहां तैयार होने वाला अफ़ीम चीन भेजा जाता था.

वैसे मोतिहारी में भी बहुत लोग नहीं जानते हैं कि जॉर्ज ऑरवेल कौन थे लेकिन इस प्रस्तावित म्यूज़ियम की यहां ख़ासी चर्चा है.

जो जॉर्ज ऑरवेल को जानते हैं, वो कहते हैं, "वे एक महान अंग्रेज़ साहित्यकार थे."

ज़्यादा पूछने पर कहते हैं, "उनके बारे में इससे ज़्यादा नहीं मालूम."

साहित्य का फलक

मुझे यहां म्यूज़ियम बनाए जाने की उपयोगिता को लेकर शुरू से शंका रही है. क्या यहां कोई इसे देखने भी आएगा?

लेकिन इस परियोजना से जुड़े लोगों का कहना है कि इससे मोतिहारी को साहित्य जगत के फलक पर जगह मिल जाएगी.

इससे इत्तेफाक़ रखने वाले लोगों में शहर के स्थानीय कारोबारी देबप्रिय मुखर्जी भी हैं. वे कहते हैं, "ऑरवेल जैसे महान लेखक के लिए हम इतना तो कर ही सकते हैं."

वो कहते हैं, "हम ख़ुशनसीब हैं कि जॉर्ज ऑरवेल जैसे लेखक यहां पैदा हुए. इसलिए ये हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम इस बंगले का रखरखाव करें. यहां आने वाले लोग ख़ूबसूरत यादों के साथ लौटें. आज ऑरवेल पर रिसर्च करने वाले लोगों को लंदन तक का सफ़र करना पड़ता है लेकिन एक बार इस म्यूज़ियम के तैयार हो जाने के बाद लोग उनके जन्मस्थान पर ही आ सकेंगे."

सरकार की दरियादिली

बिहार सरकार इस परियोजना पर 90 लाख रुपए ख़र्च कर रही है. देबप्रिय मुखर्जी और उनके दोस्त ऑरवेल के बेटे रिचर्ड के संपर्क में हैं.

रिचर्ड ने वादा किया है कि वे यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ लंदन के ऑर्काइव से जॉर्ज ऑरवेल से जुड़ी चीज़ें लाने में मदद करेंगे. लेकिन इस हिंदी भाषी क्षेत्र में कम ही लोग अंग्रेज़ी समझते हैं.

मैंने तय किया कि किसी किताब की दुकान पर जाकर देखूंगा कि वहां किन लेखकों की किताबें ज़्यादा बिकती हैं और मैं हैरत में पड़ गया कि मोतिहारी में ऐसी एक भी किताब की दुकान नहीं मिली जहां स्कूल-कॉलेज के सिलेबस वाली किताबों के अलावा और कुछ मिलता हो. आप यहां ऑरवेल की एक भी किताब नहीं खोज पाएंगे.

यक़ीनन मोतिहारी के एमएस कॉलेज में हालात बेहतर हैं. यह शहर का बेहतरीन कॉलेज है. प्रोफेसर इक़बाल हुसैन कॉलेज के अंग्रेज़ी विभाग के अध्यक्ष हैं और वे कॉलेज में अंग्रेज़ी पढ़ाने वाले इकलौते प्रोफ़ेसर भी हैं.

पूरी तस्वीर

उनके खूबसूरत से दफ़्तर में विलियम शेक्सपीयर और जॉर्ज ऑरवेल जैसे अंग्रेज़ी के महान लेखकों की तस्वीरें लगी हैं. वे मुझे अपने बच्चों को लेक्चर देने की दावत देते हैं.

क्लास में मेरी गुज़ारिश पर उन्होंने बच्चों से पूछा कि आप में से किसी ने जॉर्ज ऑरवेल का नाम सुना है.

कई हाथ खड़े हुए और हरी कमीज़ वाले एक लड़के ने ऑरवेल की दो किताबों के नाम बताए, 'एनिमल फ़ॉर्म्स' और 'नाइंटीन एटी थ्री' लेकिन जीवविज्ञान की एक छात्रा मोनिका ने उस लड़के के जवाब को तुरंत सुधारा.

वो ऑरवेल और उनके काम के बारे में कॉफी कुछ जानती हैं, "ऑरवेल का जन्म मोतिहारी में 1903 में हुआ था.."

अपनी 45 सेकेंड की बाइट में मोनिका ने ऑरवेल की ज़िंदगी, उनकी किताबों और उनके वक़्त के बारे में एक पूरी तस्वीर पेश कर दी.

दुनिया के नक्शे

मैं प्रभावित हो गया, पूरी क्लास ही प्रभावित दिख रही थी. लेकिन प्रोफ़ेसर हुसैन मानते हैं कि मोतिहारी अचानक जॉर्ज ऑरवेल रिसर्च सेंटर में नहीं बदलने जा रहा है.

उन्होंने कहा, "महान लेखकों का वजूद हर जगह और हर वक़्त में होता है. इसलिए म्यूज़ियम बनाने का फैसला सही है. ऑरवेल जितने ब्रितानी हैं, उतने ही हिंदुस्तानी भी. वे साम्राज्यवादी विचारों के सख़्त ख़िलाफ़ थे. मोतिहारी का नाम उनसे जुड़ने से इसे दुनिया के नक्शे में जगह मिल जाएगी."

मैं हुसैन साहब से इजाज़त लेकर ऑरवेल के बंगले की ओर लौटा जहां मरम्मत का काम तेज़ी से जारी है. लेकिन म्यूज़ियम बनने की कीमत भी किसी को चुकानी पड़ रही है. यहां रह रहे चार परिवारों को ये जगह छोड़नी पड़ रही है.

खर्च

इन्हीं में से एक अंशु भी हैं. वे 30 साल पहले इसी मकान में पैदा हुए थे.

वे कहते हैं, "हमारे और जॉर्ज ऑरवेल में ये बात कॉमन है. हम एक ही घर में पैदा हुए. वे मशहूर हो गए लेकिन मैं नहीं हो पाया. मुझे दुख है कि हमें ये घर छोड़ना पड़ रहा है."

उनके पिता स्कूल में अध्यापक थे. ये बंगला सरकारी संपत्ति था, जिसे स्कूल को लीज़ पर दिया गया था.

अंशु और ऑरवेल के उस बंगले से विदा लेकर लौटते वक़्त मैं सोच रहा था कि म्यूज़ियम पर ख़र्च होने वाले पैसे का इस्तेमाल क्या एक अच्छी लाइब्रेरी बनाने में नहीं हो सकता था.

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