1947 में युवा क्या सोच रहा था?

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मैं अक्सर सोचती थी कि लोगों ने जवाहरलाल नेहरू के 15 अगस्त 1947 के भाषण के बाद कैसी प्रतिक्रिया दी होगी.

एक युवा के रूप में भारत को औपनिवेशक गुलामी से स्वतंत्र होते देखना कैसा अनुभव रहा होगा?

हालांकि उस दिन के बारे में बहुत लिखा गया है, पर मैं उस लम्हे का हाल ऐसे व्यक्ति से जानना चाहती थी जो उस पल के गवाह रहे हों.

मेरी मुलाकात दिल्ली में 87 वर्षीय केशव चंद्र सामल से हुई, और उन्होंने उस दिन के बारे में कई कुछ बताया.

'देश एक परिवार'

सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी सामल की उम्र तब 20 साल थी. वह छात्र थे और अपने दोस्तों के साथ भारत के आज़ाद होने और ब्रिटिश सत्ता के जाने की ख़बर सुनकर सन्न रह गए थे.

सामल कहते हैं, 'आज़ादी की सच्चाई का अहसास होते ही गली में चारों तरफ़ ख़ुशियां मनाई जा रही थीं. लोग अपने घरों से नाचते, ड्रम बजाते और शोर मचाते बाहर निकल आए थे. अजनबी लोग भी एक-दूसरे के गले मिल रहे थे और हल्ला कर रहे थे. उस समय लग रहा था मानो पूरा देश एक परिवार बन गया हो.'

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वह बताते हैं कि उस दिन पूरा शहर टोपियों के समुद्र जैसा दिख रहा था.

"लग रहा था मानो हर कोई स्वाधीन भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के साथ अपनी एकता ज़ाहिर करना चाहता था और उन्होंने 'नेहरू टोपी' पहनकर यह भाव ज़ाहिर किया था."

ख़ुशी और गाने

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केशव बताते हैं कि सभी कॉलेज, स्कूल और सरकारी भवन रंग-बिरंगे कपड़ों से सजाए गए थे.

उन्होंने कहा, "मैं और मेरे दोस्त इतने खुश थे कि अपनी मुलाकातों और भाषणों में हमने ख़ुशी जताई. गली के हर कोने और नुक्कड़ पर ऐसी सभाएं हो रही थीं."

वह बताते हैं कि गली के हर मोड़ पर लोगों का समूह अपने-अपने 'स्वतंत्रता दिवस के भाषण' के साथ मौजूद था. रेडियो पर लगातार देशभक्ति गाने बज रहे थे.

'दिलों में बदलाव'

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जब पूरा देश आज़ादी की पहली भोर में जागा तो 16 अगस्त 1947 को क्या उन्हें कोई आधारभूत बदलाव नज़र आया?

केशव के मुताबिक़, "बाहर से ज़्यादा यह दिलो-दिमाग़ में होने वाला बदलाव था, क्योंकि प्रशासन में तो अधिकारी वही थे. लोगों के मन में आज़ाद होने की भावना थी कि हम अपने फ़ैसले ख़ुद ले पाएंगे. यह अनुभूति हमें ख़ुशी दे रही थी. यही बदलाव स्वाधीन भारत की पहली पीढ़ी के लोगों के जीवन का हिस्सा हो गया था.''

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