'बड़े रहस्यमय' हैं भारत-इसराइल संबंध

भारत इसराइल के झंडे

गज़ा में इसराइली बमबारी में क़रीब 2,000 फ़लस्तीनी मारे गए. भारत में आलोचकों ने सरकार पर चुप्पी का आरोप लगाया है.

एक तरफ़ जहां भारत सरकार संसद में गज़ा संकट पर बहस से कतरा रही थी, वहीं उसने संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के ख़िलाफ़ वोट कर दिया.

अरब देशों से भारत के संबंध मधुर रहे हैं, लेकिन भारत में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी में एक धड़ा ऐसा है, जो इसराइल से मज़बूत रिश्तों की हिमायत करता है.

पढ़िए 'विवेचना' में भारत-इसराइल रिश्तों की पड़ताल

साल 1948 में जन्म के बाद से ही इसराइल फ़लस्तीनियों और पड़ोसी अरब देशों के साथ ज़मीन के स्वामित्व की लड़ाई लड़ रहा है.

शुरू में भारत फ़लस्तीन की ज़मीन के बंटवारे के विरुद्ध था. भारत ने 1949 में संयुक्त राष्ट्र में इसराइल को शामिल करने के ख़िलाफ़ वोट दिया, लेकिन इसराइल को शामिल कर लिया गया.

इमेज कॉपीरइट EPA

अगले साल भारत ने इसराइल के अस्तित्व को आधिकारिक तौर पर मंज़ूर कर लिया. ये भारत और इसराइल के संबंधों की शुरुआत थी.

मध्य-पूर्व मामलों के जानकार एके पाशा बताते हैं, ''भारत ने 15 सितंबर 1950 को इसराइल को मान्यता दी. अगले साल मुंबई में इसराइल ने अपना वाणिज्य दूतावास खोला. भारत भी 1952 में इसराइल में अपना वाणिज्य दूतावास खोलना चाहता था, लेकिन फ़ैसले को एक-दो साल के लिए आगे बढ़ा दिया गया. बाद में स्वेज़ नहर विवाद के कारण ऐसा नहीं हो पाया, लेकिन दोनो देशों ने राजनयिक रिश्ते बनाए रखे.''

भारत और इसराइल को एक दूसरे के यहां आधिकारिक तौर पर दूतावास खोलने में 42 साल लग गए पर पर्दे के पीछे इन संबंधों के विस्तार की कहानी बहुत पुरानी है.

वह दौर था, जब फ़लस्तीनी चरमपंथी अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित करने के लिए विमान अपहरण, हिंसा या हत्या जैसी गतिविधियों में हिस्सा ले रहे थे.

1972 के ओलंपिक खेलों में 11 इसराइली खिलाड़ियों का अपहरण और हत्या ऐसा ही वाकया था. इसराइल में भी भारतीय यहूदी बस रहे थे, हालांकि उनकी संख्या बहुत कम थी. मगर भारत सरकार ने फ़लस्तीनियों के अधिकारों का समर्थन किया और पीएलओ को फ़लस्तीनियों की प्रतिनिधि संस्था माना.

युद्धों में मदद?

इमेज कॉपीरइट Getty

भारतीय गुप्तचर संस्था रॉ के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी वी बालचंद्रन के मुताबिक़ इन कारणों से इसराइल और भारत के संबंध परवान चढ़े.

वो कहते हैं, ''1968 में रॉ इंटेलिजेंस ब्यूरो से अलग हो गई. उसके पहले भी भारत के इसराइल से अनौपचारिक संबंध थे. तब दोनों देशों के बीच के संबंध आने वाले सुरक्षा ख़तरों को लेकर थे. उस वक़्त आतंकवाद का ख़तरा उतना नहीं था, लेकिन फ़लस्तीनी चरमपंथियों से खतरा था. मसलन 1975-76 में ख़बरें आईं कि जापान की रेड आर्मी मुंबई आकर विमान अगवा कर सकती है.''

कहा जाता है कि 1962 में चीन युद्ध और बाद में 1965 और 1971 में पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी भारत को इसराइल से मदद मिली. पिछले महीने संसद में गज़ा संकट पर बहस के दौरान भी यह बात भाजपा सांसद तरुण विजय ने उठाई, पर कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद ने इसका खंडन किया.

पूर्व रॉ अधिकारी वी बालचंद्रन कहते हैं, ''1962 या 1971 में इसराइल के साथ भारत के सुरक्षा संबंध नहीं थे. भारत और इसराइल वीआईपी सुरक्षा या चरमपंथी हमलों की आशंका को लेकर सहयोग कर रहे थे. तब इसराइल भारत की पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधों की जटिलता से वाक़िफ़ नहीं था.''

रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी की सोच थोड़ी अलग है.

गुप्त दौरे

इमेज कॉपीरइट Getty

वो कहते हैं, ''1965 और 1971 में इसराइल ने भारत को गुप्त जानकारियां देकर मदद की. भारतीय सुरक्षा या ख़ुफ़िया अधिकारी साइप्रस या तुर्की के रास्ते इसराइल जाते थे. वहां उनके पासपोर्ट में छाप नहीं लगती थी. उन्हें मात्र एक काग़ज़ दिया जाता था, जो उनके इसराइल आने का सुबूत होता था.''

1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या ने भारत-इसराइल संबंधों को नई मज़बूती दी. राजीव गांधी नए प्रधानमंत्री बने. वीआईपी सुरक्षा के लिए एसपीजी और एनएसजी का गठन हुआ.

राहुल बेदी बताते हैं कि इन जवानों को ट्रेनिंग इसराइली जवानों की ट्रेनिंग की तर्ज पर दी गई.

इमेज कॉपीरइट AFP

पिछले साल एक ख़बर छपी जिसमें भारतीय एजेंसी रॉ पर आरोप लगे कि उसने पीयूष इन्वेस्टमेंट और हेक्टर लीज़िंग एंड फ़ाइनेंस कंपनी के नाम से दो कंपनियां फ़्लोट कीं और इनके नाम पर दिल्ली में दो फ़्लैट खरीदे जहां मोसाद के भारतीय स्टेशन प्रमुख को कथित तौर पर 1989 से 1992 के बीच रखा गया.

रॉ के पूर्व अधिकारी वी बालचंद्रन को कथित तौर पर इन कंपनियों से संबंधित बताया गया था.

बालचंद्रन कहते हैं कि जो कुछ होता है वो सरकार की सहमति से होता था. कई बार विदेश से आने वाले अधिकारी नहीं चाहते थे कि किसी को पता चले.

1990 के दशक में श्रीनगर में मुस्लिम चरमपंथियों ने सात इसराइली पर्यटकों को जासूस होने के शक पर अगवा कर लिया. पांच पर्यटक किसी तरह भाग गए लेकिन एक पर्यटक और एक चरमपंथी मारे गए. एक अन्य पर्यटक को अलगाववादी संगठन जेकेएलएफ़ के सदस्यों ने बचाया.

दूतावास

इमेज कॉपीरइट AP

इसके बावजूद 1992 में भारत और इसराइल ने औपचारिक तौर पर राजदूतों के स्तर पर संबंध स्थापित कर लिए. तब नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री थे.

प्रोफ़ेसर एके पाशा कहते हैं कि ऐसा करने के लिए भारत पर अमरीका का दबाव था. साथ ही सोवियत संघ के विभाजन के बाद भारत को रक्षा साजो-सामान के लिए एक विकल्प की तलाश थी और उसे यह विकल्प इसराइल में नज़र आया.

वो कहते हैं, ''राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने इसराइली दूतावास का दायरा मुंबई से बढ़ाकर पूरे महाराष्ट्र और केरल तक कर दिया था. कुछ लोग यह भी कहते हैं कि उन्होंने यह वायदा भी किया था कि अगर इसराइल-फ़लस्तीन संकट हल हो जाता है तो भारत और इसराइल पूर्ण राजनयिक संबंध स्थापित कर लेंगे.''

1999 के करगिल युद्ध में इसराइली मदद के बाद भारत और इसराइल और करीब आए. इसराइल ने भारत को एरियल ड्रोन, लेसर गाइडेड बम, गोला बारूद और अन्य हथियारों की मदद दी.

विश्लेषकों के अनुसार पाकिस्तान के परमाणु बम, जिसे इस्लामी बम भी कहा जाता है, ने भी दोनों देशों को नज़दीक आने में मदद की. इसराइल को डर रहा है कि कहीं यह परमाणु बम ईरान या किसी इस्लामी चरमपंथी संगठन के हाथ न लग जाए.

इसराइली नेताओं का तर्क है कि इसराइल की तरह भारत के पड़ोस में हालात अच्छे नहीं हैं और दोनों देशों को एक दूसरे का साथ चाहिए.

रहस्य

इमेज कॉपीरइट AP

लेकिन एशिया की दो बड़ी शक्तियों के बीच अभी भी यह नज़दीकी बेहद रहस्यमय लगती है. दोनों पक्ष इस बारे में बात नहीं करना चाहते. डर है कि कहीं भारतीय मुसलमानों में यहूदियों के विरुद्ध भावना न उभरे और अरब देशों से भारत के संबंधों पर असर न पड़े.

मध्य-पूर्व में लाखों भारतीय काम करते हैं और भारत अपने क़रीब 70 प्रतिशत तेल निर्यात के लिए भी उस पर निर्भर है. उधर, 1992 में भारत-इसराइल के बीच जो व्यापार सिर्फ़ 20 करोड़ डॉलर था, आज छह अरब डॉलर तक पहुंच गया है. भारत, इसराइल के बीच रक्षा सौदों की क़ीमत एक अरब डॉलर है. ऐसे में भारत के पास क्या विकल्प हैं?

राहुल बेदी कहते हैं, ''इसराइल बनने के बाद कई देशों के साथ उसके संबंध गुप्त रहे हैं. भारत-इसराइल संबंध भी उसी दर्जे में आते हैं. मुझे लगता है कि अगर यह रिश्ता ज़्यादा न उछाला जाए, तो मध्य पूर्व में हिंदुस्तानियों को भी कोई खास फ़र्क नहीं पड़ेगा.''

भारत के समक्ष चाहे कोई भी विकल्प हो, फ़ैसला लेना आसान नहीं होगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार