ललित कला अकादमीः कला का लाक्षागृह

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नव-स्वतंत्र राष्ट्र में कला और संस्कृति के सरंक्षण के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू बेहद चिंतित थे और इसका हल निकला था ललित कला अकादमी के रूप में.

नेहरू का मानना था कि इसका संचालन कलाकारों के हाथों में ही रहेगी तो अकादमी अपेक्षाकृत अधिक स्वायत्त और स्वतंत्र रहेगी.

लेकिन यह संस्था बहुत जल्द अपने उद्देश्यों से भटक गई और ललित कलाओँ के संवर्द्धन के विरुद्ध ही काम करने लगी.

यह सभी तरह के भ्रष्टाचार का अड्डा बन गई और स्तरहीन कलाकृतियों का भंडार बनकर रह गई.

दिल्ली से बाहर के प्रतिभाशाली कलाकारों के लिए इस अकादमी के दरवाज़े बंद ही रहे.

और यह कला, कलाकारों के विकास की बड़ी बाधा के रूप में बदलकर रह गई.

पढ़िए प्रभु जोशी का पूरा लेख

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नेहरु की छवि संसार भर में एक जनतांत्रिक राष्ट्र नायक की थी और वह सदियों पुरानी और समृद्ध संस्कृति, सभ्यता वाले भारत में बहैसियत एक प्रधानमंत्री के इस चिंता से घिरे रहे कि इस महादेश की कला और संस्कृति को एक नव स्वतंत्र राष्ट्र में किस तरह जीवित रख सकें.

भारत में ललित कला अकादमी की सरंचना उन्हीं के स्वप्न का मूर्त रूप थी. जब पांचवें दशक के पूर्वार्द्ध में इसकी स्थापना की गई तो उन्हें आशंका थी कि क्या इसे नौकरशाहों के हाथ में सौंपा जा सकता है?

नतीजतन उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि कलाकार स्वयं ही इसके कर्ता-धर्ता हों तो कदाचित् यहां जनतंत्र, जो कलाओं के निर्विघ्न विकास के लिए एक प्राथमिक शर्त है, बना रहेगा.

बहरहाल यहां कलाकारों को ही इसके संचालन का दायित्व सौंपा गया. वह सोचते थे, राज्याश्रयों में पतली रही कला यहां अपेक्षाकृत अधिक स्वायत्त और स्वतंत्रता से सांस लेकर विकसित होती रहेगी.

अकादमी के उद्देश्यों में कला का सरंक्षण, संवर्द्धन तो था ही उसमें भारतीय दृश्य कलाओं की परम्परागत पहचान को समृद्ध बनाते हुए समकालीनता से सहसंबंध भी बनाना था.

सांस्कृतिक कूटनीति

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लेकिन यह इस संस्था की लज्जास्पद विडंबना कही जानी चाहिए कि अपनी स्थापना के चंद वर्षों बाद ही यह अपने महान उद्देश्यों से भटक गई.

सबसे पहले उसने भारतीय कला की परम्परागत शैलियो का ध्वंस किया और शीत युद्ध के दौर में चल रही सांस्कृतिक कूटनीति के चलते उस कला मुहावरे के कुचक्र में फंस गई, जिसे आधुनिक कला या समकालीन कला की तरह व्याख्यित किया जा रहा था.

इसने जनजातीय या लोककलाओं पर कभी एकाग्र नहीं किया और 'आधुनिक कला' के नाम पर निहायत की सामान्य दर्जे की कृतियों से इसके भंडार भर दिए.

उन्हें कृति कहना भी एक सच्चे समीक्षक का अपमान करना है. ढेरों कृतियां ऐसी हैं जिनमें 'कैनवास पर अचनाक कर दी मूर्खता' जैसा सौंदर्य भी नहीं है.

स्थापना के समय जो शोध और अध्ययनपरक कार्यों की संभावनाएं व्यक्त की गई थीं, वे सब समाप्त हो गईं.

देश भर में छोटे-छोटे कस्बों और अंचलों से कलाकारों की खोज बंदकर, महानगरीय अभिजात वर्ग के उन कलाकारों का ये संस्था अड्डा बन गई, जो अपने सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के निकट संपर्क थे.

उपेक्षा के शिकार

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यही वजह रही कि देश के अन्य राज्यों से यहां कोई उपयुक्त कला प्रतिनिधित्व नहीं हुआ.

यह दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार के समांतर यहां भी कलाकारों ने संस्था के संविधान के विरुद्ध जाकर करई तरह के भ्रष्टाचार किए और निश्चय ही उनमें आर्थिक भी शामिल हैं.

दिल्ली के चुनिंदा चित्रकारों और उनके अनुगामी समूहों ने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कला आयोजन में भागीदारी की पुरस्कारों की बंदरबांट की, जिसके चलते दिल्ली से बाहर के राज्यों के बहुत ईमानदार और प्रतिभाशाली चित्रकार उपेक्षा के शिकार हुए.

अकादमी में चुनावों ने संस्था का रूप और स्वरूप ही विकृत कर दिया. भ्रष्टाचार ने इतनी असहनीय अति को छू लिया कि सन 1997 में सरकार ने उसकी स्वात्तता को खत्म कर उसे अधिग्रहित कर लिया और एक प्रशासक को बैठा दिया.

सांस्कृतिक-अफ़सरशाही

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लेकिन इससे संस्था में किसी तरह की कोई नई सांस्कृतिक-अफ़सरशाही विकसित नहीं हुई बल्कि भ्रष्टाचार र अधिक केंद्रीकृत हो गया. फलतः और स्वायत्तता की पुनर्स्थापना की गई.

लेकिन कुछ कलाकारों ने जो संगठित गिरोह की तरह कला की दुनिया में अपना वर्चस्व बना चुके थे, उसे फिर उसी भ्रष्टाचार के शिकंजे में फंसा दिया.

यह उल्लेख ज़रूरी है कि श्रीमती इंदिरा गांधी ने बढ़ते महानगरीकरण के बीच कलाकारों के स्वतंत्र रूप से काम न कर पाने के संकट को समझकर दिल्ली विकास प्राधिकरण को कहा कि वह कलाकारों के लिए ऐसी जगह उपलब्ध करवाए, जहां कलाकार उसे अपने स्टूडियो की तरह इस्तेमाल करते हुए कला-साधना कर सकें.

उन्होंने बड़े आठ स्टूडियो बनवा कर दिए, जो लगभग चार एकड़ भूमि पर स्थापित हैं. यहां लगभग सौ कलाकारों के काम करने की सुविधा है.

कला के माफ़िया

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लेकिन गढ़ी में कला के सामंतों की तरह कुछ कलाकार कब्ज़ा किए हुए हैं, जिनके सभी उन स्टूडियो को खाली नहीं करवाया जा सका.

कहना न होगा कि गढ़ी पर कब्ज़ा जमाए रखने वाले कलाकार कला के माफ़िया बन चुके हैं. उन्होंने चुनावों को अपने अधीन कर रखा है.

इसे संस्थागत भर्त्सना का सर्वाधिक उपयुक्त समय कहना चाहिए, जब संस्था से चुनावों के ज़रिए विभिन्न स्तर पर जुड़े कला-गिरोहों ने देश-विदेश की यात्राओं और अपनी पत्नियों और निकट संबंधियों तक को कलाकार बनाकर अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में भागीदारी के लिए भेज दिया.

यह भ्रष्टाचार देश के अख़बारों की सुर्खियां बना. प्रश्न उठता है कि यह संस्था आखिर कब समझेगी कि उसकी भूमिका इस महाद्वीप की महान कला परंपरा के प्रोन्नयन और संवर्द्धन के लिए है.

उसे देश की सांस्कृतिक एकता का आधार रचकर संपूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करना है जिसमें केवल दिल्ली नहीं, सुदूर आदिवासी अंचल और उत्तर-पूर्वी इलाकों की जनजातियों की कला परम्परा को भी शामिल करना है.

कला का बाजार

इसमें भारतीय सौंदर्य दृष्टि तथा परंपरा पर गहनशोध की गुंजाइश होनी चाहिए. इसे कितनी हास्यापद स्थिति कहा जाना चाहिए कि आज भारत का कोई कलाकार, दुनिया के सौ श्रेष्ठ कलाकारों की श्रेणी में शामिल नहीं है.

इस भूमंडलीकृत समय में जबकि कला का एक बड़ा बाज़ार सिर्फ़ निजी दीर्घाओं की इच्छाओं का दास और उनके स्वार्थों का केंद्र बपना हुआ है तब देश उन कलाकोरं को संगठित करके उनके काम के ज़रिए इस कुचक्र को तोड़कर यह अकादमी एक स्वस्थ संभावना का स्थापत्य खड़ा करे.

उम्मीद है, जबकि अच्छे दिनों का हो-हल्ला चौतरफ़ा मचा हुआ है, एक स्वायत्त कला-संस्था भारतीय कला के अच्छे दिनों के लाने की प्रतिज्ञा प्रकट करे, उसके लिए यही सर्वथा श्रेयस्कर होगा.

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