पहला भाषण: नेहरू और जिन्ना का फ़र्क

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 14 अगस्त 1947 की आधी रात को जो भाषण दिया था उसे 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनी' के नाम से ही जाना जाता है. पाकिस्तान बनने से कुछ क्षण पहले मोहम्मद अली जिन्ना ने भी अपने देशवासियों को संबोधित किया था.

इन दोनों भाषणों के अंश:

जवाहर लाल नेहरू

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आज हम दुर्भाग्य के एक युग का अंत कर रहे हैं और भारत पुनः खुद को खोज पा रहा है. आज हम जिस उपलब्धि का उत्सव मना रहे हैं, वो महज एक क़दम है, नए अवसरों के खुलने का. इससे भी बड़ी जीत और उपलब्धियां हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं.

भारत की सेवा का अर्थ है लाखों-करोड़ों पीड़ितों की सेवा करना. इसका अर्थ है ग़रीबी, अज्ञानता, और अवसर की असमानता मिटाना. हमारी पीढ़ी के सबसे महान व्यक्ति की यही इच्छा है कि हर आँख से आंसू मिटे. शायद ये हमारे लिए संभव न हो पर जब तक लोगों कि आंखों में आंसू हैं, तब तक हमारा काम ख़त्म नहीं होगा.

आज एक बार फिर वर्षों के संघर्ष के बाद, भारत जागृत और स्वतंत्र है.

भविष्य हमें बुला रहा है. हमें किधर जाना चाहिए और हमें क्या करना चाहिए, जिससे हम आम आदमी, किसानों और कामगारों के लिए आज़ादी और अवसर ला सकें, हम ग़रीबी, हम एक समृद्ध, लोकतान्त्रिक और प्रगतिशील देश बना सकें. हम ऐसी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाओं को बना सकें जो हर आदमी-औरत के लिए जीवन की परिपूर्णता और न्याय सुनिश्चित कर सके?

कोई भी देश तब तक महान नहीं बन सकता जब तक उसके लोगों की सोच या कर्म संकीर्ण हैं.

मोहम्मद अली जिन्ना

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मुझे मालूम है कि कई लोग भारत के विभाजन - पंजाब और बंगाल के बंटवारे से सहमत नहीं हैं. लेकिन अब जबकि इसकी स्वीकृति मिल गई है अब हम सब का फ़र्ज़ है कि जो समझौता हो गया है उसे अंतिम और अटूट माने.

विभाजन होना ही था. इस बारे में दोनों समुदायों की चिंता - जहाँ कहीं भी एक समुदाय बहुमत में है और दूसरा अल्पसंख्यक -समझी सकती है.

सवाल ये है कि क्या जो हुआ उसके विपरीत क़दम उठाना संभव था?

सरकार का सब से पहला कर्तव्य क़ानून व्यवस्था को बनाकर रखना है, ताकि देशवासियों की संपत्ति, जीवन और धार्मिक आस्थाएं सुरक्षा रखी जा सकें.

हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों तरफ ऐसे लोग हैं जो बंटवारे को नापसंद करते हैं. मेरी राय में इसके इलावा कोई और समाधान नही था. मुझे उम्मीद है भविष्य मेरी राय के पक्ष में फ़ैसला देगा.

एक संयुक्त भारत का विचार कभी सफल नहीं होता. मेरे विचार में इसका अंजाम भयानक होता. मेरा ख़्याल सही है या ग़लत, ये वक़्त बताएगा.

समय के साथ-साथ हिन्दू - मुलमान, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के फ़र्क ख़त्म होंगे. क्योंकि मुसलमान की हैसियत से आप पठान, पंजाबी, शिया या सुन्नी हैं. हिन्दुओं में आप ब्राह्मण, खत्री, बंगाली और मद्रासी हैं. अगर ये समस्या नहीं होती तो भारत काफ़ी पहले आज़ाद हो जाता.

आप देखेंगे कि वक़्त के साथ देश के नागरिक की हैसियत से हिन्दू, हिन्दू नहीं रहेगा मुसलमान, मुसलमान नहीं रहेगा, धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं क्यूंकि ये हर व्यक्ति का व्यक्तिगत ईमान है, बल्कि सियासी हैसीयत से.

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