कितना दमदार था 'प्रधानसेवक' मोदी का भाषण?

  • 15 अगस्त 2014
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स्वतंत्रता दिवस पर अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सकारात्मक रुख़ अख्तियार किया. उन्होंने सामाजिक सांप्रदायिक और राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी की.

विकास के मार्ग पर सबको साथ ले जाने की बात कही. बलात्कार कांड पर शर्म का इज़हार किया.

उन्होंन सकारात्मक रुख़ अपनाते हुए पूर्व सरकारों की देश की तरक्की में भूमिका की सराहना की.

कई लोगों को भाषण पसंद आया, लेकिन कुछ ने कहा अच्छे शब्द तब अच्छे लगते हैं जब इन पर अमल हो.

पढ़िए बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद का पूरा आकलन

राजीनीति में एक साल लंबा अरसा होता है.

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इसी दिन ठीक एक साल पहले नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण के जवाब में एक भाषण दिया था जिसे प्रधानमंत्री के पद के लिए 'ड्राय रन' कहा गया था.

लेकिन उस भाषण की काफ़ी आलोचना हुई थी क्योंकि वो नकारात्मक भावनाओं से भरा पड़ा था.

उनका भाषण प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर मसलों के हल के बजाय केवल सरकार की बुराई करने से भरा था.

मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक लाल क़िले से देश के नाम स्वतंत्रता दिवस पर अपने पहले भाषण में सकारात्मक शब्दों और सोच का जो ताना-बाना बुना, वह अधिकतर लोगों को भा गया.

प्रधानमंत्री नहीं प्रधानसेवक

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प्रतिक्रियाएं भी सकारात्मक हैं. चाहे वह आम आदमी हो या उद्योगपति, अधिकतर लोगों ने प्रधानमंत्री के भाषण की प्रशंसा की.

भाषण लंबा था. एक घंटे चला. मगर यह पहले से तैयार या लिखा हुआ भाषण नहीं था. इसके बावजूद इसमें जोश था. इसमें आस्था और दृष्टि का अहसास हुआ.

भाषण में सबको साथ लेकर विकास के मार्ग पर चलने का इरादा नज़र आया.

"मैं आपके सामने प्रधानमंत्री नहीं, प्रधानसेवक के रूप में आया हूं" कहकर प्रधानमंत्री ने अपनी विनम्रता की झलक भी दिखाई. उन्होंने देश की तरक्की में पूर्व सरकारों और राज्य सरकारों के योगदान को भी माना.

हिंसा रुके

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उन्होंने कहा कि बलात्कार की घटनाओं के बारे में सुनकर माथा शर्म से झुक जाता है.

"माता-पिता बेटियों पर बंधन डालते हैं, लेकिन बेटों से भी पूछना चाहिए वो कहां जा रहे हैं, क्या करने जा रहे हैं."

उनके भाषण में सुलह और मेलजोल का पैग़ाम भी था. मोदी ने कहा वह देश को बहुमत के आधार पर नहीं बल्कि सहमति के आधार पर चलाएंगे.

उन्होंने जातिगत और सांप्रदायिक हिंसा पर रोक लगाने पर भी ज़ोर दिया

अमल ज़रूरी

फिर भी कुछ लोगों का विचार था कि बातें अच्छी करना, सकरात्मक रुख दिखाना एक बात है, इस पर अमल और बात.

मोदी सरकार को भारी मत से चुनाव जीतकर सत्ता में आए क़रीब तीन महीने होने वाले हैं.

कुछ लोगों की ख़ुशी विकास दर न बढ़ने पर फीकी पड़ती जा रही है. वो कहते हैं मोदी सरकार यूपीए सरकार के तौर-तरीक़ों पर ही चल रही है.

कुछ लोग इस सरकार को यूपीए-3 सरकार कहने लगे हैं. मगर मोदी समर्थक कहते हैं उन्हें देश में सुधार के लिए एक साल का समय देना चाहिए.

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