अरब देश: इंकलाब की जगह हिंसा का बोलबाला

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जातीयता, जिहाद और अरब राष्ट्रवाद. लेबनान में अमेरिकन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ब्रूस रिडेल के अनुसार इन तीन शब्दों में अरबी बोलने वाले मुस्लिम देशों के मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक महासंकट के कारणों को समेटा जा सकता है.

लीबिया हो या मिस्र. सीरिया हो या इराक़. इन देशों में हिंसा ने इंकलाब की जगह ले ली है. तानाशाही ने उभरती लोकतांत्रिक उम्मीदों का गला घोंट दिया है.

जनवरी 2011 में मिस्र के जनआंदोलन ने फौजी तानाशाह होस्नी मुबारक को उखाड़ फेंका था. इस प्राचीन देश के पाँच हज़ार साल के इतिहास में पहली बार लोकतांत्रिक चुनाव हुए और मुस्लिम ब्रदरहुड के हिमायती मोहम्मद मोरसी राष्ट्रपति चुने गए.

लेकिन एक साल बाद फ़ौज ने उनका तख्ता पलटा और दिखावे का चुनाव करके अब्दुल फतह अल सीसी राष्ट्रपति बन गए. इस तरह अरब स्प्रिंग कहा जाने वाला आंदोलन निराशाजनक तरीक़े से ख़त्म हो गया.

भारत में पिछले 35 सालों से काम कर रहे सीरियाई पत्रकार वाएल अव्वाद कहते हैं, "इंकलाब के बाद चुनाव में मुस्लिम कट्टरपंथियों को चुना गया जिसके कारण काउंटर रेवोल्यूशन हुआ और अरब स्प्रिंग कुचल दिया गया.''

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सीरिया के शासक बशर अल असद ने गृहयुद्ध के बीच मनमाना चुनाव कराया और ख़ुद को विजेता घोषित करके राष्ट्रपति पद पर बने रहे.

संकट के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार

इराक़ में भी हिंसा के बीच अप्रैल में चुनाव कराए गए और प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी गद्दी पर बने रहे. अब अमरीका के कहने पर वो सत्ता से हटने पर राज़ी हुए हैं लेकिन देश तीन टुकड़ों में बंटने के कगार पर आ गया है.

एक हिस्से पर कुर्दिस्तान के समर्थकों ने क़ब्ज़ा कर लिया है. शिया नेताओं के पास एक हिस्सा है और एक पर सुन्नी कट्टरपंथी संगठन आइएस ने सीरिया के एक टुकड़े को शामिल करके एक ख़लीफ़ा नियुक्त कर दिया है. जानकार कहते हैं अरब देशों में पैदा हुए संकट के लिए वे खुद ज़िम्मेदार हैं लेकिन अमरीका भी उतना ही उत्तरदायी है.

अमरीका ने 13 साल पहले 9/11 के हमलों के बाद इस्लामी चरमपंथियों के खिलाफ एक वैश्विक युद्ध शुरू किया था. साथ ही इराक और अफ़ग़ानिस्तान पर चढ़ाई की थी.

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उस समय अल कायदा निशाने पर था. कहा जाता है कि उन दिनों चरमपंथियों की संख्या एक हज़ार के करीब थी. आज उनकी तादाद 50,000 से अधिक है. अब तो अल कायदा भी कहता है कि आईएस उससे भी अधिक घातक और कट्टरवादी है.

जानकार मानते हैं कि हिंसा, तानाशाही और आतंकवाद का ये दौर अच्छे दिन लेकर आएगा. शायद तब तक इन देशों की सीमा रेखाएं बदल चुकी होंगी.

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