फिर एक फ़िल्म पर भड़की विरोध की चिंगारी

भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अक्तूबर, 1984 में हुई हत्या पर बनी विवादास्पद फ़िल्म पर पाबंदी लगाना पुरानी घटनाओं की याद दिलाता है.

इस बार, कांग्रेस पंजाबी फ़िल्म 'कौम दे हीरे' के प्रदर्शन का विरोध कर रही थी. कांग्रेस की शिकायत है कि फ़िल्म में इंदिरा गांधी के हत्यारों को महिमामंडित किया गया है.

ख़ुफ़िया एजेंसियों ने चेतावनी दी है कि अगर फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो फिर हिंसा भड़क सकती है. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख विरोधी दंगे में देश भर में 3,000 से ज़्यादा सिख मारे गए थे.

पंजाब के कांग्रेसी नेताओं के मुताबिक़ फ़िल्म में हत्यारों को हीरोके तौर पर पेश किया गया है. हालांकि फ़िल्म के निर्माता इससे इनकार कर रहे हैं. निर्माता के मुताबिक़ फ़िल्म राजनीतिक हत्याओं पर आधारित है.

वैसे, अपने नेताओं और उनके शासन पर बनी फ़िल्मों को लेकर कांग्रेस का पुराना रिकॉर्ड भी दोहरे रवैए वाला रहा है.

नेताओं की आलोचना नहीं

1975 में बनी फ़िल्म 'आंधी' इंदिरा गांधी के जीवन पर आंशिक तौर पर आधारित थी. तब की कांग्रेस सरकार ने पूरी फ़िल्म को रिलीज़ नहीं होने दिया था. 1977 में 'क़िस्सा कुर्सी का' इंदिरा गांधी और उनके बेटे संजय गांधी पर एक व्यंगात्मक फ़िल्म थी, जिसे आपातकाल के दौरान प्रतिबंधित कर दिया गया था.

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आठ साल पहले, कांग्रेस ने सोनिया गांधी के जीवन पर प्रस्तावित फ़िल्म बनाने वाले निर्माताओं को क़ानूनी नोटिस भेजा था. फ़िल्म समीक्षक शुभ्रा गुप्ता कहती हैं, "राजनीतिक नेता 'पवित्र व्यक्तित्व' वाले माने जाते है, फ़िल्मों में उनकी आलोचना नहीं हो सकती."

1994 में फूलन देवी के जीवन पर आधारित शेखर कपूर की फ़िल्म 'बैंडिट क्वीन' पर बलात्कार के दृश्य और गालियों के इस्तेमाल के चलते पाबंदी लगाई गई थी. अगले साल, धार्मिक दंगों पर आधारित मणिरत्नम की फ़िल्म 'बांबे' पर हिंदुत्व समर्थकों ने पाबंदी लगाने की मांग की थी.

सहनशीलता पर सवाल

1998 में हिंदुत्व समर्थकों ने समलैंगिक रिश्तों पर बनी दीपा मेहता की फ़िल्म 'फ़ायर' के प्रदर्शन के दौरान हमला कर दिया था. 2000 में कट्टरवादी हिंदुओं ने वाराणसी में दीपा मेहता की फ़िल्म 'वॉटर' के सेट पर तोड़ फोड़ की थी. इन लोगों का आरोप था कि फ़िल्म शहर की छवि और हिंदू परंपराओं को कलंकित करती है.

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कमल हासन की विश्वरूपम पर कई मुस्लिम संगठनों ने आपत्ति जताई थी. बाद में हसन को अपनी फ़िल्म में से उन दृश्यों को हटाना पड़ा था. बिल्लू बारबर फ़िल्म से बारबर शब्द को हटाना पड़ा था.

समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन के मुताबिक़ कांग्रेस पार्टी कुछ ज़्यादा ही संवेदनशील है क्योंकि ऐसी फ़िल्में पार्टी की लोक-कहानियों को चुनौती देंगी.

शिव विश्वनाथन कहते हैं, "भारत अब ऐसा समाज बन चुका है, जिसमें सहन करने की क्षमता नहीं है.

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