झारखंड में किताबों को तरसते स्कूली छात्र

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"घर में कई बार मां-बाबा से कहा है, पर वे कहते हैं कि सरकार क्यों नहीं भेजती. अब हमें क्या पता क्यों नहीं भेजती. चार महीने बीत गए, अब तक किताबें नहीं मिलीं. मतलब बिन किताब, अंधेरे में भविष्य."

झारखंड में एक गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले अभिषेक की ये बातें मामूली सी लग सकती हैं, लेकिन इन बातों में राज्य के लाखों स्कूली बच्चों की व्यथा झलकती है.

कक्षा एक से आठ तक सरकारी स्कूलों में बच्चों को मुफ़्त किताबें दी जाती हैं. शैक्षणिक सत्र एक अप्रैल से शुरू हो चुके हैं. लेकिन लगभग 50 लाख बच्चों को अब तक किताबें नहीं मिली हैं.

अधिकारियों के मुताबिक़ अभी बच्चों तक किताबें पहुंचने में कम से कम ढाई महीने और लगेंगे.

झारखंड शिक्षा परियोजना परिषद की निदेशक पूंजा सिंघल कहती हैं कि किताबों की छपाई प्रक्रिया पूरी करने में देर होने की वजह से दिक्कतें हुई हैं. उनके अनुसार सितंबर में किताबें छप कर आ जाएंगी.

उल्लंघन

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शिक्षा के अधिकार फोरम के राज्य संयोजक ए के सिंह कहते हैं कि यह स्थिति शिक्षा के अधिकार क़ानून का उल्लंघन है.

वह कहते हैं, "सरकार को कई बार आगाह किया गया है पर बच्चों की ज़िंदगी से खिलवाड़ होता रहा है. पहले के कई वर्षों में भी यही हाल रहा है. यही वजह है कि झारखंड की बुनियादी शिक्षा पर आने वाली रिपोर्ट चिंताजनक होती है."

एक शिक्षिका नाम नहीं छापने के अनुरोध पर बताती हैं कि बच्चों की पुरानी किताबें जमाकर उसे अगली कक्षा में प्रवेश करने वाले बच्चों के बीच बांट दी गईं है लेकिन कमियां बरकरार रहती हैं.

रांची जिले के चिलदाग मध्य विद्यालय में पढ़ने वाली छात्रा साधना बताती हैं कि स्कूल में तो शिक्षक पढ़ाई करा देते हैं लेकिन किताबों के अभाव में घर जाकर होमवर्क करना या नियमित पढ़ाई कठिन हो जाता है.

इस साल वार्षिक शिक्षा सर्वेक्षण रिपोर्ट झारखंड में स्कूली शिक्षा की दयनीय स्थिति को बयान करती है.

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