क्यों नहीं ख़त्म होती है मैला ढोने की प्रथा

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अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत में मैला ढोने की प्रथा पर एक रिपोर्ट जारी की है. इसमें कहा गया है कि सरकारी अधिकारियों द्वारा कड़े कदम नहीं उठाए जाने की वजह से यह प्रथा आज भी बदस्तूर जारी है.

मैला ढोने की प्रथा को ख़त्म करने के लिए काम कर रही संस्था राष्ट्रीय गरिमा अभियान का दावा है कि 12 लाख लोग अब भी मैला ढोने का काम कर रहे हैं.

इस काम से ताल्लुक़ रखने वाले 135 लोगों से बातचीत पर आधारित यह रिपोर्ट बताती है कि इस काम से जुड़े लोगों को किस तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ता है.

जानिए क्या कहा गया है इस रिपोर्ट में

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  • महिलाएं जब यह काम छोड़ना चाहती हैं तो उन्हें दोहरे विरोध का सामना करना पड़ता है. एक तरफ परिवार के लोग जिसमें पति और सास-ससुर होते हैं, वो इसे छोड़ना उचित नही मानते हैं, वहीं दूसरी तरफ वो लोग भी इसका विरोध करते है जिनके घरों में ये काम करती हैं.
  • इस काम के बदले मध्यप्रदेश के मंदसौर, देवास, सीहोर और उज्जैन जैसे शहरों में काम करने वाले परिवारों के घर से रोज़ एक रोटी मिलती है. काम छोड़ने पर जब ये रोटी नही मिलती है तो परिवार के लोग ही इसकी ख़िलाफत करते हैं.
  • इन महिलाओं को इसके बदले वैकल्पिक रोज़ग़ार मिलना भी आसान नही होता है. छुआछूत की वजह से कोई भी इन्हें दूसरा काम देने को तैयार नही होता है.
  • काम छोड़ने की स्थिति में इन महिलाओं के साथ बदतमीज़ी की जाती है. कई महिलाओं का कहना है कि उन पर तरह-तरह की छींटाकशी की जाती है जैसे कि 'भंगन अब नेतागिरी करेंगी.'
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  • काम छोड़ने पर महिलाएं और उनके परिवार के लोगों को लगातार धमकी मिलती थी कि गांव में रहने नही देंगे और मार डालेंगे.
  • मंदसौर की एक महिला के काम छोड़ने की वजह से ऊंची जाति के लोग इस कदर नाराज़ हो गए कि उन्होंने उसके बच्चों की शादी में गांव में बैंड नही बजने दिया. इसके अलावा उस महिला को गांव के अंदर काफी वक्त तक चप्पल भी नही पहनने दी गई थी.
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  • आम लोगों के साथ ही सरकारी कर्मचारी भी इनके साथ भेदभाव करते आए हैं. सरकारी कर्मचारी इसे किसी भी तरह से ग़लत नही मानते हैं, यही वजह है कि ये प्रथा आसानी से ख़त्म नही हो पा रही है.
  • इस काम के लिये मिलने वाले वेतन को कभी भी रोक लिया जाता था या कई बार ऐसा भी हुआ कि कई-कई महीने उन्हें वेतन नही दिया गया.
  • दुनिया में सबसे बड़ी मानी जानी वाली भारतीय रेल ख़ुद मैला ढोने का काम करवाने में लगी है. पटरी और रेलवे स्टेशनों पर ये प्रथा बदस्तूर जारी है.

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