बिहार: कोसी से ज़्यादा सियासत ने मारा

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उत्तर बिहार में हर साल बाढ़ से भीषण तबाही लाने वाली कोसी नदी साल 2008 में नेपाल में कुसहा बाँध के टूटने के कारण कुछ ज़्यादा ही विकराल हो गई थी.

पूर्व जल संसाधन मंत्री जगदानंद सिंह ने तब इस बाढ़ को जल-प्रलय कहा था. बड़ी त्रासदी थी, आपदा प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार और विश्व बैंक ने भी बिहार के बाढ़ पीड़ितों को मदद पहुँचाने की कोशिश की थी.

इसके बावजूद आख़िरी आदमी तक सहायता नहीं पहुंची और बाढ़ के छह साल बाद भी पीड़ितों के चेहरे पर ख़ुशी नहीं लौटी है.

रिपोर्ट विस्तार से

राहत से वंचित नगर पंचायत

सुपौल ज़िला के बसंतपुर प्रखंड के बालेश्वर सिंह बताते हैं कि पुनर्वास कार्यक्रम से नगर पंचायत को अलग रखा गया है. जबकि बाढ़ में ये इलाक़े भी बुरी तरह प्रभावित हुए थे.

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वहीं मधेपुरा ज़िले के मुरलीगंज प्रखंड के लाल बहादुर यादव कहते हैं कि नगर पंचायत इलाक़े में लगभग 150 घर गिर गए थे. कार्यालय को सूची देने के बाद भी पीड़ितों को कोई राहत नहीं मिल सकी.

वीरपुर नगर पंचायत के कार्यपालक अधिकारी सुधीर कुमार सिंह कहते हैं कि नगर पंचायत के पीड़ितों को कार्यक्रम से जोड़ने की बात प्रमंडलीय आयुक्त के साथ हुए बैठक में उठाई गई थी, सकारात्मक आश्वासन भी मिला था, लेकिन हुआ कुछ नहीं.

मुरलीगंज के प्रखंड परियोजना प्रबंधक अनिल कुमार मानते हैं कि यह निर्णय विभिन्न इलाकों में आपदा की तीव्रता को देखते हुए लिया गया है.

प्रशासन नाकाम

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बिहार सरकार को बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए विश्व बैंक से 1,223 करोड़ रुपये क़र्ज़ के तौर पर मिले थे लेकिन जुलाई 2014 तक मात्र 365.28 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाए.

इसी तरह जुलाई 2014 तक कुल 66,203 मकान बनने थे लेकिन 17,203 ही बन पाए. तीन जिलों में 37 ग्रामीण सड़कें बननी थीं लेकिन सिर्फ एक सड़क ही पूरी हो पाई.

ज़ाहिर है कि बिहार के पास पैसे की कमी नहीं थी लेकिन राज्य का राजनीतिक नेतृत्व सहायता कार्यक्रम को पूरी तरह लागू नहीं करा पाया.

सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र यादव मानते हैं कि प्रशासन के हर स्तर पर भ्रष्टाचार और इच्छा-शक्ति की कमी की वजह से लोगों को सहायता के लिए तरसना पड़ा.

पुनर्वास की राशि कम

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पुनर्वास के लिए सरकार पीड़ितों को 55 हज़ार रुपये देती है. पांच हज़ार रुपये सोलर लाइट लगाने के लिए भी दिए जा रहे हैं. इस साल से 10 हज़ार रुपये का प्रावधान शौचालय बनाने के लिए भी किया गया है.

लेकिन प्रखंड के रामपुर टपड़ा के उदय कुमार बताते हैं कि यह राशि वास्तविक ज़रुरत से काफी कम है. वे कहते हैं कि उन्हें 55 हज़ार रुपये मिले लेकिन 360 वर्ग फीट का मकान बनाने में करीब 1.80 लाख रूपये खर्च हो गए.

आपदा पर भारी राजनीति

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आपदा के समय लोग दुश्मनी भूलकर भी एक-दूसरे की मदद करते हैं. लेकिन उस समय के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भीषण जल त्रासदी के समय भी अपने राजनीतिक विरोधी गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से दुश्मनी निभाई.

मोदी ने राहत कार्य के लिए बिहार सरकार को पांच करोड़ रुपये और एक ट्रेन भरकर राहत सामग्री भेजी थी लेकिन ये राशि और पूरी सामग्री वापस कर दी गई थी. गुजरात की जनता का पैसा नीतीश कुमार की वजह से बिहार के बाढ़ पीड़ितों के काम नहीं आ सका.

दूसरी तरफ विश्व बैंक के पैसे का भी राहत कार्यक्रम में समुचित इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है.

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