भारत के सबसे घने जंगल ख़तरे में?

  • 28 अगस्त 2014

पश्चिमी घाटों पर सरकार के ताज़ा रुख के बाद घाटों के पर्यावरण के संरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर शुरू हो गई है.

केंद्र सरकार ने बुधवार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल को बताया था कि वो पश्चिमी घाटों पर माधव गाडगिल पैनल की रिपोर्ट के सुझावों को नहीं मानेगी.

पर्यावरण मंत्रालय ने ट्रिब्युनल में कहा कि वो गाडगिल समीति की बजाय डॉक्टर के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में बनी हाई लेवल वर्किंग ग्रुप की रिपोर्ट का अनुसरण कर रही है.

माधव गाडगिल पैनल की रिपोर्ट में समूचे पश्चिमी घाट को संवेदनशील स्थान बताया गया था. साथ ही खनन और निर्माण गतिविधियां रोकने की हिदायत दी गई थी.

वहीं कस्तूरीरंगन पैनल ने अपनी रिपोर्ट में यहाँ के 60 फीसदी इलाके को कृषि प्रयोगिक, रिहायशी और 37 फ़ीसदी इलाके को पर्यावरण के लिए संवेदनशील बताया.

पर्यावरणविद माधव गाडगिल ने बीबीसी हिन्दी के साथ विशेष बातचीत में कहा, “नरेंद्र मोदी कहते रहे हैं कि वो विकास को जनांदोलन बनाना चाहते हैं. लेकिन यहां तो विपरीत हो रहा है.”

इस क़दम का मतलब?

पर्यावरण मंत्रालय के इस रूख का सीधा मतलब है महाराष्ट्र से केरल तक फैले इको-सेंसेटिव पश्चिमी घाट इलाकों में खनन, बांध, पावर प्लांट जैसी योजनाएं शुरू की जा सकेंगी.

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राज्य सरकारें भी अगस्त 2011 में पेश की गई इस रिपोर्ट का शुरू से ही विरोध कर रहीं हैं और चाहती हैं कि ऐसी योजनाएं जल्दी शुरू हो.

पश्चिमी घाटों पर विभिन्न निर्माण योजनाओं के खिलाफ़ नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल में लगातार कानूनी लड़ाई लड़ रही गैरसरकारी संस्थाएं सरकार के रुख़ से नाराज़ हैं.

इन संस्थाओं का मानना है कि पश्चिमी घाट जैव-विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं और ये क्षेत्र एशिआई हाथियों जैसे जानवरों के लिए बचा एकमात्र घर है.

गैरसरकारी गोवा फ़ाउंडेशन के प्रमुख क्लॉड अलवारिस ने कहा, “खनन और पर्यावरण का बचाव एक साथ नहीं हो सकता.”

अलवारिस बोले, “गाडगिल रिपोर्ट ऐसे लोगों ने तैयार की थी जो पश्चिमी घाटों के ही थे, और स्थानीय लोगों को शामिल किया गया था. के कस्तूरीरंगन की रिपोर्ट दंतविहीन है और दिल्ली में बैठे लोगों ने इसे तैयार किया है. जो वास्तविकता से वाक़िफ़ नहीं लगते.”

जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता में नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि वो इस मामले पर 9 सितंबर तक विस्तृत जानकारियों के साथ हाज़िर हों.

गाडगिल रिपोर्ट की ख़ास बातें

सरकार को दी अपनी रिपोर्ट में गाडगिल पैनल ने समूचे पश्चिमी घाट को संवेदनशील इलाका बताया था.

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साथ ही इसे संवेदनशीलता के आधार पर तीन हिस्सों में बांटा भी गया. पैनल ने सलाह दी थी कि गोवा में पश्चिमी घाटों पर खनन की इज़ाज़त नहीं दी जानी चाहिए.

गाडगिल पैनल ने ये भी कहा था कि वहाँ मौजूदा खनन गतिविधियों को पांच साल के भीतर बंद कर दिया जाना चाहिए.

पैनल के सुझावों का कई राज्य सरकारों ने विरोध किया और उन्हें अप्रयोगात्मक बताया था.

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