छत्तीसगढ़ः नक्सलियों के आत्मसमर्पण पर सवाल

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छत्तीसगढ़ में पिछले तीन महीनों से लगभग हर दिन कथित माओवादियों की गिरफ़्तारी और उनके आत्मसमर्पण को लेकर सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं.

पिछले तीन माह में पुलिस ने अकेले बस्तर में 300 से अधिक माओवादियों की गिरफ़्तारी और उनके समर्पण का दावा किया है.

लेकिन कथित माओवादियों के समर्पण और गिरफ़्तारी पर सवाल भी उठ रहे हैं.

कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पुलिस पर आरोप लगाया है कि पुलिस गांव के आदिवासियों को पकड़ कर उन्हें माओवादी बता रही है. इनमें से अधिकांश के पास कोई हथियार भी नहीं मिला है.

ताज़ा मामला जनपद पंचायत के सदस्य और कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सुखदेव नाग और मांझीराम कश्यप का है, जिनकी दो दिन पहले हुई गिरफ़्तारी के बाद पुलिस ने दावा किया था कि सुखदेव ने ही दरभा घाटी में हमला किया था.

छत्तीसगढ़ से स्थानीय पत्रकार आलोक पुतुल की ख़ास रिपोर्ट.

पूछताछ के बाद?

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इस हमले में कांग्रेस के कई नेता और पुलिसकर्मियों समेत 31 लोग मारे गए थे.

पुलिस के अनुसार सुखदेव नाग ने ही कांग्रेस नेता महेंद्र कर्मा को गोली मारी थी.

लेकिन आदिवासी परिषद के राष्ट्रीय सचिव और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम इसे झूठ बता रहे हैं.

कुंजाम कहते हैं, "सुखदेव निर्वाचित प्रतिनिधि हैं और क्षेत्र की जनता उन्हें जानती है. पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए दो बार थाने बुलाया और बाद में उनकी गिरफ़्तारी दिखा दी."

पुलिस का कामकाज

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प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेश बघेल का कहना है कि महेंद्र कर्मा को जब मारा गया था तो माओवादी पूछ रहे थे कि महेंद्र कर्मा कौन है.

सुखदेव नाग राजनीति से जुड़े हैं और अगर वह इस हमले में शामिल होते तो उन्हें महेंद्र कर्मा को पहचानने के लिए दूसरों से पूछने की ज़रूरत नहीं होती.

बघेल कहते हैं, "छत्तीसगढ़ की पुलिस का कामकाज सभी जानते हैं. उसने तो खाना पकाने वाले को भी कुख्यात माओवादी बता कर पकड़ा है."

लेकिन राज्य के गृहमंत्री रामसेवक पैंकरा इस तरह के सवालों को ग़ैरज़रूरी मानते हैं.

पैंकरा कहते हैं, "बघेल के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है. इसलिए वो ऐसी बातें कर रहे हैं."

फ़र्ज़ी माओवादी!

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हालांकि छत्तीसगढ़ में कथित माओवादियों का समर्पण और गिरफ़्तारी पहले भी विवादों में रहे हैं.

कुछ साल पहले ही राजधानी रायपुर में मुख्यमंत्री रमन सिंह और पुलिस महानिदेशक के सामने हुए 79 कथित माओवादियों के समर्पण के दूसरे दिन ही इनके फ़र्ज़ी होने की बात सामने आई थी.

इसके बाद सरकार ने जांच की बात कह कर पल्ला छुड़ाया था.

सवाल इसलिए भी हैं कि ऐसे समर्पण और गिरफ़्तारियों के अधिकांश मामले अदालत में साबित नहीं हो पाते.

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