शादी औरत-मर्द की या हिंदू-मुसलमान की

भारत, शादी, विवाह इमेज कॉपीरइट AP

आज़ादी के छह दशक से भी ज़्यादा बीत जाने के बाद भारत में शादी जैसे निजी मामलों में व्यक्तिगत पसंद नापंसद के अलावा और भी बहुत सी चीज़ें मायने रखती हैं. पढ़िए अपूर्वानंद का विश्लेषण.

कोई पच्चीस साल पुरानी बात है. पटना में हमारे दो मित्रों ने विवाह का फ़ैसला किया. पुरुष के नाम से मुसलमान और स्त्री के नाम से हिंदू होने का बोध होना स्वाभाविक था.

विवाह संपन्न कराने 'मैरेज रजिस्ट्रार' हमारे पुरुष मित्र के घर पर आए. जहाँ यह सब कुछ हो रहा था तो उसके बगल में विश्व हिंदू परिषद का दफ़्तर था.

रस्में पूरी हो रही थीं कि पुलिस आ धमकी. उन्हें इसी संगठन की ओर से शिकायत मिली थी कि कोई मुसलमान किसी ब्राह्मण लड़की को भगाकर ले आया है और ज़बरन शादी कर रहा है. वहाँ डॉक्टर, वकील, अध्यापक, अनेक पेशों के संभ्रांत लोगों को देख कर, जो दोनों ही धर्मों के थे, पुलिस अचकचा गई.

हमारे एक अध्यापक ने पुलिस दल के मुखिया से कहा, "अरे, दोनों कम्युनिस्ट हैं, ब्राह्मण और मुसलमान नहीं. उसने कहा, ओ, यह बात है! और लौट गया."

ज़ोहरा प्रसंग

दिल्ली विश्वविद्यालय का चालीस साल से भी पुराना किस्सा आज भी तब के लोग सुनाते हैं, जब राजनीति शास्त्र के एक युवा 'मुस्लिम नामधारी' अध्यापक और एक बंगाली हिंदू स्त्री ने विवाह का निर्णय लिया.

इस विवाह के ख़िलाफ़ शहर में पोस्टर लग गए, तनाव फैल गया और दोनों को भूमिगत हो जाना पड़ा था.

इमेज कॉपीरइट AP.PTI

पहले मैंने पटना के जिस विवाह का ज़िक्र किया उसके बाद और भी ऐसी शादियाँ हुईं लेकिन हमें किसी तनाव का सामना नहीं करना पड़ा.

हाँ, विवाह के पहले जो आम शक होते हैं, जो हमारे सामाजिक पूर्वाग्रहों से जुड़े हैं, मसलन हिंदू लड़की मुस्लिम परिवार में कैसे 'एडजस्ट' करेगी, आदि उठाए गए और बहस होती रही लेकिन विवाह सार्वजनिक समारोह के रूप में आयोजित हुए.

कुछ दिन पहले ज़ोहरा सहगल की आत्मकथा पढ़ रहा था कि कैसे उदय शंकर के नृत्य संस्थान में काम करते हुए उन्हें ख़ुद से आठ साल छोटे अमरनाथ सहगल से मुहब्बत हो गई और उन दोनों ने विवाह किया. इस शादी में उनके पिता शामिल नहीं हो पाए लेकिन उन्होंने अपनी बेटी को रोका भी नहीं.

वह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है जिसमें वे ज़ोहरा से पूछते हैं कि अगर तुम कहोगी तो मैं चलूँगा लेकिन.... और जोहरा जिद नहीं करतीं.

सामाजिक दायरे

इमेज कॉपीरइट AP

यह विचारणीय है कि इस प्रकार के अंतरसांस्कृतिक संबंधों को सचेत रूप से किस दौर में और किस माहौल में उत्साहित किया गया.

फणीश्वरनाथ रेणु का लिखा याद आता है जिसमें कांग्रेस आंदोलन को भी लड़के-लड़कियों को भ्रष्ट करने वाला माना जाता था.

ऐसे सभी सामाजिक स्थलों में प्रवेश, जो अपने आरंभ में सामाजिक दायरे से अलग होते हैं, 'नए' और 'अस्वाभाविक' रिश्तों के पनपने के लिए माकूल आबोहवा का काम करते हैं. स्कूल, कॉलेज, दफ़्तर, राजनीतिक, सामाजिक आंदोलन, ऐसी ही जगहें हैं.

सामाजिक दृष्टि से संभ्रांत समझे जाने वाले स्थलों से अलग, जो न अभिजात हैं न उस दायरे में कभी उनका संक्रमण होने की संभावना है, प्रेम जैसे भाव की क्या संभावना है?

क्या साधारण लोग एक-दूसरे से मात्र यौनाकांक्षा की पूर्ति के लिए संबंध बनाते हैं या उनमें प्रेम जैसे किसी उदात्त भाव का जन्म होता है?

जाति पंचायत

सवाल यह है कि रिश्ता बनते वक़्त स्त्री-पुरुष, दोनों को इसका अहसास है या नहीं कि पुरुष-स्त्री होने के अलावा भी वे कुछ और हैं, मसलन दो धार्मिक या जातीय या प्रांतीय पहचानें! और यह कि एक रिश्ता बनने का अर्थ कुछ टूटना भी है!

इसलिए शिक्षित या तथाकथित रूप से संभ्रांत समाजों से अलग जाति-पंचायतों वाले गाँवों में प्यार करने का निर्णय कहीं अधिक जोखिम भरा है.

सामाजिक भिन्नता सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों हो सकती है. बहुभाषिकता या बहुधार्मिकता की विविधता स्वागत योग्य है लेकिन श्रेष्ठता और हीनता या शुद्धता, अशुद्धता के सिद्धांत पर निर्मित विविधता तिरस्कृत की जानी चाहिए.

आख़िरी सवाल यही है कि साथ रहने का सबसे अच्छा तरीक़ा क्या होगा? पारंपरिक समाजों का गुणगान करने वाले यह मानेंगे कि वे कई अर्थों में दमनकारी होते हैं. राष्ट्र नाम की नई सामुदायिक कल्पना में पारम्परिक जकड़न से आज़ादी का आश्वासन है.

चरण सिंह की चिट्ठी

इमेज कॉपीरइट WWW.SAINIKSAMACHAR.NIC.IN

इसलिए यह राष्ट्र कैसे बनाया जाए, इसमें व्यक्तियों के बीच लगाव के रिश्ते कैसे बनें जो आगे का हल कर सामुदायिकता का निर्माण कर सकें, इस पर चिंता करना स्वाभाविक होना चाहिए था. हमारे राजनीतिक नेताओं ने इस पर कितना समय लगाया?

चरण सिंह, जिन्हें आज हम एक जाट नेता के रूप में ही याद करते हैं, 22 मई, उन्होंने 1954 में नेहरू को ख़त लिखकर सुझाव दिया कि जाति को निरर्थक बनाने के लिए गजेटेड पदों के सारे प्रत्याशियों के लिए अपनी जाति के बाहर विवाह अनिवार्य कर देना चाहिए और यही विधायकों और सांसदों पर भी लागू होना चाहिए.

27 मई को नेहरू चरण सिंह की नेक मंशा की हिमायत करते हैं. वे कहते है कि जाति तब तक नहीं ख़त्म होगी जब तक अंतरजातीय विवाह अपवाद न बने रहकर आम न हो जाएँ.

नेहरू लिखते हैं कि संवैधानिक प्रावधानों और नियमों के ज़रिए लोगों को अपनी जाति के बाहर विवाह के लिए बाध्य करना वैयक्तिक स्वतंत्रता के बुनियादी सिद्धांत के ख़िलाफ़ है और इस प्रकार इरादतन नेक होने बावजूद यह एक प्रतिगामी प्रस्ताव है.

नेहरु का विरोध

इमेज कॉपीरइट AFP

यह विडंबना है कि चरण सिंह के प्रभाव क्षेत्र में ही इस खतोकिताबत के साठ साल बाद चरण सिंह की इच्छा के ख़िलाफ़ बहू-बेटी बचाओ अभियान के ज़रिए जाटों को यह कहा जा रहा है कि वे अपने बेटियों की जातिगत और धर्मगत शुद्धता की हिफ़ाजत करें.

यह कैसे हुआ, इसका जवाब इस प्रश्न में है कि जो चरण सिंह जाति-धर्मनिरपेक्ष भारतीय पहचान के निर्माण के उत्साही आग्रही थे, उनकी परिणति यह क्यों हुई कि वे जाट नेता के रूप में ही याद किए जाएँ.

और हमारे राजनीतिक नेताओं की महत्वाकांक्षा यादव नेता, राजपूत नेता, ब्राह्मण नेता, भूमिहार नेता के रूप में ही लोकप्रिय रहने तक ही क्यों सीमित रही?

नेहरू की राजनीति का विरोध करने के लिए पहले उन्हें आधा मुसलमान आधा क्रिस्तान कहा गया फिर एक फुसफुसाहट सी फैल गई कि इनकी बेटी ने तो मुसलमान से शादी कर ली है.

राजीव सोनिया की शादी

इमेज कॉपीरइट Getty

फिरोज़ नाम मुसलमान होने के लिए काफी था! हमने क़ायदे से राजनीतिक धारणाओं के निर्माण में अफ़वाहों, गप्पों, कानाफूसियों की भूमिका पर विचार नहीं किया है.

वरना जान पाते कि कांग्रेस विरोधी वातावरण बनाने में इंदिरा-फिरोज़ के विवाह के बाद राजीव और सोनिया की शादी को लेकर उड़नेवाली गप्पों की कितनी भूमिका है!

यह भी विचारणीय है कि क्यों हमारे उन नेताओं ने, जिनकी अंतरधार्मिक या अंतरजातीय शादियाँ हुईं, इस पक्ष पर सार्वजनिक रूप से बात करना आवश्यक नहीं समझा, बल्कि उसे छिपा कर ही रखा!

नेहरू का परिष्कृत मिज़ाज ज़रूर निजी बातों पर सार्वजनिक चर्चा करने के ख़िलाफ़ था लेकिन जब नवीन वैयक्तिकता और सामाजिकता के सृजन की चुनौती थी तो इसे सामाजिक विचार-विमर्श के लायक नेहरू ने भी क्यों नहीं माना?

उन्होंने वैज्ञानिक चेतना पर ज़ोर दिया लेकिन यह भूल गए कि नई संवेदनात्मक संरचना के अभाव में किसी नई ज्ञानात्मक संरचना का टिकना नामुमकिन है. यहाँ तक कि वाम दलों ने भी न तो परिवार और न विवाह जैसी संस्था पर कोई बहस छेड़ी.

आजाद पहचान

इमेज कॉपीरइट Reuters

अब हम इस हाल में पहुंच गए हैं कि प्रेम संबंधों को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र का नतीजा माना जा रहा है और उन्हें आपराधिक कृत्य की श्रेणी में डाल दिया गया है.

पुलिस से लेकर न्यायपालिका तक पर इसका असर है. इसका परिकार शिक्षा संस्थाओं की ओर से ही कारगर ढंग से हो सकता है.

उन सभी विषमधर्मी जोड़ों की ओर से और उनकी संतानों की ओर से जिन्होंने हिंदू-मुस्लमान, हिंदू-ईसाई, मुस्लिम-ईसाई पहचानों को अपनी सरहद नहीं बनने दिया, जिनके बेटे-बेटियाँ अपनी आज़ाद पहचान बना पाए.

वैसे तमाम परिवारों की ओर से जिनमें हिंदू हैं, मुसलमान भी, सिख हैं और पारसी भी, बिहारी हैं और कन्नडिगा भी, तमिल हैं और मराठी भी. क्या आज वे सब सामने आएंगे और समाज से कुछ बात करेंगे?

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार