100 दिन: मोदी बड़े सुधारों से नहीं बच सकते

नरेंद्र मोदी इमेज कॉपीरइट AP

सरकार के पहले सौ दिन के काम के आंकलन की शुरुआत अमरीकी राष्ट्रपति फ़्रेंकलिन डेलाने रूज़वेल्ट के कार्यकाल से हुई थी जिन्होंने 'ग्रेट डिप्रेशन' के दौर में सत्ता संभाली थी.

उन्होंने बेरोज़गारी ख़त्म करने और ख़राब अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पंद्रह महत्वपूर्ण क़ानून पारित किए थे.

ये अलग बात है कि रूज़वेल्ट को बाद में पता चला कि क़ानूनों की झड़ी लगाने में उन्हें ठीक सौ दिन लगे हैं. ये क़ानून ही 'न्यू डील' का आधार बने जिसने उनके देश को आर्थिक मंदी से निकालने में मदद की.

रूज़वेल्ट और बराक ओबामा के कार्यकाल के पहले सौ दिनों पर किताबें तक लिखी गई हैं.

दुनिया भर में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गईं सरकारें पहले सौ दिनों के दौरान वादे पूरे करने का रिपोर्ट कार्ड जारी करती हैं. हाल ही में नए इतालवी प्रधानमंत्री मेतियो रेंजी ने सौ दिन के अंदर देश बदल देने का वादा किया.

इस सबके बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के पहले सौ दिनों की जो अंधाधुंध मीडिया कवरेज हो रही है वो अभूतपूर्व और समझ से बाहर है.

इमेज कॉपीरइट EPA

महत्वाकांक्षाएं

मई में उनकी बड़ी चुनावी जीत ने महत्वाकांक्षाओं और हताशा के भँवर में फँसे देश में उम्मीदों की सुनामी ला दी है.

महत्वकांक्षाओं को कम करने के प्रयास में नरेंद्र मोदी ने बदलाव लाने के लिए पूरा साठ महीने का कार्यकाल माँग लिया है.

इसलिए टिप्पणीकार स्वपन दास गुप्ता मानते हैं कि कार्यकाल के पहले सौ दिनों का महत्व पूरी तरह प्रासंगिक है और इस बात का संकेत है कि सरकार की कार्य योजना क्या होगी.

मोदी के समर्थक कहते हैं कि उनकी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि प्रधानमंत्री कार्यालय की गरिमा और अधिकार पुनर्स्थापित करना है. जैसा कि एक टिप्पणीकार कहते हैं, "कोई है जहाँ ज़िम्मेदारी ख़त्म होती है."

इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने लिखा है कि प्रधानमंत्री के पहले दिन 'संकल्प और सावधानी' का मिश्रण हैं.

हालांकि फीका रहा केंद्रीय बजट न ही सुधारों के लिए सुर्खियाँ बटोर सका और न ही सब्सिडियों या वित्तीय घाटों को कम करने के लिए कोई रास्ता दिखा सका. मोदी ने रक्षा, रेलवे और इंश्योरेंश क्षेत्र में विदेशी निवेश ज़रूर बढ़ाया है.

इमेज कॉपीरइट Getty

सत्ता का केंद्रीकरण

उन्होंने केंद्रीकृत नियोजन के सोवियत युग के योजना आयोग को ख़त्म करके भारत के मजबूत होते संघीय ढांचे की ज़रूरत को पूरा करने के लिए नई संस्था बनाने की दिशा में भी पहला क़दम बढ़ा दिया है.

पिछले हफ़्ते उन्होंने हर घर को बैंक खाता देने की योजना शुरू की जो उनके शब्दों में - 'वित्तीय छुआछूत' को ख़त्म कर देगी.

दिल्ली में सत्ता में दख़ल रखने वाले लोग बताते हैं कि मोदी ख़ुद भी बहुत मेहनत कर रहे हैं और अपने मंत्रियों और अधिकारियों से भी करवा रहे हैं.

उनके आलोचक तर्क देते हैं कि मोदी के शुरुआती क़दम तेज़ बदलाव का संकेत नहीं देते हैं और वे कुछ चुनिंदा अधिकारियों के हाथ का खिलौना बन गए हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय को हालिया सालों में सबसे ताक़तवर बना दिया है.

महंगाई तेज़ी से बढ़ रही है. बहुत से लोग उनपर ताक़त को अपने हाथ में रखने करने का आरोप भी लगाते हैं.

दफ़्तर में वरिष्ठ मंत्रियों को ढंग से कपड़े न पहनने और व्यापारियों के साथ भोजन करने पर चेतावनी देने की भी अपुष्ट रिपोर्टें हैं.

पत्रकार कहते हैं कि सरकार तक पहुँच मुश्किल हो गई है.

इमेज कॉपीरइट Getty

अर्थव्यवस्था

वाशिंगटन स्थित विचार संगठन 'कार्नेगी एंडॉवमेंट फॉर इंटरनेसनल पीस' से जुड़े मिलन वैष्णव कहते हैं कि मोदी भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के वादे के साथ सत्ता में आए हैं.

ऐसा करने के लिए प्रधानमंत्री को दिल्ली में शासन और प्रशासन को सुधारना होगा और स्मार्ट अर्थ नीतियाँ लागू करनी होंगी.

वे कहते हैं, "वे सुशासन लाने में तो कामयाब रहे हैं लेकिन अर्थ नीतियों के मामले में उन्होंने निराश ही किया है."

वैष्णव कहते हैं कि यदि मोदी भारत को ऊँचे विकास के रास्ते पर लाना चाहते हैं तो वे बड़े नीतिगत सुधारों से नहीं बच सकते हैं.

वे कहते हैं, "इसके लिए मोदी को छोटी-छोटी पहलें करने के बजाए सुधारों के लिए विस्तृत नीतियाँ बनानी होंगी. सुधारों से बचना या छुपाकर सुधार करना दोनों ही रणनीतियाँ नाकाफ़ी होंगी."

मोदी ने बेहतर रेलवे, बुलेट ट्रेनों, आयकर सुधारों, कौशल विकास, ढांचागत सुधार, आर्थिक समावेशन और अधिक उत्पादन की बातें की हैं.

स्वतंत्रता दिवस पर दिए गए असामान्य भाषण में उन्होंने भारतीय समाज को आईना दिखाते हुए बताया कि भारतीय महिलाओं से कैसे बात करते हैं और किस तरह उनमें नागरिक भावना नहीं है. उन्होंने खुले में शौच करने की प्रथा को ख़त्म कर देने की क़सम भी खाई.

भारत आशा करता है मोदी का 'बड़बोलापन' उनके कामों में भी दिखाई दे.

चुनौतियां

इमेज कॉपीरइट Getty

बहुत से लोगों का कहना है कि मोदी का भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी को ख़त्म करने के दावे उस समय हवा-हवाई हो गए जब उन्होंने अपने विवादित सहयोगी और हत्या के अभियुक्त अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बनाया.

मोदी विविधता में एकता की बात तो करते हैं लेकिन अपनी पार्टी के भड़काऊ भाषणों से 'धार्मिक द्वेष भड़काने वाले नेताओं' पर लगाम नहीं कसते.

साथ ही ज़्यादातर लोग यह भी मानते हैं कि जब तक भारत की ख़राब आपराधिक न्याय प्रणाली को सुधारा नहीं जाता, थके हुए संस्थानों को नई ऊर्जा और सच्ची स्वतंत्रता नहीं दी जाती और सामाजिक स्थिरता क़ायम नहीं की जाती तब तक आर्थिक सुधारों की बात करने या ऊँची-ऊँची बातें करने से कुछ नहीं होगा.

मोदी के सामने चुनौतियाँ साफ़ है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार