'चुनाव नतीजों के दिन लोगों में ख़ौफ़ था'

फ़ाकेहा ज़िंजानी
Image caption फ़ाकेहा ज़िंजानी ने चुनावी नतीजों के दिन को याद किया.

“जिस दिन चुनाव नतीजे आ रहे थे, लोगों में ख़ौफ़ था. डर था कि पूरा भारत एक युद्धक्षेत्र बन जाएगा. दुआएँ माँगी जा रही थीं. वो बेहद असुरक्षा का माहौल था, अब बीते 100 दिनों में वो कुछ कम हुआ है.”

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की फ़ाकेहा ज़िंजानी ने बीबीसी कैंपस हैंगआउट में ये राय रखी. चर्चा का विषय था- ‘क्या मोदी मुसलमानों का दिल जीतने में सफल हुए हैं?’. मोदी सरकार के 100 दिन पूरे होने के मौक़े पर ये हैंगआउट रखा गया था.

एएमयू में हुए बीबीसी कैम्पस हैंगआउट को देखने के लिए यहां क्लिक करें.

Image caption संगीता भट्ट ने स्वास्थ सेवाओं की बात उठाई

फ़ाकेहा का कहना था, “एक्स्ट्रीम की जो राय थी, वो अब नहीं है. हम मुसलमान भी सुरक्षित महसूस करते हैं. जैसा पहले था, वैसा अब भी चल रहा है.”

मगर हैंगआउट में सबकी ये राय नहीं थी. कई छात्र-छात्राओं ने मोदी सरकार पर धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने का आरोप लगाया.

एक नज़र हैंगआउट में उठे प्रमुख मुद्दों पर:

योगी आदित्यनाथ के ‘भड़काऊ बयान’

Image caption डॉक्टर सारा आलम ने विभाजन की राजनीति की तरफ़ इशारा किया.

अच्छे दिनों का हमें एक ग्लैमराइज़्ड ख़्वाब दिखाया गया था. शायद वो अपने अच्छे दिनों की बात कर रहे थे, हम अपने समझ बैठे. योगी आदित्यनाथ जैसे लोग कुछ भी कहकर निकल जाते हैं. आप एक पिछड़े हुए वर्ग को डरा रहे हैं. 15 फ़ीसदी जनता को दरकिनार कर विकास कैसे होगा? (अनम रईस ख़ान)

मेरा मोदी जी से निवेदन है कि वह असंवैधानिक बातें कहने वालों के ख़िलाफ़ प्रतिक्रिया दें और फिर कार्रवाई भी करें. अच्छे दिन किसी वर्ग विशेष के न हों, वो सबके हों. सबका साथ हो, सबका विकास हो. (डॉक्टर सारा आलम)

बाँटने की राजनीति न की जाए. अगर सबको साथ लेकर चलने की बात है तो फिर हिंदू शब्द की चर्चा ही कहाँ से आई. – (तंज़ीम अब्बास)

मोदी जी सबके नेता है. अल्पसंख्यक भी चाहते हैं कि उनका भी विकास हो. मगर सत्ताधारी दल में उसका (अल्पसंख्यकों का) एक भी सांसद न चुना जाना क्या चिंता की बात नहीं है? रोज़-ब-रोज़ आने वाले अतिवादी बयान क्या हमें चिंतित नहीं करेंगे? लोगों में सांप्रदायिक भावना घर कर गई है. (सफ़िया मुस्तफ़ा)

‘शिक्षा का भगवाकरण’

Image caption अनम रईस ख़ान ने लव जिहाद और मुस्लिम तुष्टिकरण का मुद्दा उठाया

तालीम का भगवाकरण किया जा रहा है. पाठ्यक्रम वाली संस्थाओं में आरएसएस के लोगों को भरने की कोशिश हो रही है. ये सबसे ख़तरनाक बात है. (फ़व्वाज़ शाहीन)

किताबों में जो बदलाव हो रहे हैं, वो चिंता की बात है. आप पूरे बहुमत से आए हैं, हमें भी ख़ुशी है कि आपको पूरा बहुमत मिला है तो आप काम भी सबके लिए करें, सिर्फ़ अपनी दिली ख़ुशी के लिए नहीं. (मरियम सिद्दीक़ी)

फ़लस्तीन पर ‘चुप्पी’

ग़ज़ा में जिस तरह की बर्बर हत्याएँ हुईं उस पर सरकार ने चुप्पी साधे रखी. कहा गया कि दोस्ताना देश (इसराइल) के ख़िलाफ़ कोई ‘डिस्कर्टियस’ भाषा का इस्तेमाल नहीं करेंगे. अभी तो 100 दिनों की मायूसी है अगले 1625 दिनों में देखते हैं कि और क्या होता है. (अली फ़रज़ान)

हमारा देश मशहूर रा है स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए. तो आज की हमारी सरकार इतनी बुज़दिल कैसे हो गई कि ग़ज़ा और सीरिया में बच्चों और औरतों की हत्या पर चुप रह गई. आख़िर इसराइल से हमारा इतना दोस्ताना कैसे हो गया? (मरियम सिद्दीक़ी)

मोदी सरकार की तारीफ़

Image caption एएमयू के उपकुलपति ले.ज(रिटायर्ड) ज़मीरूद्दीन शाह

सरकार नौकरशाही में चुस्ती ला रही है जो क़ाबिले तारीफ़ है. (सदफ़ इक़बाल)

नेशन फ़र्स्ट से युवा जुड़ रहे हैं, इससे देश आगे बढ़ेगा. सरकार अब कॉर्पोरेट की तरह चल रही है जिससे काम करना और कराना आसान हो जाएगा. (ज़ुल्फ़िक़ार सेठ)

बहुत वक़्त लगता है कुछ काम करने के लिए. मोदी जी को कुछ वक़्त दीजिए काम कर दिखाने के लिए. जिस तरह उन्होंने आईआईटी, आईआईएम या एम्स की संख्या बढ़ाने की बात कही है और शिक्षा क्षेत्र को तवज्जो दी जा रही है वो अच्छी बात है. शिक्षा में लड़कियों की शिक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है. (नाज़ली शाह)

अन्य मुद्दे

Image caption सदफ़ इक़बाल ने पटेल की मूर्ति का ज़िक्र किया.

लोग संतुलित राय नहीं रख रहे हैं. मोदी भक्त उनके हर क़दम को सही ठहराने पर तुले रहते हैं तो कुछ विरोधी ऐसे हैं जिन्हें उनकी हर चीज़ ग़लत नज़र आती है.(डॉक्टर सारा आलम)

100 करोड़ रुपए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना के लिए और 200 करोड़ रुपए स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी के लिए. हम हिंदुस्तानी जीते-जागते स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी बनना चाहते हैं. (सदफ़ इक़बाल)

विविधता हमारी ताक़त है. मगर यहाँ तो समान आचार संहिता की वकालत की जा रही है. ये सरकार हमारी भी है, मगर एक संदेश ये आ रहा है कि हमारी बात सुनने वाला कोई नहीं है. (ज़ुल्फ़िक़ार सेठ)

शेरो-शायरी

मैं अमन पसंद हूँ, मेरे शहर में दंगा रहने दो.

लाल-हरे में मत बाँटो, मेरे छत पे तिरंगा रहने दो. (डॉक्टर सारा आलम)

हम सब आगे बढ़ना चाहते हैं, हम लड़ना नहीं चाहते.

हम कुछ करना चाहते हैं, हम मरना नहीं चाहते. (सदफ़ इक़बाल)

ऐ अब्रे करम बरसा कर कभी इधर भी आकर.

इस शहर में अब भी कोई प्यासा बाक़ी है. (फ़ातिमा ख़ान)

सच और हक़ की बेख़ौफ़ हिमायत की है,

गर ये बग़ावत है तो हमने बग़ावत की है. (अनम रईस ख़ान)

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