कटी लाशें उठाने को मजबूर नाबालिग़

रेलवे पटरी से लाश उठाने के काम से छुड़ाए गए बच्चे इमेज कॉपीरइट SANDEEP SAHU

ओडिशा के कटक शहर में रेलवे स्टेशन से हाल ही में दो ऐसे नाबालिग़ों को छुड़ाया गया है जिनसे ट्रेन से कटी लाशों को ढोने का काम लिया जा रहा था.

इनमें से एक अमर (बदला हुआ नाम) ने बीबीसी को बताया कि पिछले एक साल में उन्होंने पटरियों पर पड़ी कम से कम 200 लाशें उठाई हैं.

वे कहते हैं, "इनमें से कई लाशें दो, तीन दिन और कभी कभी एक हफ़्ता या उससे भी ज़्यादा पुरानी होती थीं. ज़्यादातर पुरानी लाशें सड़ी-गली होती थीं. लेकिन हमें शव उठाने के लिए दस्ताने भी नहीं दिए जाते थे. इसलिए हम हाथों में पॉलीथिन लपेटकर यह काम करते थे."

संदीप साहू की विशेष रिपोर्ट

इतना ही नहीं, कटक और आसपास के इलाक़ों से कूड़े के बोरों में लाशों के टुकड़े भर कर कटक स्टेशन पहुँचाने के बाद उन्हें एससीबी मेडिकल कॉलेज जाना पड़ता था जहाँ बच्चों के हाथों लाशों की चीरफाड़ भी कराई जाती थी.

पोस्टमॉर्टम के बाद शवों को इलेक्ट्रिक शवदाह गृह पहुँचाने के बाद ही उनका काम समाप्त होता था.

प्रति लाश 400 रुपये

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हमने इस बारे में एससीबी के अधिकारियों की प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की, लेकिन उसमें कामयाबी नहीं मिली.

अमर ने बताया कि इन सभी कामों के लिए उन्हें प्रति शव 400 रुपए ही मिलते थे. लेकिन बताया जाता है कि रेलवे की ओर से हर लाश के लिए 3,000 रुपए दिए जाने का प्रावधान है.

ज़ाहिर है कि बाक़ी रकम रेलवे पुलिस के अधिकारियों और इस काम के लिए नियुक्त संस्था के कार्यकर्ताओं की जेब में जाती रही होगी.

अमर के साथी 15 साल के सुरेश (बदला हुआ नाम) के साथ बातचीत के दौरान एक और चौंका देने वाली बात सामने आई.

उनका कहना था कि रेलवे पुलिस के गश्ती कर्मचारी उन्हें चेतावनी देते थे कि 'बड़े बाबू' के पूछने पर वह अपनी उंम्र 19 बताएं.

जांच के आदेश

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Image caption रेलवे पुलिस के आईजी महेंद्र प्रताप ने जांच के आदेश दिए हैं.

सुरेश बताते हैं, "वे हमें धमकी देते थे कि अगर हमने सही उम्र बताई तो वे हमें बुरी तरह पीटेंगे और प्लेटफॉर्म पर सोने नहीं देंगे. यह कोरी धमकी नहीं थी. हमें वे सचमुच मारते थे, कभी कभी तो उल्टा लटकाकर."

अमर के बदन पर मार के निशान अब भी हैं. चार महीने पहले 'काम' करने से इनकार करने पर उसे इतनी बुरी तरह से पीटा गया था कि उसका दाहिना हाथ टूट गया.

इन सारे आरोपों के बारे में हमने रेलवे पुलिस के आईजी महेंद्र प्रताप से पूछा तो उनका कहना था कि इस घटना के बारे में उन्हें मीडिया से ही पता चला और इसके बाद उन्होंने जांच के आदेश दे दिए हैं.

स्टेशन ही ठिकाना

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उन्होंने कहा, "हम इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं और जांच में अगर किसी अधिकारी को दोषी पाया गया तो उसके ख़िलाफ़ सख़्त कारवाई होगी."

इस पूरे प्रकरण में जो एक सवाल बारबार उठता है, वह यह है कि आख़िरकार बच्चों को ही इस काम में क्यों इस्तेमाल किया जाता है?

इस पर कटक चाइल्ड वेलफ़ेयर कमिटी के अध्यक्ष बिकाश महापात्र कहते हैं, "बच्चे इस काम के लिए इनकार नहीं कर सकते हैं क्योंकि रेलवे स्टेशन ही उनका ठिकाना है. मना करने पर उन्हें निकाल दिए जाने की धमकी दी जाती है."

"चूँकि इन बच्चों का कोई घर, परिवार नहीं है इसलिए उन्हें मजबूरन अधिकारियों की बातें माननी ही पड़ती है."

बिखरी हुई जिंदगी

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दोनों बच्चे अब कटक के 'चाइल्ड लाइन' में हैं और बेहद ख़ुश हैं.

दोनों ड्राइवर बनना चाहते हैं. उनकी बिखरी हुई ज़िंदगी अब धीरे धीरे पटरी पर आ रही है.

लेकिन देश में शायद अब भी सैंकड़ों ऐसे बच्चे होंगे जो पटरी से कटी हुई लाशें उठकर उन्हें मुर्दाघर पहुंचा रहे होंगे.

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