भालू ने हमला किया मुँह में 64 टाँके लगे

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भारत प्रशासित कश्मीर में इंसान और जंगली जानवरों के बीच संघर्ष गंभीर चिंता का विषय बन चुका है.

इन मामलों में अब तक कई लोगों की जान जा चुकी है.

इन हमलों में 2013 से अब तक 30 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं. सिर्फ 2013 में ही 28 लोग मारे गए थे. इस साल के जुलाई में 10 वर्षीय एक लड़के की तेंदुए ने जान ले ली.

पढ़िए हाज़िक़ क़ादरी की रिपोर्ट

विशेषज्ञ और पर्यावरण वैज्ञानिकों ने इंसान और जानवरों के बीच बढ़े इस संघर्ष का कारण जंगल की जमीन का अतिक्रमण बताया.

38 साल के मेहराजुद्दीन पीर जब उत्तरी कश्मीर के बेईनार बारामुला में अपने बगीचे में 12 मई 2005 को काम कर रहे थे तो उन पर काले भालू ने हमला किया.

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इस घटना में मेहराज का चेहरा बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो गया और गंभीर रूप से हाथ में चोट आई.

कारण

ज़्यादातर वक़्त वे अपना चेहरा मास्क से छुपाकर रखते हैं.

मेहराज का आरोप है कि भारतीय सेना की ओर से जंगल का अतिक्रमण इसकी एक वजह है क्योंकि इसकी वजह से जंगली जानवर आबादी वाले जगहों पर अपना बसेरा ढूंढने चले आते हैं.

कश्मीर की क्षेत्रीय वन्यजीव वार्डन शुजा हैदेरी का कहना है कि अधिकतर हमले गर्मी के दिनों में होते हैं जब लोग खेती और पशुपालन जैसी गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं और इन वन्यजीवों को लेकर लपरवाह रहते हैं.

साल 2008 में 56 वर्षीय ग़ुलाम अहमद माला पर रोहामा राफियाबाद में उनके घर के बाहर एक भालू ने हमला कर दिया.

इस हमले में वे अपनी दाईं आंख खो चुके हैं. उनकी बाईं जांघ टूट गई थी और दायां पैर भी ज़ख्मी हो गया था. एक साल तो वे बिस्तर पर पड़े रहे.

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55 साल की मुख्ती बेगम पर 2012 की गर्मी में भालू ने हमला किया था.

कोई योजना नहीं

उनके बेटे शबीर अहमद कहते हैं, "उन्हें मुंह के अंदर 64 टांके लगे हैं. अब वे सही से खा नहीं सकती है और ना ही ज़्यादा चल-फिर सकती है.

घाटी के जानेमाने भू-वैज्ञानिक प्रोफेसर शकील रामशू इन घटनाओं का कारण पहाड़ियों का आबादी वाले क्षेत्र के रूप में तब्दील होना बताते हैं.

प्रोफेसर रामशू नाराज़गी जताते हैं कि सरकार के पास वन्यजीव संरक्षण और इन हमलों को रोकने के लिए कोई योजना नहीं है.

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वे मानते हैं कि आने वाले सालों में ये हमले बढ़ सकते हैं.

हालांकि वन्यजीव विभाग लोगों में इन हमलों से बचने के लिए ऐहतियात बरतने से संबंधी जागरूकता फैलाने का काम कर रहा है.

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