बाढ़ पीड़ितों का गुस्सा हर किसी पर निकला..

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कश्मीर का इक़बाल पार्क क्षेत्र. फौज की बचाव नौका किनारे से शायद दस मीटर भी दूर नहीं गई थी कि लंबे क़द और छरहरे बदन का वो शख़्स हाथ में चप्पू उठाए हमारी तरफ भागा, उसके मुहं से गालियों की बौछार निकल रही थी.

सेना हमें श्रीनगर के बाढ़ग्रस्त इलाक़े के बचाव अभियान में ले जाने के लिए तैयार हो जाने का उत्साह क्षण भर में पानी हो गया.

आख़िर क्यों गुस्से में था ये शख़्स और असलियत में उसके निशाने पर कौन था?

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लोगों में गुस्सा

चिल्लाते हुए उस व्यक्ति ने कहा, "कहां गए वो कैमरे वाले, नीचे उतरो, हमारे लोगों को नहीं ले जाया जा रहा है, लेकिन मीडियावाले पब्लिसिटी के लिए जा रहे हैं."

उसके तेवर या शायद उसकी गालियां इतनी ख़तरनाक़ लगीं कि मेरे और कैमरामैन हेमंत के पास नाव से नीचे उतरने के अलावा कोई चारा नहीं था.

तीन से चार फ़ुट गहरे सैलाब के पानी में चलते हुए किनारे तक पहुंचने में बीच में किसी गड्ढे के होने के ख़तरा भी बराबर बना हुआ था.

उस शख़्स और वहां खड़े लोगों के ज़रिये हम पर जानी हमला किए जाने का भय भी मन के किसी कोने से डेंजर सिग्नल दे रहा था.

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एक बार इसी घबराहट में नाव से उतरते वक़्त मेरा पांव भी ऊपर रखे सामान में फंसा, दिल की धड़कनें तब एकाएक और तेज़ हो गई थी, ख़ैर पानी में औंधे मुंह गिरने की नौबत नहीं आई.

प्रशासन से नाराज़गी

बात इतने पर ही ख़त्म नहीं हुई. किनारे पहुंचने तक मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के लिए बाढ़ में फंसे लोगों के दिल का ग़ुस्सा भी गालियों की शक्ल में बाहर आने लगा और हमारी तरफ़ ही उछलने लगा.

साथ ही ये आग्रह भी था कि इसे वज़ीरे आला तक बिना किसी मिलावट के पहुंचाया जाए.

जो मुझे, प्रशासन, फौज और पूरी मीडिया को बुरा-भला कह रहे थे, उनके अपने वहां बाढ़ में फंसे थे, कई-कई दिनों से, बिना खाना-पानी के.

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इनमें से कई लोग बीमार और लाचार भी थे.

जब जान बची तो साथ लाए इक्यूपमेंट की हिफ़ाज़त का ध्यान आने लगा, दिमाग़ का एंटिना वहां से जल्द से जल्द निकलने को कह रहा था.

उन लोगों की बातें सुनीं, रिकॉर्ड की और किसी तरह से वहां से खिसके, गाड़ी की तरफ़ भागे, लेकिन ये क्या? गाड़ी वहां नदारद थी.

उसे ढ़ूंढ़ने की मशक्क़त और लोगों का गुस्सा फिर न भड़क जाए, इसका ख़तरा, लेकिन करते तो क्या करते?

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